शनिवार, 7 मई 2011

तंत्र समझ में कैसे आए?

यह प्रश्न लोगों के मन में कई बार उठता है क्योंकि तंत्र शास्त्र को गोपनीय माना गया है और लिखा कहा गया है - गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरित पार्वती। हे पार्वती अपनी योनि की तरह इसे प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए। ऐसी गोपनीयता के बावजूद आज हजारों पुस्तकें/निबंध प्रकाशित हो रहे हैं जो न तो गोपनीयता की नीति अपनाते हैं न स्पष्टता की, उल्टे अलूलजलूल बातों को विस्मयकारी ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
मैं ने जब तंत्र के रहस्यों पर लिखने का सोचा तो मेरे मन में भी आया कि क्या करूँ? गोपनीयता एवं स्पष्टता की सीमा क्या हो? फिर मैं ने स्वयं सीमा निर्धारित की क्योंकि पाखंड के विरुद्ध तो लिखना-बोलना तय था और आज भी है।

आप भी अगर मेरी स्वनिर्धारित सीमा को समझ कर मेरे आलेखों को पढ़ेंगे तो आपको समझने में सुविधा होगी। रही बात प्रायोगिक अभ्यास की तो इस मामले में मेरा स्पष्ट निश्चय है कि अनुष्ठान आदि पूर्ण प्रायोगिक विषय किसी की निगरानी में ही सीखना चाहिए क्योंकि आप अपने दिल-दिमाग की सेटिंग को उस अभ्यास में या तो तटस्थ भाव से देख रहे होते हैं या पूर्ण तल्लीनता से बदल रहे होते हैं। इस अभ्यास में एक अवस्था ऐसी आती है जब लगता है कि आप जिसके प्रति एकाग्र और तल्लीन हो रहे हैं वह आपके बिलकुल करीब है और फिर आपका और उस आलंबंन या लक्ष्य का अंतर मिटने ही वाला है। इस समय अनेक भ्रम होते हैं, बहुत भय होता है, मनुष्य विक्षिप्त भी हो जा सकता है। किसी को देवता दिखाई देते हैं, किसी को पिशाच, यक्ष, यक्षिणी आदि। इसी में गुमराह करने वाली सूचनाएँ पागल बना देती हैं।

तंत्र का दूसरा व्यापक रूप है, जो सुनिश्चित है, जैसे- भिषक् तंत्र अर्थात् आयुर्वेद। रोग, रोगी, की पहचान, औषध निर्माण और उपयोग सीधा-सीधा मामला है परंतु इसे भी समग्रता में सीखना चाहिए अन्यथा संस्कृत कहावत है- वैद्यराज नमःस्तुभ्यं यमराज सहोदरः , यमस्तु हरते प्रणान् वैद्यो प्रणान् धनं तथा। हे वैद्यराज, तुम्हें प्रणाम है, तुम यमराज के सहोदर हो, यम तो केवल प्राण ही लेते हैं तुम प्राण एवं धन दोनों का हरण करने वाले हो।
तंत्र का पूरा व्यापक अर्थ या स्वरूप होता है जो सबको ज्ञात है -पूरी प्रणाली या व्यवस्था जैसे - लोकतंत्र, तंत्रिका तंत्र, राजतंत्र, शासनतंत्र। जीवन को समग्रता में ले तो तंत्र के अंतर्गत सारे विषय आते ही हैं।
इसीलिए रहस्यमय आवरणों वाले जिस तंत्र को गोपनीय, धार्मिक विपादास्पद, भूत-प्रेत, देवी-देवताओं की उपासना एवं चमत्कारों से भरा माना जाता है उस तंत्र में भी दुनिया की सारी उपयोगी बातें सम्मिलित होती रहती हैं।
त्रिविमीय इस दुनिया के भीतर अन्य अनेक आयाम भी हैं - ध्वनि, प्रकाश जीवन आदि। तंत्र इन सभी संदर्भांे का उपयोग करता है, जैसे- रेखाकृति, मूर्ति, मंडल (मंडप), चित्र, ध्वनि (गीत-संगीत) भोजन, बलिदान, उपदान, पारस्परिक अर्थ सहयोग, सामूहिकता, सेवा, स्वार्थ, संगठन की कठोरता, विरोधियों से संघर्ष, सफलता, विफलता, मार्गभ्रष्टता, भ्रष्ट लोगों पर दंड, संरक्षण, परोपकार, निष्काशन की कारवाई, प्रचार-प्रसार, नए संगठन बनाना, राज्य (पहले राजा, मंत्री एवं पुरोहित) को प्रभावित करना, संपन्न व्यवसायी वर्ग को सम्मिलित करना आदि।

