शनिवार, 7 मई 2011

आप इस नैसर्गिक तंत्र के एक भाग हैं

तंत्र परिचय

आप इस नैसर्गिक तंत्र के एक भाग हैं। तंत्र प्रकृति के साथ जीने की कला एवं शास्त्र दोनो ही है। शास्त्र से तो हम जरूर परिचत करायेंगे कला आपको स्वयं सीखनी पड़ेगी। प्रतीक्षा एवं धैर्य सबसे जरूरी है क्योंकि प्रकृति सब कुछ अपने समय पर करती है। जो समय के रहस्य को जितना करीब से जानते और मानते हैं यह प्रकृति उनके समक्ष उतने ही सहज रूप से अपने को अपावृत करती है। अर्थात अपने रूप को खोल कर दिखाती है।

तंत्र प्रकृति एवं उसके रहस्यों का विस्तार है। इस प्रकार तंत्र से अधिक व्यापक कोई भी कला या विद्या नहीं है। घबराइये नहीं परंतु इस उदारता के बगैर तंत्र समझियेगा कैसे? वास्तविक तंत्र तो तंत्र है, तकनीक का विस्तृत रूप है केवल सूत्र नहीं।

तंत्र खतरनाक है अगर आप अपने को प्रकृति से श्रेष्ठ मानते हैं। अपनी श्रेष्ठता छोड़िये और प्रकृति की गोद में खेलने के लिये तैयार हो जाइये। प्रकृति आपको किसी न किसी रूप में सदैव अपने पास मिलेगी ही, आप जब तक उसे नहीं जानते तब तक माया और जब जान जाते हैं तो कोई न कोई रूप अवश्य लिये हुए मिलेगी और अगर पूरी तरह जान जाएं तो पता नहीं .......क्योंकि मैं ने कब उसे पूरी तरह जान लिया है कि आपको बता दूं।
आपका स्वागत है।

आप जब तक तंत्र से डरेंगे, उसे समझने में संकोच करेंगे, बस केवल पक्ष या विपक्ष में धारणा बनाते रहेंगे तब तक न तो अपना देश समझ में आयेगाए न धर्म, न लोगों का मन, न राजनीति, न इतिहास। अब समय आ गया है कि तंत्र शास्त्र की सच्ची बातों को लोगों को खोल कर बताया जाय।

अगर परमादरणीय स्वामी शिवानंद, स्वामी कैवल्यानंद आदि लोगों ने योग को खोला नहीं होता तो योग भी ‘‘जोग’’ अर्थात जादू-टोना ही रहता। इसलिये जो तंत्र विद्या के रहस्यों को जानते हों, लोक कल्याण के लिये खुल कर बताने की हिम्मत रखते हैं, उनका स्वागत है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सावधानी सं. 1
      तंत्र पर खुली चर्चा तो होगी ही। बस चर्चा में खुल कर भाग लेने वालों की जरूरत है। लंबी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी लेकिन आप न शामिल हों अगर मूड यह है कि- मैं तो बस मनोरंजनार्थ या मजाक उड़ाने के मूड में था। ये सब ठीक नहीं है। अतः मतांतर तथा अनुभव के अंतर को तो पूरी छूट होगी लेकिन हो सकता है कि केवल किताबी बातों पर बहस करने वालों या सुनी-सुनाई बातों पर दलील देने वालों के पोस्ट हटा दिये जायें।
      यहां कुछ भी ऐसा नहीं होगा जिससे समाज या राष्ट्र पर आफत आ जाये लेकिन किसी की धारणा या श्रद्धा आहत नहीं होगी, इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती क्योंकि उसमें इतनी विविधता है कि मैं तो जानता ही नहीं।

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