शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

सुरति सूत्र : विक्षेप खंड




                विक्षेप खंड
                दूसरा अध्याय




    रतिसुख संबंधी मानसिक ग्रंथियाँ, उलझनें

       मानव का यह दुर्भाग्य है कि अनेक व्यक्ति किसी न किसी रूप में कामवासना विषयक गं्रथि से लगभग पीडित हैं। एकांत में यदि पूछा जाए और पूछनेवाले तथा जबाव देनेवाले के बीच यदि कोई अहंकारपूर्ण संबंध न हो तो प्रायः सभी महसूस करेगें कि उन्हें कामवासना सताती है और वे पूर्णतः तृप्त नहीं हैं। चाहे परिस्थिति अनुकूल न हो, चाहे उन्हे भयानक अरुचि हो गई हो या अवस्था ढल जाने के कारण षारीरिक सामर्थ्य न हो तो भी कामवासना मरते दम तक साथ छोड़ती नहीं है और व्यक्ति उससे छुटकारा पाने के लिए या अघिकतम आनंदानुभूति प्राप्त करने के लिए किसी न किसी रूप में सिर पीटता पाया जाता है।
बात बहुत उलझ गई है। अतः सुलझाने के पूर्व इस उलझन को भी थोडे़ विस्तार से समझना जरूरी है। मैं ने अपनी समझ की सुविधा के अनुरूप इन ग्रंथियों को, उलझनों को सात प्रकार से वर्गीकृत किया है। कोई व्यक्ति एक या अनेक ग्रंथियों का एक साथ भी षिकार हो सकता है।
दुर्भाग्य से भारतवर्षश्में सभी प्रकार की गं्रथियों से ग्रस्त लोग भी मिल सकते हैं। वे भी अतृप्तिमूलक गं्रथि से प्रभावित रहते हैं। अर्थात् अतृप्ति के कारण बार बार रतिक्रिया एवं आनंदानुभूति तो उन्हें होती है फिर भी उन्हें अतृप्ति का बोध दुख पहुँचाता है और दुबारे जब षारीरिक या मानसिक सामर्थ्य प्राप्त होता है वह पुनः रति की ओर प्रेरित करता है और यह दुष्चक्र चलता रहता है। बार बार प्रवृत्ति, बार बार अतृप्ति बार बार फिर प्रवृत्ति और इस अंतहीन सिलसिले में पड़कर व्यक्ति अंततः अपने  आप को दुखी महसूस करता है।
दूसरे प्रकार की गं्रथि में पाप का बोध मूल में रहता है और यह द्वन्द्वप्रधान होती है। व्यक्ति के मन में यह भाव रहता है कि मैं कोई पापमूलक आचरण कर रहा हूँ। न तो वह सुख ही ले पाता है और न उस आकर्षण से मुक्त ही हो पाता है और भय भी उसे बहुत सताता रहता है।
तीसरे प्रकार की ग्रंथि से भी कुछ लोग पीडि़त रहते हैं। इससे पीडि़त व्यक्ति बहुत अधिक प्रयास करता है। वह बहुत साधन, श्रम, सामर्थ्य का आनंदानुभूति के लिए व्यय तो करता है लेकिन आनंदानुभूति इतनी क्षणिक होती है कि वह बेचैन हो उठता है कि यह क्या हुआ? उसे कुछ व्यापक गहरी अनुभूति होती नहीं है और यह क्षणिक आनंदानुभूति  की अतृप्ति उसके भीतर गुस्सा उत्पन्न करती है और वह फिर दुगने वेग से उसमें प्रवृत्त होता है और उसे अत्यंत क्षणिक अनुभूति होती है और इसके बाद ‘फिर और’ ‘फिर और’ वाला चक्र उसके साथ चलता रहता है।
कुछ लोगों को तृप्ति तो होती है लेकिन अत्यंत अल्पकालिक। वे विस्तार चाहते हैं, ताकि कुछ संतोष हो जाय क्योंकि उन्हें अनुभव होता है कि और गहरी अनुभूति होती तो उससे दीर्घकाल तक मैं दुबारा प्रवृत्त नहीं होता। अतृप्त व्यक्ति अनेक बार उत्तेजित, प्रवृत्त और दुखी हो जाता है।
चौथी गं्रथि सामाजिक दुर्व्यवस्था संबंधी गं्रथि है। प्रतिकूल (बेमेल या छल-बल वाले) स्थान में समाज के उलटे-पुलटे (स्वेच्छाचारी) नियम भी वस्तुतः सुविधा प्रदान नहीं करते। जिन विषयों का इस रति से, प्रजनन से कोई संबंध नहीं है, वे सारे विषय भी इसके साथ जोड़ दिए जाते हैं। मसलन राजा के अंतःपुर में अनेक पटरानियाँ होती हैं। अब दुर्भाग्य से किसी दस्यु द्वारा बलपूर्वक किसी युवती का अपहरण कर बंेच दिया गया तो राजा के अंतःपुर में तो वह न किसी प्रकार का रतिसुख प्राप्त करने में समर्थ होती है, न भाव सुख, न षरीर सुख।
इस प्रकार जो सामाजिक दुर्व्यवस्था संबंधी गं्रथि है यह भी अनेक रूपों में प्रकट होती है और अपना प्रभाव दिखाती है। भारतवर्ष में ही नहीं पूरे विष्व में न इस झंझटों से मुक्ति का उपाय बहुत लंबे समय से कहीं व्यवस्थित कही अव्यवस्थित रूप से किए जा रहे हैं।
इसी क्रम में ब्रह्मचर्य की विभिन्न प्रकार की अवधारणाएँ विभिन्न आचार्यों, साधकों ने विकसित की हैं। ये विभिन्न प्रकार की अवधारणाएँ भी मन के भीतर गं्रथियों का निर्माण करती हैं। किसी के लिए ब्रह्मर्च ही ब्रह्मचर्य है। किसी के लिए वे सारे ऋषि जिनके बाल बच्चे पत्नियाँ होती थीं, वे भी ब्रह्मचारी हैं। उन्होनें भी सिद्धि प्राप्त की है। एैसे में सामान्य व्यक्ति सोचने लगता है कि आखिर सच्चाई क्या है? ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ क्या है? इस प्रकार विभिन्न अर्थों के बीच उलझे व्यक्ति के मन में ब्रह्मचर्य की अवधारणा विषयक एक अन्य प्रकार की गं्रथि उत्पन्न हो जाती है।
अगली छठी प्रकार की गं्रथि है कि मान लिया कि श्रद्धावष या अपनी किसी छोटी अनुभूति या किसी प्रमाण के आधार पर तय कर लिया कि ब्रह्मचर्य का अर्थ यही है, भले ही वह संगत हो या न हो। ब्रह्मचर्य की किसी एक अवधारणा को स्वीकृत करने की कोषिष भी होती है और व्यक्ति को सफलता भी नहीं मिलती है। परिणामतः उसके मन में असफलता की गं्रथि बन जाती है।
उपर्युक्त सभी गं्रथियों से भिन्न एक अलग किस्म की गं्रथि से भी मानव पीडि़त रहता है। वह कहे या न कहे आज इस अव्यवस्थित समाज में तो यह गं्रथि और भी विकृत रूप में व्याप्त है। स्पर्द्धा एवं आर्थिक दुर्व्यवस्था के युग में व्यक्ति चाहता है कि रतिक्रिया में वह तल्लीन हो, आनंदानुभूति तो प्राप्त करे लेकिन उससे संतानोत्पत्ति न हो क्योंकि संतान उत्पन्न होकर जिम्मेदारी पैदा करता है तो व्यक्ति की स्वलीनता, आत्मतल्लीनता, उसकी स्वार्थपूर्ण तथ्यविरोधी दृष्टि उसकी अपनी सुविधा में भी विघ्न पैदा करती है।
वह व्यक्ति चाहे आध्यात्मिक जीवन जीना चाहता हो या संासारिक, लेकिन बच्चे उसे विघ्न रूप में महसूस होते हैैं। यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रायः संतानोत्पत्ति सामाजिक मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इसलिए एक भी संतान न हो ऐसी अवधारणा तो विरले लोगों के मन में होगी लेकिन सहज संतानोत्पत्ति का जो भय है, यह  एक गं्रथि है जो प्रायः गृहस्थों के मन को प्रभावित करती ही रहती है।
ग्रंथियाँ अन्य प्रकारों की भी होती हैं लेकिन ध्यान से देखा जाये तो मूलतः इन्हीं सात गं्रथियों के स्वतंत्र या मिश्रित रूप में निर्मित हुई पायी जायेंगी। जैसे - एक अन्य प्रकार की ग्रंथि को भी समझा जा सकता है जो अपने भीतर सफलता एवं विफलता के अनेक रहस्यों को समेटे हुए है।
आज मानव सामाजिक विकास की एक विषेष अवस्था में पहुंचा हुआ है। उसने कई प्राकृतिक नियम भी बदल डाले हैं। सूचना माध्यमों का विकास हुआ है। भूमंडलीकरण, विष्वग्राम की परिस्थितियाँ उत्पन्न हैं। किंतु इसके विपरीत हमारी आत्मीयता का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। जाति, कुल, परिवार, राष्ट्र् धर्म, संप्रदाय की श्रेष्ठता के आधार पर युद्ध लडे़ जा रहे हैं। आर्थिक-राजनैतिक धु्रवीकरण के प्रयास हो रहे हैं।
इस प्रकार आत्मीयता को यथार्थ से भिन्न, वैज्ञानिक आविष्कारों के विस्तार की दिषा के विपरीत संकुचित किया जा रहा है। परिणाम है मनोगं्रथियों का सृजन। परदेषी, परराष्ट््री युगल नागरिक आपस में मिलने न मिलने के संकट से जूझ रहे हैं।
       भ्रूण प्रत्यारोपण, टेस्ट-टयूब बेबी, माँ का गर्भ नानी, दादी के पेट में पोती का भ्रूण आदि। सहवासविहीन प्रजनन में वैज्ञानिक अविष्कारों के सभी नमूने मिलते हैं। धर्मषास्त्रियों, कानून के निर्माताओं को भी इस धारा के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ना चाहिए था किंतु वे तो जुडे. नहीं उलटे नैतिकता की मान्यताओं पर एकाधिकार स्थापित किए हुए आलसी एवं स्वार्थी तत्त्व नाहक अनेक सामाजिक मनोगं्रथियों का निर्माण कर रहे हैं।
कन्या का भय इतना भयानक है कि भ्रूण-हत्या सुनियोजित रूप से की जा रही है। अरब देषों एवं समाज के संपन्न लोगों के लिए हैदराबाद के षहरी इलाकों में एवं अन्य के लिए राजस्थान, मध्य प्रदेष के सीमावर्ती बीहड़ो में औरतों की खरीद-बिक्री खुले आम हो रही हैं ये सभी ग्रंथियाँ ही तो हैं।
आध्यात्मिक साधना संबंधी उलझनें:-
        आज का आदमी कोई आदिम व्यक्ति नहीं है। उसका मन मस्तिष्क सामाजिक प्रेरणाओं, मूल्यों से प्रभावित होता रहता है। आदमी के मस्तिष्क में अनेक सूचनाएँ आती-जाती हैं, जो उसके व्यवहारों को नियंत्रित करती हैं। इन सूचनाओं का संकलन उसके वैयक्तिक विकास के साथ विविध घटनाओं के क्रम में हुआ है और उन घटनाओं ने मन के जटिल स्वरूप की संरचना की है।
मन को यदि विस्तृत अर्थ में लिया जाए तो उसके विविध क्रिया-व्यापारों को कई नाम देने पडे़ंगे जैसे-बुद्धि, धर्म, भावना, विवेक, इच्छा, संवेगात्मक अनुभूति, स्थान, भ्रम, मोह, उदासीनता सुख दुख आदि की अनुभूति, तटस्थता, उदासी, अपने आप में लीन होना आदि।
व्यक्ति का संपूर्ण व्यक्त्तिव उन्हीं मानसिक क्रियाव्यापारों द्वारा नियंत्रित होता है। साधारण आदमी सुधार एवं सफलता के लिए उपयुक्त रास्ते का चयन नहीं कर पाता है। कहाँ से प्रारंभ करें यह ज्ञान न होने के कारण बार बार कोषिष करने पर भी वह उलझता चला जाता है। जो लोग रास्ता बताने वाले हैं, उनमें से भी विरले लोगों को ही यह कला ज्ञात होती है। वे भी प्रायः सभी व्यक्तियों के लिए या पूरे समाज के लिए वर्गीकृत करके कुछ गिने-चुने फार्मूले निकाल लेना या उपाय एवं उनके नमूने तय कर लेना चाहते हैं और उन्हें ही षाष्वत नियम के रूप में घोषित करते रहते हैं।
इसी दृष्टिकोण के कारण विभिन्न सभ्यताओं के अपने भिन्न जीवन-मूल्य एवं आचार षैलियाँ होती हैं। जहाँ पुरुष से स्त्री की संख्या कम हो वहाँ बहुपति प्रथा उचित हो सकती है। इसी प्रकार जहां स्त्रियों की संख्या अधिक हो वहाँ तो बहुपत्नी प्रथा भी चल सकती है। लेकिन इन विषम परिस्थितियों को छोड़कर सामान्य रूप से, जिससे लोगों में आपसी सौहार्द्र, षांति बनी रहे बहुपत्नी या बहुपति प्रथा का वही सिद्धांत उपयुक्त नहीं हो सकता है।
यही समस्या आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में आ टपकती है कि भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, आदि अनेक षैलियों में किस षैली को प्रमुखता दें? या अध्यात्म साधना का प्रारंभ कहाँ से करें? जो लोग चक्रों एवं कंुुडलिनी के अस्तित्व पर विष्वास करते हैं वे भी आपस में बहस करते हैं कि कंुडलिनी का जागरण वस्तुतः कहाँ से होता है, आज्ञा, स्वाधिष्ठान या मूलाधार से? इसके साथ ही साथ अगर ध्यान से देखें तो ठीक इसी तरह से इन चक्रांे से संबद्ध मानसिक विषयों के बारे में भी बहस होती है। पहले वासना का दमन हो या साक्षात्कार किया जाय? पहले काम पर विचार किया जाय या धर्म पर? भावना में बहने की कोषिष की जाय या विचार प्रक्रिया के द्वारा अज्ञान और धर्म के कुचक्र को काट कर उतार फेंका जाय? तंत्र के लोग तो विचारों के जाल को बिल्कुल बेकार मानते हैं।    
       अभिनव गुप्त ने तंत्रालोक में लिखा है-
              ‘‘विचार जालं न षिवं प्रकाषयेत्।
               घटेन किं भाति सहस्रदीधीतिः’’।।   विचारों का जाल षिव को प्रकाषित नहीं करता घट से क्या कभी सूर्य चमक सकता है।
       इतना ही नहीं रतिसुख की पूर्ण अनुभूति के संदर्भ में लोग इसी प्रकार इन्हीं अवधारणाओं में उलझे होने के कारण भिन्न भिन्न तरीकों से प्रयास करते हैं। कोई कहता है, आज्ञा चक्र पर ध्यान रखकर कंुभक लगाकर सहवास किया जाए तो प्रगाढ़ अनुभूति होती है और ऊर्ध्वगमन होता है। कोई वज्रोली के साथ प्राण को ऊपर ले जाने की बात करता है। तथ्य यह है कि जबतक चक्र की भावनाओं एवं उनसे संबद्ध अनुभुतियांे के परस्पर  संबंधांे को ठीक से नहीं समझा जायेगा तबतक आनंदानुभूति या आध्यात्मिक उत्थान के लिए किसी व्यक्ति के अनुकूल क्या रास्ता होगा, यह निर्धारित नहीं किया जा सकता।
मेरी समझ से सबसे बड़ी बेवकूफी तो यह होगी कि सभी व्यक्तियों के लिए एक ही नियम बना दिया जाय और आषा की जाय कि सबका एक ही मार्ग से विकास एवं कल्याण हो जायेगा। यह सोचना भी एक प्रकार ग्रंथि ही है। यह ग्रंथि मानसिक, सांसारिक, आध्यात्मिक सारे पचड़ों के बहुतेरे अंषो को समेटे हुए है। अतः इसे यदि इसे मूल गं्रथि के रूप में पहचाना जाए तो अनुपयुक्त नहीं होगा। इसकी विस्तार से चर्चा समाधान के क्रम में आगे की गई है। अतः यहाँ केवल संक्षिप्त उल्लेख कर दिया गया है।