इसलिए तंत्र साधना के तीनों रूप मिलते हैं -
क. व्यक्तिगत साधनाप्रधान।
ख. सामूहिक/जातीय/गुरुकुल आधारित साधनाप्रधान।
ग. समाज व्यवस्था परक।

क. व्यक्तिगत साधना प्रधान:-
व्यक्तिगत स्तर पर तांत्रिक साधना या सिद्धि का दावा करने वाले लोग भी अपवाद छोड़कर किसी न किसी गुरु या अपनी कुल परंपरा से विधा सीखते हैं। बिना गुरु, या बिना किसी की सहायता तंत्र की साधना असंभव के समान दुर्लभ है। सामान्यतः ऐसा दावा करने वाले झूठ बोलते हैं।
ख. किसी गुरू या परिवार आधारित समूह प्रधान
ऐसे साधक-साधिकाएँ अनेक हैं। ये प्रगट एवं गुप्त दोनों रूप से साधना करते हैं। भारतीय संप्रदाय इसी शैली में साधना परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

ख. समाज व्यवस्था परक:-
तंत्र की सामूहिक साधना के लाभ से प्रेरित होकर कई सिद्धों, राजाओं एवं आचार्यों ने इसे समाज व्यवस्था में लागू कर दिया। लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया। इस विषय की आजकल चर्चा नहीं होती। सच में कहें तो विवाह, श्राद्ध, जनेऊ, व्रत, उपवास आदि के अनेक अनुष्ठान इसके उदाहरण हैं। तांत्रिक विद्या की उपलब्धि एवं स्तर के लिए अनिवार्य सामाजिक नियम बने। काशी के पूरब तय किया गया कि विवाह के पूर्व कम से कम प्रायोगिक रूप से इतनी शिक्षा तो समाज के हर युवा-युवती को किसी न किसी प्रकार दे दी जाय चाहे वह किसी भी जाति का हो। ऐसे प्रायोगिक केन्द्रों को नए शिरे से बसाया गया, राजाओं ने मदद की। यह सबकुछ व्यवस्थित रूप से पाँच सौ वर्षो में किया गया। समानांतर ढंग से इसका तीव्र विरोध भी हुआ। सामंजस्य एवं समन्वय भी हुआ। जजमानी प्रथा इसका एक उदाहरण है। मजेदार किंतु सच बात यह है कि आज भी अनेक तांत्रिक अनुष्ठान सामाजिक स्तर पर दुहराए भी जाते हैं परंतु कुछेक समझदार लोगों को छोड़कर अनुष्ठान में सम्मिलित अन्य लोग यह समझ नहीं पाते कि दरअसल इसका मतलब क्या हुआ और इसका वास्तविक लाभ क्या है?
इस नासमझी के कारण लोग जहाँ मन में आता है संशोधन करते हैं और कुछ बेवजह लकीर पीटते हैं। संस्कृत के प्रकांड पंडितों, पी॰एच॰डी॰ डिग्री वालों से लेकर निरक्षर सबका हाल इस मामले में एक है।
मैं इस सामाजिक अभ्यासवाले तंत्र पर मुख्य रूप में लिख रहा हूँ क्योंकि इसके अनुष्ठान बहुत कम गोपनीय स्तर पर होते हैं। इसे सुविधापूर्वक जाना-समझा जा सकता है। इसके बाद बाकी जानना या न जानना आपकी इच्छा। इसलिये इस ब्लाग में अनेक प्रकार के परंपरागत अनुष्ठानों पर सामग्री आएगी। आप यदि अपनी जिज्ञासा/प्रश्न सामने लाएँगे तो मुझे भी लिखने में सुविधा होगी।

संध्या भाषा/दुहरे अर्थोवाली अभिव्यक्ति:-

तंत्र के अनेक विषय दुहरे अर्थों वाली भाषा में लिखे गए हैं। अतः पहले उन्हें डिकोड करना पड़ता है। इसे पारिभाषिक रूप से यंत्रोद्धार, शापोद्धार एवं मंत्रोंद्धार (वैदिक परंपरा में) कहते हैं। इसके अपने तरीके हैं। बौद्ध तंत्र में बाकायदा एक डिकोडिंग अध्याय (पटल) बनाया जाता था और उसे किसी दूसरी किताब के बंडल के साथ बाँध कर हस्तलिखित ग्रंथों के ग्रंथागार में बाँध दिया जाता था। केवल अपनी परंपरा या संप्रदाय के लोगों को असली बात बताई जाती थी।
इस विषय पर आगे अगले किश्त में पढे़ं -

तंत्र समझ में कैसे आए ? किश्त-दो।

(वैदिक एवं तांत्रिक वर्णनों को समझने का सही तरीका)

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