            विक्षेप खंड
             दूसरा अध्याय
33.लौकिकलोकोत्तरभेदबोधाभावे लोकोत्तरे अश्रद्धा मिथ्यात्वदृष्टिष्च।
        लौकिक एवं लोकोत्तर के भेद के बोध का अभाव होने से लोकोत्तर (योगज प्रत्यक्ष वाले) रतिसाक्षात्कार में अश्रद्धा एवं उसके (लोकोत्तर के)े झूठा होने की दृष्टि बनती है।      
       सामान्य आदमी को यह सुनकर विष्वास ही नहीं होगा कि अति सूक्ष्म मात्रा में हृदय के हर आघात के साथ रतिसुख का अनुभव होता रहता है। सूक्ष्म होने से सामान्यतः इसका बोध नहीे हो पाता है लेकिन ध्यान देने पर इसका अनुभव सभी को हो सकता है। दमा धड़कन आदि रोगों में इस सूक्ष्म अनुभव की कमी होने पर इसके अस्तित्व एवं महत्त्व का ज्ञान हो जाता है। यह एक प्रकार का आंतरिक एवं अति मृदु आघात है जिसके अभाव में जीवन का आनंद सहज और पूर्ण नहीं है। जो लोग पूरी साँस नहीं ले पाते हैं उन्हें जीवन का सहज मिलने वाला आनंद प्राप्त नहीं होता है। रतिक्रिया में भी स्खलन के समय पूरा रेचन स्वतः हो जाता है। पूर्णरेचन में यदि समस्या हो तो स्खलन का सुख भी ठीक से नहीं हो सकेगा।
       इससे आगे जो लोग नासिकाग्र दृष्टि के साथ प्राणापान पर एकाग्रता का गहन अभ्यास करते हैं उनका भी मूलाधार स्वयं गतिषील हो जाता है। अपरिचित या गुरुपरंपरा से हीन साधक इस गहन अनुभूति से प्रायः घबरा जाते हैं क्योंकि बहुत सारे लोगों की दृष्टि से तो यह अनुभूति पापमय है। उनके मन में स्खलन का भी भय बना रहता है। गुरु ही सीमित अनुभव को विराट तक पहुँचा कर उनकी अज्ञानता का निराकरण कर सकते हैं।
       जो लोग लौकिक सुख की प्रक्रिया से परिचित होने पर भी अलौकिक पक्ष से अपरिचित हैं उन्हें लगता है कि बिना घर्षण, मर्दन आदि के केवल ध्यान या प्राणायाम के बल पर लौकिक से भी सघन अनूभूति प्राप्त करने की बात केवल कपोल कल्पना है। ऐसी धारणा बनाते समय वे अपनी ज्ञान की सीमा को ही झुठला देते हैं कि उन्होंने योग या तंत्र में वर्णित विधि से न अभ्यास किया है न ही उन्हें कोई अनुभव है।

34.निषेधे दुराग्रहः।
        निषेध के प्रति लोगांे का दुराग्रह है।
      अज्ञानता कई अर्थो में हैं। पहली अज्ञानता यही है कि कई लोग रतिसुख को ही इंद्रिय का विषय मानते हैं। उनके लिए संभोग ही केवल रतिप्रक्रिया है। गंध, रूप, ध्वनि के महत्त्व को वे नहीं जानते हैं। प्रायः रतिक्रिया गुप्त रूप से भयभीत होकर  अधेरे में की जाती है। परिणामतः पर्याप्त सुख नहीं प्राप्त होता है जिससे तृप्ति हो सके।
       रतिभ्रंष के दो मुख्य कारण हैं-(क) अज्ञानता, (ख) दुराग्रह।
       क-अज्ञानता कई अर्थो में हैं। पहली अज्ञानता यही है कि कई लोग रतिसुख को एक ही इंद्रिय का विषय मानते हैं। उनके लिए संभोग ही केवल रतिप्रक्रिया है। वे गंध, रूप, ध्वनि के महत्त्व को नहीं जानते। प्राय रतिक्रिया गुप्त रूप से भयभीत होकर अंधेरे में की जाती है। परिणामतः पर्याप्त सुख नहीं प्राप्त होता, जिससे तृप्ति हो सके। भं्रष का अर्थ है बीच में टूट जाना। जब अज्ञानता के कारण यह प्रक्रिया बीच में टूट कर जुड़ती है तो एक गाँठ सी बन जाती है- जैसे रोषनी में किसी की देहयष्टि, शरीर की बनावट को ठीक से न देख पाने के कारण प्रायः लोग कपड़े के भीतर की बनावट के प्रति बहुत अधिक उत्सुक रहते हैं और दूसरी ओर इसे अष्लील भावना मानकर ग्लानि भी महसूस करते हैं।
      ख-दुराग्रह रतिप्रक्रिया की सबसे बड़ी बाधा है। दुराग्रह तथ्य से परे होता है, जैसे- रतिक्रिया या इसका भाव पापकर्म है, यह अपवित्र है, इससे जितना बचा जाय, जितना दमन किया जाय उतना ही अच्छा। कुछ लोग स्त्री के स्पर्ष से भी दूर रहना चाहते हैं। कुछ लोग स्त्री को मषीन की तरह देखते हैं, वे तृप्ति के स्थान पर केवल संतानोत्पत्ति तक ही स्त्री और पुरुष के संबंध के पक्षधर हैं। चूँकि रतिप्रक्रिया एक प्राकृतिक प्रक्रिया है अतः इसके निषेध का आग्रह दुराग्रह है, जो अनेक समस्याओं को जन्म देता है।
जो भी प्रक्रिया समाधान की जगह उलझनें पैदा करती हो वह अनुकरणीय कैसे हो सकती है? वस्तुतः प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे समाधान हो, षांति मिले न कि उद्वेग बढ़ाता जाय। अतः निषेध की भावना को उत्तम मानने का दुराग्रह नहीं पालना चाहिए।

35. अषांवबोधे कौतूहलविक्षेपादयः, परिचये षांतिः। एकेन्द्रियविषयसंयोगे चित्तस्य निमज्जनात् क्वचिच्छांतिः तथापि अन्येन्द्रियविषयद्वारेण पुनपुनः प्रतिसरणाषंका विक्षेपादिनाम्।
        अतः आंषिक बोध होने पर कौतूहल विक्षेपादि होते हैं और परिचय होने पर षांति। किसी एक इंद्रिय एवं इसके विषय के साथ संयोग होने पर कहीं-कहीं चित्त के एकत्र डूब जाने से षांति होती है किंतु अन्य इंद्रिय एवं विषयों के माध्यम से बार बार रति की प्रवृत्ति के फैलने तथा विक्षेप का खतरा रहता है।
      रतिप्रक्रिया से अनेक लोग गुजरते हैं। उनमें से अधिसंख्यक आंषिक साक्षात्कार ही करते हैं, चाहे पूर्ण साक्षात्कार की संभावना हो या न हो।
       आंषिक बोध होने से तृप्ति के स्थान पर उलझन बढ़ जाती है। मान लें कि किसी युगल ने मैथुन कर्म का परित्याग कर दिया हो किंतु चुंबन अलिंगन दिव्यापार में संलग्न हो, आपस में आकर्षक वार्ता कर रहा हो तो इससे मन को न तो षांति मिलेगी, न तृप्ति अपितु वेग बढ़ता जायेगा क्योंकि रतिसुख अनेक  इंद्रियों  एवम् आलंबनों के सहयोग से पूरा होता है किसी एक दो साथ नहीं। केवल रूप , स्पर्ष आदि किसी एक या दो आलंबनों में मन निमग्न भी हो जाय तो कभी-कभी थोड़े समय के लिए षांति महसूस होगी किंतु अन्य इंद्रियों के माध्यम से विक्षेपयुक्त आलंबन ग्रहण की प्रवृत्ति बार बार उत्पन्न होगी।
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        अतः आंषिक रतिक्रिया का सुख कभी भी पूर्ण षांति देने में सक्षम नहीं होगा।

आधुनिक यौन विज्ञान की सीमित दृष्टिः-
आधुनिक यौन विज्ञान की दृष्टि सीमित है। साथ ही वह भारतीय दृष्टि को समझ नहीं पाती है। जीवन की ऊर्जा का गणित उदाहरणों में एक है। जीवन एवं मृत्यु एक ध्रुव सत्य है। जीवन के अंतर्गत ही विपरीतलिंगियों का मिलन और प्रजनन आता है। योग की दृष्टि में और विशेषकर सिद्धों की मान्यता है कि यदि ऊर्जा का क्षय न हो चिर जीवन एवं ऊर्जा के संचय का सामर्थ्य हो तो मृत्यु पर विजय संभव है। सिद्धों के यहाँ सिद्धदेह की धारणा है, जिसे काटा या जलाया नहीं जा सकता। आधुनिक विज्ञान इसे गलत मानता है। इसी प्रकार रतिक्रिया के संदर्भ में विंदुपात की बात है। विंदुपात से ऊर्जा का क्षय होता है, मृत्यु होती है। विंदुधारण से चिर यौवन एवं चिर जीवन प्राप्त होता है। इस विषय को लेकर काफी विवाद है।
विंदुपात/ऊर्जाक्षयः-
मरणं विंदुपातेन जीवनं विंदुधारणात्।
विंदुपात से मरण एवं विंदुधारण से जीवन होता है।
योग एवं आयुर्वेद दोनों ने विंदुधारण को आदर्श माना है। विंदुधारण (वीर्य को स्खलित न होने देना) को आदर्श माना गया है जिसका परिणाम मृत्यु पर विजय है। इस विषय को ठीक से समझना चाहिए। विंदु शब्द को ठीक से समझना होगा। विंदु शब्द को भिन्न भिन्न दृष्टियों से देखने पर उसका सांदर्भिक स्वरूप दृष्टिगत होता है जो उसके पूर्णस्वरूप (योग तंत्र समत) का आंशिक अर्थ होता है। इस प्रकार केवल आंशिक अर्थ का ग्रहण कर समीक्षा की जाएगी तो केवल अनर्थ एवं अज्ञान का ही विस्तार होगा।
विंदु के अर्थः-
विंदु- अस्तित्व की अभिव्यक्ति का सूक्ष्मतमरूप/चेतना के साथ अस्तित्वबोध का सूक्षमतम रूप।
विंदु- रेखागणित का कल्पित सूक्षमतम भाग केवल अस्तित्व का बोधक होता है। उसकी परिभाषाएँ भी इसी प्रकार की होती हैं।
विंदु- पुरुष का वीर्य।
विंदु- धारणा/एकाग्रता के अभ्यास के लिए विंदु के रूप में बनाया गया चित्र।
अब यदि हम विंदु का अर्थ केवल वीर्य करें तो अनर्थ होगा ही। वीर्य स्खलन के संदर्भ में भी चेतना के विंदु को धारण करने पर तो आधुनिक यौन विज्ञानी ध्यान देते ही नहीं। कुछ क्षणों के लिए हृदयगति के अवरुद्ध होने के शुभाशुभ परिणाम का विवेचन इसलिए अभी संभव नहीं  हो सका क्योकि निगमनात्मक कमकनबजपअम प्रयोगों एवं परीक्षणों के लिए केवल विंदुपात के अनुभव से गुजरनेवाले लोगों पर ही शोध एवं अध्ययन हुए। विक्षेप के कारण जो नैसर्गिक प्रक्रिया में विघ्न या त्रुटि होती है, उसके दृष्परिणाम के रूप में होनेवाली शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों की चिकित्सा की व्यवस्था आधुनिक यौन विज्ञान में की गई है। उस आधार पर आधुनिक यौन विज्ञानी विंदुरोध एवं उर्ध्वारोहण की संभावना तक का निषेध कर अपने ज्ञान को आंशिक अनुभव तक सीमित कर देते हैं।
उनकी दृष्टि रतिक्रिया के मानसिक पक्ष पर भी जब जाती है तो पीट्यूटरी से निकलनेवाले हारमोन एवं उनकी नियंत्रण प्रणाली तक ही उनका ध्यान मुख्य रूप से जाता है। संपेथेटिक ेमउचमजीमजपब चंतंेलउचमजीमजपब पारासेंपेथेटिकं नर्वस सिस्टम में बाहर से हारमोनयुक्त दवा के माध्यम से हस्तक्षेप अब एक सामान्य सी बात हो गई है। अनेक प्रकार की दवाएँ उपलब्ध हैं। कुछ मासिक चक्र को नियंत्रित करती हैं कुछ उत्तेजना बढ़ाती हैं, कुछ संभोगकाल को लंबा करने का दावा करती हैं।
इसी प्रकार प्रजनन को रोकनेवाली दवाएँ तो अनेक हैं ही। शल्य क्रिया से लेकर टेस्टटयूब बेबी तक का प्रयोग चल रहा है। इन सबके बावजूद सारा ध्यान स्खलन एवं प्रजनन तक सीमित है। आधुनिक यौन विज्ञान में विंदुरोध एवं ऊर्ध्वारोहण नहीं है।

36. अज्ञानां विज्ञत्वनिष्चये प्रापंचिकानां सौकर्यम्।
        मूर्ख जब विषेषज्ञ के रूप में निष्चित होते हैं तब प्रपंचियों को झूठ सच प्रपंच फैलाने में सुविधा होती है।
       ज्ञान की परंपरा के बाधित होने के अनेक कारण हैं, जिसमें मूर्ख का विषेषज्ञ सिद्ध होना भी एक है। इस दषा का लाभ अल्पज्ञ प्रपंची लोग उठाते हैं और अनर्गल बातों के प्रचार में उन्हें सुविधा होती है।
       मूर्ख एवं प्रपंची इन दोनों का प्रभाव क्षेत्र इतना प्रबल हो जाता है कि वास्तविक ज्ञान को जानने समझने में लेागों की रुचि ही नहीं रहती है। वस्तुस्थिति का जानकार व्यक्ति सत्य के प्रति पक्षधर होता है। वह केवल लोगों की रुचि एवं सुविधा के अनुसार ही नहीं बात कर सकता। जो मुर्ख हैं वे विषय को उलटा-सीधा किसी भी रूप में बता सकत हैं। अनावष्यक गोपनीयता एवं जटिलता के पर्दे में विषय को उलझाकर प्रपंचियों ने संसार को खूब ढगा है।

37.व्यवस्थायाम् प्रकृतिरेव प्रमाणम्। स्वस्वस्थानेषु षांतिः, भ्रंषे क्षोभः।
        रति की सम्यक् व्यवस्था बनाने के संदर्भ में (जो भी सिद्धान्त हैं उनमें) प्रकृति ही प्रमाण है। अपने अपने स्थानों पर षांति होती है, भ्रंष होने पर क्षोभ होता है।
       रति एवं इसकी प्रक्रिया के संबंध मंे जो भी नियम बताए जा रहे हैं वे तक्र या कल्पना पर आधारित न होकर अनुभव पर आधारित हैं। यह अनुभव भी सबको संभव है बषर्ते कि वह अनुभव के अनुकूल प्रयास करे और उसकी परिस्थति भी वैसी हो। कुल मिलाकर सार तत्त्व यही है कि अपने अपने स्थानेां पर अर्थात् इंद्रिय विषय एवं उभयपक्ष की अनुकूलता होने पर जो रतिप्रक्रिया होगी, उसमें षांति होगी। प्रेमी अपनी प्रेमिका के सौदर्य से अकेला तृप्त नहीं होता प्रेमी-प्रेमिका जब दोनो उभयपक्ष के साैंदर्यालंबन में डूबते हैं तो दोनों को सुख-षांति मिलती है। चँूकि सौंदर्य का रस सुख की दृष्टि से स्पर्ष आदि सुखों के केन्द्र अंतःकरण से जुड़ा रहता है अतः रूपसुख स्पर्षसुख के लिए सुखार्थी को सक्रिय भी कर सकता है और यदि सौंदर्य-सुख के भोग की आकांक्षा बलबती हो तो दोनों परस्पर दूसरे को देखते देखते तृप्त और षांत हो जा सकते हैं।
      इंद्रिय एवं विषयों के अपने अपने स्थानों की तरह युगलों के स्थान पर भी विचार करना जरूरी है। इंद्रियाँ आलंबन के रूप में दूसरे के रूप, रस, गंध आदि की अपेक्षा करती हैं। यदि यह अपेक्षा परस्पर हो तो परस्पर पूरकभाव विकसित होता है। यदि ऐसा न हो अर्थात् स्वस्थान से (स्वीकृति के स्थान से) अपेक्षा विचलित होकर भ्रष्ट हो जाती है तो इससे बेचैनी, घबराहट इत्यादि मनोरोग होते हैं। यह समस्या संपूर्ण जीवन पर हावी रहती है। जो युगल सहमति पूर्वक संतुष्ट होते हैं वे अपने समानवयवाले युगलों की रति का भी सुख स्थान समय के अनुसार भोग लेते हैं। दूसरे नायक नायिका के व्यापार से उन्हें अपने  सहभागी का सहज स्मरण होता है ओर अपनी अनुभूति में भी भ्रंष नहीं होता। वृद्धयुगल बाल-बच्चों का विवाह कर उनकी रति से अपनी रति का स्मरण कर पुलकित होते हैं। किषोरों की मूर्खता पर हँसकर प्रसन्न होते हैं। लेकिन यदि स्थानभ्रंष हो जाय तो सहमति के अभाव में  पूरकभाव खंडित हो जाता है। असफलता अतृप्ति को पैदा करती है, मन तृप्त होना चाहता है। अनुकूलता के अभाव में मन छल-बल का सहारा लेना चाहता है। छल-बल से भोक्ता के मन में एक ओर द्धन्द रहता है तो दूसरे सहभागी की लाचारी केवल उसे षारीरिक स्तर पर समर्पित ही करा पाती है। मानसिक पूरकभाव के अभाव में दोनांे की बेचैनी उलझन, एवं क्षोभ बढ़ते ही जाते हैं।
       इस तरह अपना युगलभाव सिद्ध रहने पर ही अन्यत्र युगलों में भी अपनापन का परोक्ष आरेाप होता है एवं दृष्य या श्रव्य माध्यम  परस्पर आनंद को बढ़ाते हैं। अन्यथा असहमत स्त्री या पुरुष को आलंबन बनाने से केवल समस्याएं बढ़ती जाती हैं। युगल भाव कहने का आषय किसी सामाजिक संरचना से नहीं है। समाज में अनेक प्रकार के अमानुषिक, अप्राकृतिक, छल-बल आधारित युगल संबंध प्राप्त होते हैं। वहाँ सहमति एवं पूरकभाव का अभाव होता है। यहाँ सहमति एवं पूरकभाव ही युगल स्थान का नियामक है संयोगिक या छल-बल पर आधारित युगल नहीं।
      केवल विवाह संबंध हो जाने मात्र से रति की सफलता अनिवार्य नहीं है। विवाह तो केवल युगलता एवं पूरकभाव की सामाजिक स्वीकृति है, जिसके आधार पर संतान की पहचान एवं उत्तराधिकार संबंधी प्रक्रियाएँ पूरी की जा सकें।

38.नैतत्केवली मानसिकी सृष्टिः प्रजननस्य
अन्यथाऽसंभवात्।
         रतिसाक्षात्कार की प्रक्रिया केवल मन में उत्पन्न होनेवाली नहीं है, अन्यथा प्रजनन ही असंभव हो जायेगा।
      कुछ भाव-प्रधान अतिवादी लोग रति को केवल मानसिक सृष्टि के रूप में देखते हैं। उनके दो प्रधान तक्र हैं-
    क- मन में रति का भाव न होने पर स्त्री-पुरुष का बोध ही नहीं होता, जैसे भीड़, नींद या किसी कार्य-विषेष में तन्मयता के समय विपरीत लिंगी का भान तक नहीं होता। इसका कारण यह है कि मन उस समय किसी दूसरे संकल्प की पूर्ति में तल्लीन होता है। एक प्रसिद्ध ष्लोक है-
       काम जानामि ते मूलं संकल्पात् किल जायसे।
       नाहं संकल्पयिष्यामि तेन त्वं न भविष्यसि।।
      ऐ काम! मैं तुम्हारी जड़ को जानता हूँ कि तुम संकल्प से उत्पन्न होते हो। अतः मैं संकल्प ही नहीं करूँगा और उससे तुम पैदा ही नहीं हो सकोगे।
   ख- जो साधक मूलाधार से ऊपर अपने भीतर के युगनद्ध रूप का साक्षात्कार कर उसी सुख में लीन हो जाते हैं वहाँ भी विपरीतलिंगी का षरीर तो होता नही है। अतः उनके लिए रतिसुख-केवल मानसिक  है।
       इस संबंध में तीन बातांे को ध्यान से समझने पर स्पष्ट हो जायेगा कि रति केवल मानसिक सृष्टि नहीं है।
     -सबसे बड़ी बात यह है कि संसार में सहज चलनेवाला संतानोत्पत्ति का कार्य ही  असंभव हो जायेगा। विकृत रति में रुचि रखनेवालों का प्रजनन सामर्थ्य धीरे धीरे समाप्त हो  जाता  है  और  सबलोग ऐसा ही करें तो संसार ही उच्छिन्न हो जायेगा।
       2-जबतक किसी आलंबन में मन लगा रहता है तब तक भले ही रति की आकांक्षा सुप्त रहे किंतु अवसर मिलते ही वह प्रगट हो जाती है। स्वप्न एवं निद्रा की अवस्था तक यह आकांक्षा जान नहीं छोड़ती। यदि मन षांत हो तो विपरीत लिंगंी के  स्पर्षादि से मन में रति का आकर्षण बिना प्रत्यक्ष उपस्थिति एवं तात्कालिक संकल्प के भी पैदा हो जाता है। कहा भी गया है-

       आहारनिद्राभयभैथुनंच
       सामान्यमेतत् पषुभिर्नराणाम्।
भोजन, निद्रा, भय और मैथुन पषु एवं मावन में समान रूप से है।
       3-आतंरिक अनुभव से गुजरनेवाले लेाग भी पुनः आकर्षित हो जाते है, ऐसी अनेक घटनाएँ हैं -
       विष्वामित्रपराषरप्रभृतयोः वातांबुपर्णाषनाः।।
       तेऽपि स्त्रीमुखपंकजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहंगताः।।
‘विष्वमित्र, पराषर आदि श्रर्षि हवा, पानी या केवल पत्तों को खानेवाले थे लेकिन वे भी स्त्री के सुंदर मुख कमल को देखकर मोह से ग्रस्त हो गए।’
       अंातरिक आलंबन के समय तो बाह्यालंबन पर एकाग्रता होते ही एकाग्रता का अभ्यासी अधिक बेचैन हो जाता है।
       जो पूर्णानंद तक पहुँच गए होते हैं उनके द्वारा भी प्रजनन कार्य के लिए रति की षारीरिक प्रक्रिया का आलंबन किया ही जाता है। केवल मानव या अन्य जीव ही बच्चे पैदा करते हैं न कि देवी देवता।

39.स्खलनोर्जाक्षयक्लेदानपेक्षितसंततिजननानि लोके दःुखोत्पादकानि।
        स्खलन, ऊर्जा का क्षय, थकान, बिना इच्छा के संतान की उत्पत्ति ये सभी संसार में दुख उत्पन्न करने वाले हैं।
      विक्षेप, भ्रंष एवं क्षेाभ की चर्चा की जा चुकी है फिर भी   सुविधा के लिए समझ लेना चाहिए कि दुःख को उत्पन्न करनेवाले कारक निम्न हैं-
      स्खलन आनंदित सभी होना चाहते है किंतु स्खलन से बचने के उपाय में ही सारे षास्त्र लगे हुए हैं चाहे वे सांसारिक हों या पारलैाकिक। ऊर्जाक्षय एवं क्लेद-क्योंकि स्खलन के साथ पूर्व संचित ऊर्जा क्षीण हो जाती है, थकान के कारण गहन विश्राम/ निद्रा की अपेक्षा बलवती हो जाती है। अनपेक्षित संतति-जनन- संतानप्राप्ति की वासना जितनी ही प्रबल होती है उससे भी दारुण होता है बिना अपनी मर्जी के संतान का उत्पन्न होना। यह पीड़ा स्त्रियों को    सर्वाधिक होती है। स्त्रियों का सबसे बड़ा संकट यही है। जो पुरुष प्रजनन में पूरे भाव से जुड़ते हैं उनकी पीड़ा भी स्त्री की ही भाँति होती है क्योंकि भरण-पोषण का दायित्व तो उठाना ही पड़ता है। इस प्रकार उपयुक्रत, जो सांसारिक रति के सहजीवी कारक हैं वे दुःख को उत्पन्न करनेवाले हैं। इस दुःख को रति से हटाने के प्रयास में मानव दीर्घकाल से लगा है और आज भी उसका प्रयास जारी है।

 40.  न तत्र प्रकृतिः हेतुः लोकप्रपंच एव कारणम्।
     इस प्रसंग में प्रकृति कारण नहीं है, संसार का अपना प्रपंच ही कारण है।
      ये जो दुख पूर्वसूत्र 39 में बताए गए वस्तुतः उनका कारण प्रकृति नही है अपितु संसार का अपना प्रपंच है। यह प्रपंच मुख्य रूप से निम्न प्रकार है-
       -सृष्टि की प्रक्रिया को न जानते हुए भी  जानकारी का
        विष्वास या प्रचार।
       -अल्पज्ञान एवं अधूरा आचरण।
       -जानते हुए भी प्रकृति के नियमों के विपरीत जाने
        का असफल प्रयास।
       राज्यव्यवस्था, समाजव्यवस्था या धर्मव्यवस्था चाहे वह जो भी हो सृष्टि की व्यवस्था पार नहीं कर सकती क्योंकि मानव इस सृष्टि का एक छोटा भाग है। समाज व्यवस्था भी उससे छोटी है अतः वह प्रकृति की बड़ी  व्यवस्था का विरोध करने का सामर्थ्य ही नहीं रखती। सृष्टि की व्यवस्था के नियमों के ज्ञान के बाद अपनी मर्जी से उस सीमा में थोड़ा बहुत परिवर्तन मानवीय सामर्थ्य के भीतर की
की बात है अन्यथा मानवीय संबंधों की जो भी व्यवस्था बनती है वह कल्पना पर आधारित होती है, यथार्थ पर आधारित नहीं। बेमेल या असमय विवाह काल्पनिक आदर्ष की दृष्टि से मलेर उचित हो सकता है किंतु प्रकृति की व्यवस्था की दृष्टि से क्षोभ, कलह अषांति से लेकर हत्या, मृत्यु जैसे संकटो का कारण बनती है, यह सुविदित तथ्य है।
      इस प्रकार ज्ञात/अज्ञात प्रपंच में ग्रस्त होकर कोई यदि पीडि़त व्यक्ति है तो उसका कारण संसार का प्रपंच है न कि प्रकृति में कोई ऐसी अंतर्निहित व्यवस्था है जो मानव को पीडि़त करती है।

41. षरीराधिकरणेधिष्ठितानां मूलाधारप्रभृतिनां रतिषुद्धौ परस्परापेक्षा न केवलं मूलाधारस्यैवाधिकारः।
     षरीर रूपी अधिकरण में स्थित मूलाधार आदि चक्रों की परस्पर अपेक्षा होती है। केवल मूलाधार का ही एक मात्र इस क्षेत्र में अधिकार नहीं है।
       मूलाधार चक्र पुरुष में लिंग एवं गुर्दों के बीच कुछ ऊपर में अनुभूत किया जाता है। इस प्रदेष में स्थित गं्रथि को भौतिक दृष्टि से मूलाधार संबंधी अनुभूतियों को ग्रहण करनेवाला केंद्रविंदु समझा जा सकता है। तांत्रिक परंपरा में मूलाधार को पृथ्वी तत्त्व का स्थान कहा जाता है और इसी प्रकार विविध परंपराओं मंे यंत्रों-मंत्रों द्वारा इसकी अभिव्यक्ति/प्रस्तुित की जाती है। यहाँ इन पारिभाषिक षास्त्रीय विषयों की चर्चा अपेक्षित नहीं है।
       मूलाधार चक्र के साथ तो रतिसुख का सीधा संबंध है किंतु अन्य चक्रों के साथ भी इसका परोक्ष संबंध है। इस संबंध में रतिसुख के साथ कल्पना, तक्र, धारणाओं एवं अन्य मानसिक षक्तियों, क्रिया व्यापारों के माध्यम से षारीरिक संपक्र,  किसी आदर्षवाद या काल्पनिक मान्यता के बिना भी संभोग की अनूभूति होगी। मन के स्तर पर संवेदना एवं कल्पना दोनों का आपसी संबंध होगा। किसी एक प्रक्रिया की कमी की क्षतिपूर्ति दूसरी प्रक्रिया द्वारा किए जाने का भ्रम या संतोष निरूपित होगा। कोई यदि अंतिम मानसिक प्रक्रिया (जो निणार्यक है )एवं रतिक्रिया के किसी अन्य व्यापार को अंतिम  क्षण तक एक साथ में जीना चाहे तब भी अन्य चक्रों की अनुकूलता रतिसुख में अनुकूलता का सृजन करती है और अन्य चक्रों की प्रतिकूलता चित्त विक्षेपादि के माध्यम से षीध्रपतन, प्रगाढता के स्थान पर अनुभूति की तरलता का दंष पैदा करती है। विविध चकों्र की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता की प्रक्रिया अत्यंत गंभीर एवं व्यापक विषय है। फिर भी सूत्र रूप में इतना समझ लेना चाहिए कि जागृत चक्र अनेक प्रकार के नियत्रंण की क्षमता पैदा करते हैं। यह नियत्रंण षारीरिक एवं मानसिक तथा मिश्र तीनों प्रकार से होता है। अतः व्यक्ति अपनी आवष्यकता के अनुकूल रुचि/परिस्थिति के अनुरूप अपनी क्षमता का उपयोग कर सकता है। विभिन्न चक्रों की स्थिति एवं उनकी कार्य-प्रणाली के बारे में आचार्यो में काफी मतभेद है और बिल्कुल अक्षरषः सत्य की भाँति कहना संभव नहीं है क्यांेकि यदि प्रयोगों एवं अनुभवों के आधार पर निष्कर्ष निकालने की कोषिष की जाए तो यह निर्णय कर पाना ही मुष्किल हो जाता है कि किस व्यक्ति का कौन सा चक्र किस सीमा तक संवेदनषीन या जाग्रत हुआ है। फिर भी कुछ प्रचलित मान्यताओं एवं नए आचार्यों की दृष्टि को ध्यान में रखकर तुलना की कोषिष की जा रही है। कुंडलिनी के बारे में आम आदमी की पहुँच की भाषा  में विषयवस्तु की  रखने का  लोगांे ने कोषिष की है, उनमें मेरी दृष्टि से सर्वश्री महामहोपाध्याय  गोपीनाथ कविराज, स्वामी सत्यानंद सरस्वती एवं उनके षिष्य गण,  रजनीष का उल्लेख अत्यंत जरूरी है। अन्य आचार्यों का योगदान भी है किंतु रतिसुख के संबंध में भी स्पष्ट निरूपण करने का प्रयास इन आचार्यों द्वारा किया गया है। अतः उनके विवेचन से विषेष मदद ली गई है। मूलाधार के स्तर पर जो आनंदानुभूति होती है, वह स्पष्ट रूप से रतिसुख है। उसके ऊपर उठने पर भी जब तक स्त्री-पुरुष का भेदभाव व्यक्त्तिव में है तब तक दोनों के मिलन एवं भेद विगलन की तन्मयता तक रतिसुख का क्षेत्र है। स्वाधिष्ठान में ही वस्तुतः उत्तेजना घनीभूत होकर चेतना के साथ ऊपर चढती, है जो पहले मूलाधार से चलकर स्वाधिष्ठान में रुकती है। प्रवाह के समय मूलाधार के स्तर पर भेद- बोध  न होने से  उस अनुभूति की पहचान स्वाधिष्ठान में भेद बोध होने पर होती है इसलिए कुछ लोग स्वाधिष्ठान को ही वास्तविक अनुभूति का आधार मानते हैैं। पाचन तंत्र एवं अपान वायु का क्षेत्र होने के कारण मूलाधार क्षेत्र के नाडि़यों पर सबसे करीब से स्वाधिष्ठान प्रभाव डालता है। वैसे यदि पेट साफ न हो, गैस की बिमारी हो तो षीघ्र स्खलन की आषंका अत्यंत प्रबल रहती है।
       इस विषय को विस्तार से समझना जरूरी है इसलिए दो लघु षीर्षकांे के अंतर्गत इसे स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

क-मूलाधार चक्र रति/सुरति
ख-मूलाधार चक्र का अन्य चक्रों से संबंध।( इस विषय पर विस्तृत चर्चा उद्धार खंड के सूत्र संख्या 51 में उपलब्ध है। अतः उसे वहीं पर पढ़ लिया जाए।)
   क-मूलाधार चक्र रति/सुरति
       मूल प्रश्न यह है कि मूलाधार चक्र का आखिर रतिसुख से सबंध क्या है? मेरी समझ से मूलाधार का स्थूल रतिसुख से लेकर प्रथम चरण के आध्यात्मिक (उदात्तीकरण की परंपरावाले स्खलनकालीन ) रतिसुख से सीधा एवं अनिवार्य संबंध है। स्त्री पुरुष जब उत्तेजित होते हैं तो उस समय शरीर का यह प्रदेश रक्त से भर जाता है, व्यक्ति का ध्यान इस क्षेत्र पर केंद्रित होने लगता है। आकंुचन एवं प्रसारण की क्रिया इस प्रदेश में होने लगती है। केवल वीर्य प्रवाहिका एवं रजः प्रवाहिका नाडि़याँ के आस पास की मांसपेशियों में खिँचाव बना रहता है और ग्रथियाँ षैलियाँ संकुचित होकर रज या वीर्य का प्रवाह करने की अवस्था में नहीं होती हैं। योनि या लिंग में जो स्पर्शज अनुभूति होती है, उसी सीधे यही प्रदेश ग्रहण करता है और मस्तिष्क को भेजता रहता है। स्खलन के समय अचानक पूरा भाग शिथिल हो जाता है एवं वीर्य/रज प्रवाहिका नलियों में शिथिलता आ जाती है एवं स्खलन की प्रक्रिया पूरी होती है।
       आत्मरति वाली प्रक्रिया में यदि हठयोग की बाहरी प्रक्रिया अपनाई जाएगी तो स्खलन न होने के अतिरिक्त सारी बातें षारीरिक रूप से समान होगीं मानसिक संकल्प एवं दृष्टिकोण का अंतर सूक्ष्म रूप से नाड़ी संस्थान पर अपना प्रभाव डालता रहेगा। ध्यानयोग वाली प्रक्रिया में स्थूल से सूक्ष्मतम स्तर की क्रियाएँ व्यक्ति भेद या अवस्था भेद से होगीं। किसी के साथ पूरी क्रिया होगी, किसी के शरीर में आंशिक या किसी के शरीर में केवल मानसिक अनुभूति के स्तर पर क्रिया होगी। भूतशुद्धि या तत्त्व शुद्धि’ की प्रक्रिया से भी इसका सीधा संबंध है। पृथ्वी तत्त्व विषयक धारणा स्पस्ट एवं शुद्ध नहीं होने से चित्त में तमो व्याप्त रहता है, उदात्तीकरण तो दूर सांसारिक सुख भी गहरा नहीं हो पाता। चूँकि सामान्य व्यक्ति बिना भूतशुद्धि किए अत्यंत चंचल चित्त से सांसारिक जीवन जी रहा है। अतः इस बात की उसे जानकारी नहीं रहती किंतु जो योग/तंत्र की साधना के साथ रतिसुख का लौकिक/परलौकिक उपयोग करना चाहते हैं उनके लिए मूलाधार चक्र जागरण हेतु पृथ्वी तत्त्व को शुद्ध करने की नितांत आवश्यकता है।
       स्खलन कालीन अनुभूति के साथ एक मनोकायिक रहस्य छुपा है, जिसकी चर्चा अन्यत्र नहीं की गई है। यही सारी प्रक्रिया को समझने का मूल सूत्र है। रतिसुख की अंतःकरण अनुभूति होती है में अर्थात मन मस्तिष्क एवं त्त् संबंध सूक्ष्म मनोकायिक प्रक्रिया में उससे संबद्ध शरीर की न तो पूर्ण संलग्नता आवश्यक है न त्याज्य। घर्षण (मंथन) एवं एकाग्रता ) (विलोड़न सुख या नव नीतिका)  (दो प्रमुख प्रक्रियाएँ है) शेष की केवल अनुभूति हो सकती है।  मेरी वैखरी वाणी/शब्दावली उसे व्यक्त करने में सक्षम नहीं है। पाठक अपनी अनुभूति या कल्पना शक्ति की मदद लें ) यह घर्षण मन के भीतरी सतहों में प्राणायाम द्वारा/चाहे प्राणायाम संकल्प द्वारा आयोजित हो या स्वतः ध्यान की प्रक्रिया द्वारा आयोजित हो, अति प्राकृतिक रूप से अनजाने भी होता है और जननांगों में संकल्प तथा प्रयास के द्वारा भी होता है। प्राचीन साधकों ने दोनों प्रक्रियाओं की अलग अलग अनुभूति की और समग्र प्रक्रिया का भी साक्षात्कार किया है। उनका भ्रम दूर हो गया है। उन्होनें मानवता पर कृपा कर इस रहस्य को उदघाटित किया। साधारण आदमी उस मानसिक साक्षात्कारात्मक परमसुख को कैसे समझे? कैसे शीध्र उसकी आध्यात्मिक आनंदानुभूति तक पहुँच हो? उस परम आनंदानुभूति के करीब की अनुभूति कौन सी हो यह विचार कर सांसारिक मैथुन सुख की तुलना की गई। लोगों के मन में मैथुन सुख के प्रति सहज एवं प्रबल आकर्षण को देखकर साधक शिक्षकों ने निर्णय किया कि इसी परंपरा से क्यों न साधना सिखाई जाय और तब वीर्य-स्खलन उसका निरोध एवं वज्रोली आदि की क्रियाएं विकसित र्हुइंं। रतिसुख निरूपण के समय इस क्रिया की चर्चा की जा चुकी है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया कि मूलाधार तक रतिसुख संबंधी मूल मानसिक योजना का प्राकृतिक विन्यास है। इस प्रकार मूलाधार चक्र को कामवासना एवं इससे संबद्ध पाशविक (प्राणिजगत की भाँति) क्रियाओं का केंद्र माना गया। हमारे बाह्य जीवन के आधार ही होते हैं वे लोग, जिनसे हम भूत, (माता-पिता) वर्तमान (पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका) एवं भविष्यकालीन (संतति) रति संबंधी रिश्ते से जुड़े होते हैं। इस प्रक्रिया की कई समानतायें है, जिनके कारण मूलाधार तथा इसे नियंत्रित/शुद्ध/जाग्रत करने के साधन के रूप में मूलबंध का करीबी रिश्ता है। मूलबंध  में  जब संकल्पपूर्वक बंध का अभ्यास किया जाता है, तब मन में स्थित पूर्व धारणा  के समानांतर एवं स्वसंकल्प नियोजित धारणा (कार्यक्रम की व्यवस्था) बनती है और व्यक्ति वास्तविक रति क्रिया के समय भी स्खलन से अपने आपको बचा लेता है एवं अन्य क्षेत्रों में उत्तेजना की सघनता से उत्पन्न ऊर्जा को निर्दिष्ट करता है। मूत्रमार्ग में रबर का पाइप डालकर पानी या अन्य तरल पदार्थ को चूसने का अभ्यास  भी कुछ लोग करते हैं।
       मैं किसी भी प्रयास या प्रकार की निंदा करना नहींे चाहता और पात्र की परिस्थिति के अनुरूप मार्ग सही होता ही है। फिर भी जबतक उच्च मनोभूमियों के प्रति श्रद्धा/जिज्ञासा एवं समर्पण का विकास नहीं होगा, मूलाधार संबंधी ये क्रियाएँ केवल कामवासना विषयक कुछ गंथियों, रोगांे के निवारण तक ही सीमित हो जायेंगी। उल्टे यदि ऊर्जा के प्रवाह को उर्ध्वमुख करने की कोशिश नहीं की गई तो अन्य बीमारियाँ भी पैदा हो सकती हैं। केवल स्मृति मात्र से भी इसी प्रक्रिया को दुहराया जा सकता है। स्वयं स्मृति करने पर संकल्प संबद्ध हो जाता है। शारीरिक क्रिया की भूमिका कम होने पर भी मानसिक संलग्नता की मात्रा बढ़ जाती है। इस प्रकार रतिक्रिया एवं रतिसुख की बहुत ही सकारात्मक भूमिका तंत्र की साधना में मान्य है। फिर भी यदि उत्तेजना पर नियंत्रण पाने की जगह उत्तेजना की चपेट में व्यक्ति की आत्मछवि आ जाए और वह अनुकूल परिस्थिति में नहीं हो तो अनेक प्रकार के सामाजिक संकट खड़े हो जाते है जो भयानक विघ्न उपस्थित करते हैं। हठयोग की दृष्टि से भी देखंे तो जो लोग प्रायः मूलबंध, वज्रोजी आदि उपायों की बात करते हैं। वहाँ भी वज्रोली के पहले मूलबंध एवं अश्विनी मुद्रा की मिलावट रहती हैं। गैर तकनीकी भाषा में कहें तो पहले मलमूत्र के वेग को रोकने के उपाय बताए जाते हैं।    गुप्तांगों के आसपास की मांसपेशियों एवं नसों को आकुचित करने के तरीके सिखाए जाते हैं। चूँकि शुक्रवाही नाडि़यों एवं उससे संबद्ध आसपास के भागों पर सीधा नियंत्रण कर पाना प्रारंभिक   साधक के लिए अत्यंत कठिन होता है। आकुंचन की क्रिया करते समय मलमार्ग, मूत्रमार्ग एवं शुक्रमार्ग तीनों को लोग एक साथ सकुंचित करते हैं, जिससे अनेक जटिलताएँ पैदा हो जाती हैं। इसी कारण से इस मार्ग में गोपनीयता का महत्त्व है। कुल परंपरा परिवारिकता के कड़े बंधन बनाये गए। रक्त संबंधों के समान या उससे भी अधिक गुरु-शिष्य परंपरा को महत्त्व दिया गया। अभ्यास एवं प्रयास में असफलता भी सफलता की तरह ही संभावित है तब उत्पन्न संतान को कौन स्वीकार करे। ये सब बातें मूलाधार को स्वस्थ/सहज रूप में क्रियाशील बनाने में सहायक होती हैं। मूलाधार से भिन्न ग्रथियों की भूमिका के निरूपण के समय इन बातों की चर्चा की गई है।
       रति क्रिया के दौरान नसों एवं मलमार्ग को संकुचित करने की आवश्यकता होती है। मूत्रमार्ग से स्वतः संबद्ध रतीन्द्रिय स्वतः उत्त्ज्ञेजित होते हैं और मिलावट न्यूनतम होती है, जिससे साधक के मन में अधिक स्पष्ट छवि उभरती है। प्रारंभिक अवस्था के साधक यदि अश्विनी मुद्रा का अधिक अभ्यास करने लगें तो अपानवायु का स्थूल प्रवाह अवरूद्ध हो जायेगा। पेट में हल्की गड़बड़ी होने पर भी अपानवायु गर्मी पैदा और धक्का मारकर शुक्र को वेग के साथ बाहर कर देगा , जिससे आनंदानुभूति की जगह अफसोस एवं बेचैनी आदि पैदा हो जाएंगे। पेट को सामान्य स्वास्थ्य तक पहुँचा कर यदि नैसर्गिक क्रिया के द्वारा उत्तेजना पैदा करने की कोशिश की जाए तो ऐसा संकट नहीं आता है। वास्तविक मानसिक विघ्न तो भय है, जो ग्लानि-बोध एवं सामाजिक अस्वीकृति के कारण उत्पन्न होता है। सामाजिक स्वीकृति के मुद्दे पर अन्यत्र विचार किया जायेगा।
     
        पाचन तंत्र, मूत्रप्रवाह-प्रणाली, छिपी हुई कामवासना विषयक मनोगंथियों एवं उनकी जटिलता से उत्पन्न रोग, इन  सबोंका मूलाधार से गहरा संबंध है। मूलाधार को जाग्रत/नियंत्रित करने से ऐसी सभी बीमारियाँ दूर होती हैं। अतृप्त रतिसुख के कारण उत्पन्न पारिवारिक कलह दूर होते हैं।  संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया सुखद, आनंददायिनी, आत्मीतापूर्ण एवं उच्च भूमि में सेवामयी हो जाती है।
     
       अब रही बात यह कि मूलाधार चक्र के जागृत हो जाने के बाद भी क्या इस क्रिया की कोई  सार्थकता बची रह जाती है? इस विषय को समझने के लिए विभिन्न संवेगात्मक एवं भावनात्मक अनुभूतियों के परस्पर संबंध तथा विभिन्न ग्रंथियों के आपसी संबंधों को समझना होगा। आगे का मामला भले ही विवादास्पद हो, जिस पर विचार किया जाएगा लेकिन इतनी बात स्पष्ट हो गई है  कि आस्था और स्वीकृतिपूर्वक आध्यात्मिक उन्नति के लिए रतिसुख एवं रतिक्रिया का उपयोग किया जा सकता है। रही बात पाखंड और बेईमानी की, तो पाखंड और बेईमानी को मानकर कोई शास्त्रीय विचार करना संभव नहीं है। विचार वस्तुस्थिति का किया जा सकता है, अवास्तविक परिस्थितियों का नहीं। अब मानवीय अनुभूतियों से ऊपर की चर्चाओं का संक्षिप्त स्मरण किया जा रहा है। व्यष्टि शरीर की कार्य प्रणाली के बारे में जिज्ञासु साधक को देश एवं कालाध्वा, महाकाल, श्री-यंत्र के दोनो प्रकार के रूपों, उनमें तन्मात्राओं के संयोजन, सदाशिव के संकल्प, वज्र, घंटायोग वसंततिलक योग आदि को समझना होगा। शाक्त, बौद्ध एवं शैव तंत्र साहित्य में इस विषय पर प्रचुर विवरण/चित्रण उपलब्ध होता है।         मूलाधार का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि जो लोग यह मानते हैं कि कुंडलिनी मूलाधार में तीन लपेटे मारकर सोई हुई है  उनके लिए सबसे अपरिहार्य साधना मूलाधार में कुंडलिनी को जागृत करना है। मूलाधार में जागृत कुंडलिनी संबंधी अनुभूतियों की कई उपमाएँ दी गई हैं। यहां महत्त्व का निरूपण ही प्रमुख है, उपमाएँ नहीं। रतिसुख घनीभूत होकर आत्म-अस्तित्व-प्रवाह रूपी अस्तित्व की उच्च आनंदधारा में बदल जाता है और ऐसा लगता है मानो वह किसी भी आयाम, जिनका उस समय अस्तित्व होता है, की सीमा को नहीं स्वीकार करे। कुछ लोगों के अनुसार व्यक्ति (शिव, चेतन रूप में साक्षी होता है) कुंडलिनी का अनुभव करता है, वह कुंडलिनी शक्ति या ऊर्जा तत्त्व का एक (तुलनात्मक रूप से)  परिष्कृत रूप होता है। अतः व्यक्ति उसके सामर्थ्य से डर जाता है। समाधान है, अर्द्धनारीश्वर की भाँति अपनी चेतना में विद्यमान स्वतंत्र अस्तित्व बोध को (अहंकार को) उस ऊर्जा के हवन कुंड में अर्पित कर देना। आलिंगन से बढ़कर समरस हो जाना और अर्द्धनारी-नटेश्वर की स्तुति में लग जाना (यदि दीर्घकाल का अभ्यास हो तो)।
       ‘‘सोहं ’’ ‘‘हंस: ’’ जप के द्वारा सरल सज्जन लोगों का बहुत शीघ्र मूलाधार स्पंदित/सक्रिय हो जाता है। तंत्र परंपरा से भिन्न धारा के लोगों के मन में भी इस अजपा के प्रति बहुत श्रद्धा है। अजपा की इस प्रक्रिया को लोगों ने ‘‘सुरति’’ नाम भी दे रखा है। यह ‘‘सुरति’’ मूलाधार से अनाहत तक चलती रहती है। इसके बाद क्रिया बंद, अभ्यास बंद, केवल  स्वरूप का साक्षात्कार चलता है।

42.तथैव रतिसुखोपलब्धौ उभयाभयाकर्षण- संयोगविषयेन्द्रियसंतुलनव्यवस्थायां  विक्षेप- हानादुच्चतरानन्दभूमिलाभः।
         उसी प्रकार रतिसुख की उपलब्धि में दोनो विपरीतलिंगियों का  अभय , दोनों के प्रति परस्पर आकर्षण, संयोग, विषय तथा इंद्रिय संबंधो में संतुलन की व्यवस्था होने पर आनंद-भूमि की प्राप्ति होती है।
       जैसे पूर्वसूत्र की व्यवस्था में विविध चक्रों के अंर्तसंबंधांे को स्पष्ट करते हुए क्रमषः उच्चभूमियों में प्रतिष्ठा की चर्चा की गई उसी प्रकार सांसारिक रति-प्रक्रिया में निम्न घटकों के संतुलन की व्यवस्था की जाय तो धीरे धीरे आनंद की उच्चतर भूमियाँ उपलब्ध होती जाती हैं-
       -परस्पर दोनों में अभय हो अर्थात् छल या बल का प्रयोग न हो। व्यक्तिगत या सामाजिक कोई भय न हो। आकर्षण हो। यह आकर्षण भी अप्रासंगिक/एकांगी न हो-जैसे केवल पद का आकर्षण, धन का आकर्षण, कुल का आकर्षण, रूप, रस, स्पर्ष आदि में से किसी एक का ही आकर्षण।
       - आकर्षण के साथ संभोग हो। यह अभय एवं आकर्षण का नियम सर्वत्र अंतर्निहित है।
        -विषयेन्द्रिय संयोग की व्यवस्था हो।
       बंद अंधेरे कमेरे में कोई युगल रूप का सुख कैसे प्राप्त कर सकेगा? कलहरत युगल मन से समर्पित नहीं होगंे, अस्वस्थ युगल षारीरिक प्रक्रिया का सुख नहीं भोग सकते अतः इंद्रिय-विषय-व्यवस्था अनिवार्य है।  जब ऐसे व्यवस्थायुक्त वातावरण में युगलों का मिलन होगा तो    धीरे धीरे आनंद गहरा एवं उच्चकोटि का होता चला जायेगा। संस्कारस्थित, अवषिष्ट विक्षेप स्वतः समाप्त होते चले जायेंगे।



43. अपूर्ण संयोगे अतृप्तिजन्याकर्षणा-
दसकृदुद्वेगादयः न च षांतिः न च सुखम्।
        संयोग अपूर्ण होने पर अतृप्ति से उत्पन्न आकर्षण के कारण बार बार उद्वेग उत्पन्न होते हैं, इससे न तो षांति होती है और  न ही सुख।
       बहुतेरे लोग भोग द्वारा षांति पर विष्वास नहीं करते क्योंकि दुर्भाग्यवष या तो भोग की परिस्थिति एवं साधन ही उन्हें उपलब्ध नहीं होते या उन्हें प्रक्रिया का ज्ञान नहीं होता। ऐसे लोग  प्रायः निम्न आरोप लगाते हैं-
       न जातु कामः कामानामुपभेागेन शाम्यति।
       हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते ।।
सुष्कंेधन इवानलः।
 जैसे अग्नि में सूखी लकड़ी डालने से अग्नि बढ़ती ही जाती है वैसे मानव की भोग की आकांक्षा भोग से षांत न होकर आाग की तरह वेग से बढ़ती जाती है।
       यह उदाहरण एकांगी है, जो केवल विक्षेपदषा के बारे में संगत है। विचारणीय यह है कि भोग की आकांक्षा एवं भोग की प्रक्रिया से विरोध क्या अनिवार्य है? भोग की आवृत्ति कहाँ अनिवार्य है कहाँ आवष्यक एवं कहाँ निषिद्ध?              
       भोजन करने से तृप्ति एवं स्वास्थ्य प्राप्त होते हैं। भूख षांत होती है। पुनः षरीर की अपेक्षा होने पर भूख लगती है। इसमें बुराई क्या है बुराई तो अतृप्ति में है, रात दिन भोजन के पीछे पागल होेने में, व्यर्थ भोजन की इच्छा का दमन करने के ढोंग में है। यथानुरूप भोजन सही तरीके से करने से भूख व्यवस्थित, संतुलित एवं कल्याणकारी हो जाती है।
      इस प्रकार रति एक ऐसी उपलब्धि है, जिसका उदारीकरण एवं  उदात्तीकरण होने पर वह सूक्ष्म एवं व्यापक रूप ग्रहण कर विराट की अनुभूति कराने में सक्षम है। अतः सही प्रक्रिया का ज्ञान आवष्यक है। उसके अभाव में वही दुर्दषा होगी।
      गीता में भगवान, श्री कृष्ण ने कहा है-
      नात्यष्नतस्तु योगोस्ति नचैकांतमनष्नतः।
      न चाति स्वप्नषीलस्य ज्राग्रतो नैवचार्जुन।।
      युक्ताहारविहारस्ययुक्तचेष्टस्य कर्मसु।
      युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।
      अति भोजन करने वाले, अति उपवास करनेवाले, अति सोनवाले किसी भी अतिवादी के योग नहीं हे। आहार, विहार स्वप्न, जागरण (आदि जीवन के व्यवहारों) में जो व्यक्ति युक्त होता है, योग उसके दुखों को दूर करनेवाला होता है।
     युक्त का ही षब्दार्थ है जुड़ा हुआ, अभिप्रेत अर्थ है उपयुक्त, सम्यक, संतुलित युक्त के वास्तविक स्वरूप को बताना ही षास्त्र एवं विषेषज्ञ का दायित्व है।                      


शनिवार, 23 नवंबर 2013

योग और तंत्र के संबंध


तंत्र को अनुभव और उसकी पद्धति और उदाहरण की कसौटी पर अगर कसें तो सही स्थिति का पता चलेगा।
योग ‘‘बच्चा’’, ऐसा प्रचलित वक्तव्य है मेरा नही। तंत्र सर्वांग व्यवस्था को प्रधानता देता है लेकिन भक्त जुटाने के लिए और अपनी महिमा बढ़ाने के लिए एक ही बात को योग एवं तंत्र दोनेां नाम से कहा जाता है। हठयोग में भी आसन, सामान्य प्रणायाम से उपर आकर गहन कुंभक, बज्रोली - सहजोली, उनके साथ गहन कुंभक की प्रक्रिया आयेगी तो तंत्र मंें भी शक्ति चालन, कुंडलिनी को मूलाधार में सक्रिय कर स्वाधिष्ठान की ओर भेजने के लिए उस विधिका भी सहारा लिया जाता है। गोरख वाणी में ‘अर्धे जाता अर्धे धरे, काम दग्ध जोगी जो करे’ - आदि वर्णन आते हैं। यह तो हठयोग एवं कुंडिलिनी योग ही नहीं, वाम मार्गी तंत्र की भी प्रक्रिया हो गई। 
मूलाधार से पहले कमल नाल, आजकल रबर की नली से पानी, तेल और बाद में वीर्य को ऊपर खींचने की पक्रिया हठयोग में आयेगी, स्त्री योनि एवं शरीर को पूर्ण उत्तेजित रखने एवं स्खलन से बचने की प्रक्रिया तंत्र में जाएगी।
हठयोग प्राणायाम का सहारा लेगा, बंध का अभ्यास बताएगा। तंत्र में सुविधा मिलेगी मंत्रों की आवृत्ति में मन को रोकने भटकाने की। उससे उत्कृष्ट होगा अपने ही मनेामय कोश का साक्षात्कार, अपने ही भीतर के चेतनामय शरीर में क्रमशः प्रवेश करते जाना। ध्याान योग में सुषुम्ना स्वतः चलने लगेगी। नाद बिंदु का मिलन होगा, त्रिकुटि लय होगा। स्वतः प्रत्याहार एवं धारणा सध जाएगी।
अब क्या? उसके बाद तो प्रकृति सारा रहस्य खोलकर दिखाने लगेगी। अमृत वर्षा होगी। स्खलन कालीन क्षणिक सुख घंटो वाला हो जाएगा। ऐसी मस्ती कि उसमें से निकलने का मन ही नहीं करेगा। उसके साथ-साथ जीना चाहें तो कुछ घटो बाद सामान्य मनुष्य का शरीर साथ नहीं दे सकता।
सांस उत्तेजना, धड़कन आपके हाथ में आ तो गये, लेकिन सीमा बनी हुई है कि शरीर को स्थिर शांत कर या तो ध्यान की ओर बढ़ें या फिर उतर कर जान बूझकर भी इसी दुनियाँ में अन्य मनुष्यों की तरह जिएं।
उसी तरह योग में जो उस स्थूल शरीर के भीतर एक पहला स्वतः संचालित क्रियात्मक प्राणमय शरीर और अनुभव करने वाले शरीर मनोमय का बोध होता है, उसमें काफी समय लग जाता है। तन, मन की चंचलता को शांत करने या स्वतः शांत होने दोनो में बहुत विघ्न आते हैं।
तंत्र में और खाशकर लोकप्रचलित प्रणाली कहें या सिद्ध पंथ वाली उसमें मात्र एक सप्ताह से इक्कीस रोज के अंदर अन्नमय, प्राणमय, एवं मनोमय शरीर की संरचना एवं गतिविधि का साक्षात्कार वाला अनुभव हो जाता है। न भय, न घबराहट, शर्त यह है कि 10-20 लोगों की मंडली हो। वे एक दूसरे का भला करने वाले हों, उनमें विभिन्न आयु वर्ग के और स्त्री पुरुष दोनों हों तो समय कम लगेगा। बिल्कुल घरेलू सामाजिक व्यवस्था। न सबको तन से नंगा होने की जरूरत, न दारू, न संभोग फिर भी मन से नंगा होना जरूरी है। मन से परिचय करना है तो मन तो नगा करना ही पड़ेगा। उसके मनका कपड़ा उतारना पड़ेगा। इस तरह का किया कम, कराया अधिक, जानेवाला अभ्यास तंत्र हो गया। यही सब तो शादी-विवाह के अवसर पर मात्र 20-25 वर्ष पहले तक हो रहा था। कुछ कुछ अभी भी हो रहा है।
योग में कहें तितीक्षा, पार करने की इच्छा, बर्दास्त करने की बात।नदी तैर कर अकेले पार किया तो डूबने का खतरा। भीतर की अनुभूति के समय तो मनुष्य एकेला ही है। भम्र एवं भय दो बड़े खतरे हैं। तंत्र में अनुभवी लोग बाहर से देख रहे हैं। कहा गया कि हम जो भी करें तुम चुप रहना (साधक, साधिका, जो हो) बर्दाश्त करना, गाली दें, चिकोटी काटें, मार-पीट करें, आरती करें, सुंदर भोजन दें, ललचाएँ, रूप-कुरूप, भला-बुरा जो करें तुम मजे लो, मौन में हँसा। सोने तो दंगे नहीं, देखतेे रहेंगे कि इसकी मनोदशा कैसी कहां पर चल रही है। बच्चे से बूढे तक सभी लोग लगे हुए हैं सिखाने में। खेल-तमाशे हो रहें हैं। यह तो गया तंत्र, ऐसी प्रक्रिया में व्यक्ति बिना अधिक मिहनत के सकुशल हँसते-खेलते पार हो गया। फिर वह दूसरों के लिए खेल भी गढ़ सकता है और मार्गदर्शन भी कर सकता है।
मस्तिक में चतना की आकृतियाँ हैं। मुझे भीषण ज्वर में कुछ यंत्रों का साक्षात्कार हुआ, कुछ ध्यान मे,ं यह योग हुआ। बाहर में यंत्र लिखकर भीतर के यंत्रों की छाप/स्मृति को सक्रिय करना तंत्र हो गया।
इस प्रकार से उदाहरणों के द्वारा योग और तंत्र के अंतर को वर्गीकृत किया जा सकता है लेकिन अनुभव में हुआ तो साथ ही साथ उसी शरीर में न। इसलिए सिखाने वाले उदार गुरु तंत्र के वर्गीकरण या उसे सिखाने न सिखाएँ उस चक्कर में नहीं पड़ते। हर स्थिति का लाभ उठाने को कहते हैं। आप जप करें यह भी विधि है। किसी मंदिर में जा कर जहाँ देर तक सामूहिक कीर्तन हो रहा हो। उसे सुने यह भी विधि है। 
कितना उदाहरण दें। आशा है, आप तक कुछ न कुछ मेरी बात पहुँच गई होगी। भाई उदय जी आप ने स्वयं अपना साधनात्मक परिचय नहीं दिया है। अपने या अपने गुरुजी के बारे में नहीं बताया और प्रश्न इतना गहरा? पता नहीं आपकी परीक्षा में मुझे कितने अंक मिलेंगे? परिचय रहने पर साधक को उसके अनुरूप उत्तर देने में सुविधा होती है।
मेरे मन में तो आता है कि आरंभिक परिचय वाला ऐसा परिवारिक कार्यक्रम बनाना चाहिए। उससे लोक लज्जा का भय भी नहीं रहेगा और आसानी से बच्चे से बूढे़ तक हँसते-खेलते कम से कम अपने भीतर जाने के रास्ते से तो परिचित हो ही जाऐंगे। केवल एक उदारता चाहिए। उदारता अर्थ व्यवस्था की, जिससे सप्ताह तक रहने खाने की व्यवस्था निकले। उदारता छुआछूत से ऊपर उठने की। उदारता स्त्री-पुरुष, सधवा-विधवा, बच्चे-बूढ़े के तन के साथ मन को भी प्रेम पूर्वक स्वीकारने की, अपने हीं इष्टदेव अपनी हीं पद्धति की जगह इस बिना देवता, बिना बीज, मंत्र के अभ्यास की।
उस आरंभिक परिचय से तंत्रोक्त, दिग्बंधन, कवच, न्यास, अभिषेक इन सभी को पाठ नहीं, अनुभवात्मक रूप से समझने की सुंदर पृष्ठभूमि तैयार हो जाएगी। आप की मर्जी जिस किसी भी महाविद्या या देवी-देवता की साधना करें।
इससे अधिक यूँ ही क्या बकता रहूँ। अवसर पर कर लिखूँगा। उपर्युक्त जितना लिखा है।  वह अनुभूत है। ध्यानयोग, कंुडलिनी और लोकाचार वाला मेरा और पूरे समाज का जहां ऐसी साधना होती रही। हठयोग वाला आंशिक मेरा शेष मेरे मित्र साधकों का और वामाचार वाला वरिष्ठ साधकों का। चूँकि उस संसार में मैं कोई पहला तो हूँ नहीं अतः ये विधियाँ थोड़े-थोडे़ अंतर से पुस्तकों में वर्णित भी हैं।
उन्हीं बातों को दैनिक अभ्यास और कर्मकांड में डाल दिया तो सामान्य धर्माचरण की बात हो गई, परंपरा बन गई। जहाँ अनुभूति नहीं है, बिना सोचे समझे ज्ञानार्जन के, बस यूँ ही चल रहा है, वहाँ नियम आधारित खेल नहीं है। शुद्ध मनोरंजन वाला भी नहीं, बस देखा देखी खानापूर्ति वाला परंपरा का पालन है। उससे श्रद्धा तो है लेकिन वह ज्ञान से हीन है।
योग शास्त्र सीधा प्रशिक्षण है। यहाँ योग से मतलब हठयोग और अष्टांगयोग से है। सीधा रास्ता बताने में मनोरंजन नहीं होता न ही सामूहिकता की अनिवार्यता होती है। साधक एक अकेला, वैराग्य भावना वाला तटस्थ भूमिका का अभ्यास करता है। उसमें भी अपने मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म गहरी अवस्थाओं का तटस्थ साक्षात्कार करता है। इसलिये योगी को बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती।
तंत्र की विधियों में खेल भावना, सामूहिकता, परोक्षता, उत्सव, रंग, ध्वनि, गीत, खाद्य सामग्री हीं नहीं, इस सृष्टि की किसी भी उपयोगी सामग्री को सम्मिलित कर लेनी की संभावना है। संरचना को केवल जानना नहीं, उसकी स्थूल, भौतिक, संासारिक संरचना का अनुभव करने पर भी उसे अपने वश में रखना है। इसलिए तंत्र मंें काम, क्रोध, लोभ, द्वेष और मोह सभी अपने छोटे से लेकर बृहत्तम रूप में स्वीकृत हैं। ये अस्पृश्य विषय नहीं हैं।
वह तांत्रिक कैसा जो काम भावना से भरा नही हो, क्रोध जिसकी आँखों से बरसता नहीं हो और हृदय अगाध करुणा से भरा नहीं हो। जो सबको अपना न मानता हो और जिसे यह स्पष्ट हो कि कैसे प्रकृति नहीं, महामाया इस सृष्टि में क्षण-क्षण रूप एवं भाव का परिवर्तन कर रही है। वह जीव मात्र में शिव-शक्ति, राधा-कृष्ण, प्रज्ञा-उपाय के मिलन, मिलन की आतुरता एवं मिलनोपरांत सृष्टि को देख देख उत्सव मनाता है, मृत्यु एवं विनाश पर खूब हँसता है।
आज जो तंत्र चर्चा होती है वह प्रायः बैखरी पाठ, उपांशु जप, बाह्य स्तुति, चमत्कार, जजमान को फुसलाने, धारणा का अभ्यास तक सीमित रहती है। इष्ट के साथ तादात्मय की पहली अवस्था में ही लोग डरते जाते हैं क्योंकि यह द्वैत को तोड़ता है और बाद में भ्रम को भी।
धारणा या मन को एकाग्र करने की विधि में कल्पना की सुविधा रहती है। यहाँ जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी, वाली सुविधा रहती है। यह होश संभालने वाली, सच्चाई को स्वीकार करनेवाली दशा नहीं है। यहाँ अपनी रुचि की मूल वृत्ति के अनुसार देवता की संपूण्र कल्पना में डुबने उतराने की सुविधा है। यह एक नशे के समान है। अतः कुछ लोग इस अवस्था तक नशे के माध्यम से भी पहुँचना चाहते हैं। तंत्र में मन को एकाग्र करने के लिये गीत, संगीत, लीला, कथा, अभिनय, नृत्य, उत्सव सब स्वीकृत है। चक्रपूजा, व्यूह भावना, मंडल गीत, योगी योगिनी के नृत्य, कथा, पूजा, प्रसाद, तीर्थयात्रा, ईष्ट एवं गुरु की जयंती, गुरुपूजा संप्रदाय या परंपरा में अपने को खोलने विकसित करने एवं एकाग्र रहने की सुविधा प्रदान करते हैं। इसमें भक्ति और संगठन की प्रधानता है। भीड़ को यही पसंद है लेकिन तंत्र सम्मत गहरी बातें तो इसके ऊपर हैं।
वहाँ मनमाना नहीं चलेगा, समर्पण करना होगा, वह भी अपने ही समक्ष। कल्पना वाले शिव के साथ धारणा जैस ही ध्यान में परिणत होगी। अर्थात एकाग्रता से बढ़कर तादात्म्य होगा वैसे ही पता चल जायेग कि धत्तेरे की यह तो मेरा भ्रम था, असली बात तो और गहरी है। यह एक साथ का संयोग और वियोग अनेक साधकों को सहन हीं होता, मनोविकृति आ जाती है। इसलिये इस विधि को गुप्त रखा जाता है। उसी तरह की प्रक्रिया क्रमशः गहरी होती जाती है। कल्पना की जगह प्रकृति पुरुष के असली रूपों का साक्षात्कार होने लगता है। यह भ्रम टूटना बहुत दारुण होता है इसलिए असली परंपरागत साधना विधि में स्थूल रूप के साथ सूक्ष्म रूप का वर्णन आरंभ से रहता है कि स्थूल आलंबन की जगह सूक्ष्मतर आलंबन का सहारा बना रहे।
इससे अधिक खोलने की कोई सार्थकता नहीं होगी। जो साधक साधिका चाहें अलग से चर्चा कर सकते हैं।


मंगलवार, 19 नवंबर 2013

कल्पना, धारणा और ध्यान


योग एवं तंत्र के साधक तथा दूसरे से चर्चा करने वाले असली सत्संगी भी प्रायः इन तीन बातों को अलग अलग नहीं समझने के कारण उलझते रहते हैं। कोई सुविधा के लिये, कोई असावधानी वश और अन्य गलत नीयत से सबको मिलाजुला कर एक कर देते हैं।
कल्पना
कल्पना में पहले से ही कोई दृश्य, रूप, घ्वनि बता दी जाती है कि आपको ऐसी कल्पना करनी है। कल्पना जब ठीक ठीक होने लगती है तो आंख मूंदने पर लगता है कि अरे यह तो सच में वैसा ही दिखाई सुनाई पड़ रहा है। इतना ही नहीं कल्पना करने वाला यह भूल जाता है कि मैं ने तो प्रयास पूर्वक ऐसी कल्पना की थी। कल्पना का यह लगाव इतना गहरा होता है कि अगर आप किसी को याद दिलाएं कि यह अनुभव तो आपकी कल्पना का ही घनीभूत परिणाम है, वह व्यक्ति बेशक आपसे झगड़ जायेगा। पूजा-पाठ उपासना में लगे अधिकांश लोग इसी तरह के भ्रम में जीना पसंद करते हैं। उलटे जो होश में रहें उन्हें नास्तिक कहते हैं। कल्पना को धारणा में बदला जा सकता है लेकिन प्रायः लोग कल्पना के चिस्तार में लग जाते हैं।
धारणा
मन को किसी भी विंदु जिसे आलंबन कहा जाता है, उस पर एकाग्र करने एवं वहां हो रहे अनुभव से गुजरने अर्थात उसे स्वीकार करने को कहा जाता है। किसी भी आलंबन पर मन के एकाग्र होने के क्रम में ही अनेक अनुभूतियां हो ने लगती हैं। समर्थ गुरु उनके कारणों एवं संदर्भों को पहचानता है। कुछेक अनिष्टकारी अनुभूतियों को छोड़ अभ्यास करने वाले को अभ्यास में ही टिके रहने की सलाह दी जाती है। इस अभ्यास से भी लगता है कि मैं तो वही हो गया। मन, मन को एकाग्र करने की क्रिया और एकाग्र करने वाले का अंतर भी एक समय मिटने लगता है। लोग अक्सर घबराकर इस अनुभूति के पहले ही भाग खड़ा होते हैं।
ध्यान
धारणा जब पूरी होने लगती है, शरीर के भीतर प्रकृति प्रदत्त ध्वनियों, कार्यप्रणालियों, मस्तिष्क के खांचों, अंतःस्रावी ग्रंथियों आदि से अपने भीतर ही अनुभवात्मक साक्षात्कार होने लगता है। कुछ कुछ नियंत्रण जैसा भी महसूस हो सकता है। इस तरह की अनेक बातें होती हैं।    ध्यान धीरे-धीरे सूक्ष्म होता जाता है और सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभूतियां भी होती हैं। इससे अधिक कहना संभव नहीं है।
मेरी कुल परंपरा भटके साधकों की चिकित्सा एवं सेवा की है। अतः साधक-साधिका के प्रयास के प्रति सहानुभूति एवं आदर के बावजूद उसकी उलझन सुलझाने के लिये तथ्यपरक तो होना ही पड़ता है। सामान्यतः लोग कल्पना की जिद में उलझते हैं। उसे ही उपलब्धि मान बैठते हैं। यह नशे की तरह सुखद और दुखद है। भयानक पीड़ा से बचाव में दवा और बाद में दारू की तरह काम करता है। मैं वाम मार्ग या कौल परंपरा के बारे में साधकों से सुनी हुई और ग्रंथों में वर्णित बातें ही जानता हूं और वे बातें जो दुर्घटनावश बाहर आ गईं।

धारणा में आगे बढ़ने से घबराये हुए लोग अपने धारणा स्तर के अनुभव को ही पकड़ कर उसे समाज में मनवाने ओर किसी न किसी प्रकार गुरु बनने को बेचैन हो जाते हैं।
इस प्रकार जिद तथा भ्रम में पड़े लोगों से तब तक चर्चा नहीं हो पायेगी, जब तक वे यह मिलाने को तैयार न हों कि वे तो कल्पना या धारणा में ही अभी हैं। उनमें यह उदारता आने पर ही वार्ता हो सकती है कि जैसे आपने अनुभव किया उसी तरह दूसरे का अनुभव भी तो सुनिये समझिये।

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सुरति-सूत्र 3


भूमिका

       भारतीय समाज इस दृष्टिगोचर संसार के साथ इसके अतिरिक्त एक रहस्यावृत लोक में भी विश्वास करता है। उसे सामान्य लोगों को उपलब्ध सुुख की इच्छा तो है ही रहस्यावृत सुख की भी आकांक्षा है, जिसे मोक्ष, महासुख, चरमसुख, निर्वाण आदि के नाम से भारतीय समाज जानता एवं मानता है। इस रहस्यावृत सुख की प्राप्ति का उपाय कुछ लोगों ने इस संसार एवं इस संसार के प्रचलित सुखों का परित्याग बताया है तो कुछ लोगों ने इस संसार के सुखों के भोग के साथ मोक्ष, निर्वाण या इसके समतुल्य अवस्था की उपलब्धि का मार्ग बताया है। भोग के साथ मोक्ष पर विश्वासवाली धारा ने इस विषय पर गंभीर और व्यापक कार्य किया है। कुछ लोग केवल सांसारिक सुख के भोग पर ही विश्वास कर उभयविध भोग की संभावना को ही नकारते हैं। यह उनके अज्ञान के कारण है। योग एवं तंत्र की प्रक्रिया के अज्ञान के कारण ही निराशा या निषेध की प्रवृत्ति विकसित हुई है।
        जो लोग योग या तंत्र का विधिवत अभ्यास करते हैं उन्हें वस्तुस्थिति का ज्ञान रहता है कि सुख के दोनो ही प्रकार सही एवं एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं हैं।
       यही बात यौन-सुख, काम-सुख, रति-सुख, आदि के रूप में ज्ञात सुख पर भी लागू है। इतना ही नहीं रति-सुख का स्थान सभी सुखों में महत्त्वपूर्ण एवं आकर्षक माना गया है। यह प्रत्यक्ष अनुभवगम्य है, इसमें किसी तर्क को आधार मानने की आवश्यकता नहीं है।
        एक ओर समाज में यौन सुख के प्रति गहरा आकर्षण है, यौन सुख के चरमोत्कर्ष को मुक्ति, निर्वाण की बराबरीवाला उच्च स्थान प्राप्त है वहीं दूसरी ओर यौन सुख के विरोध में भी अनेक प्रकार से  स्वर उठानेवाले लोग हैं । इस प्रकार  कई  ढोंग अनावश्यक विकसित होते चले गये हैं । अत्याचार, प्रतिरोध, कपट आदि ने इस ढ़ोंग को अपना ढाल बना लिया और बलात्कार, वेश्यावृत्ति, स्त्री या पुरुष की खरीद-फरोख्त, दास-दासी प्रथा, वेमेल विवाह जैसी अनेक कुप्रथाएँ अर्द्धनैतिक रूप से स्वीकृत हो गयीं । युद्ध की नैतिकता विजेता को सामूहिक बलात्कार का अधिकार दे देती है । यह प्रकृति के विरुद्ध है । इससे बलात्कारी कभी भी तृप्त नहीं होता, वह तो आगे चलकर उन्मादी एवं मनोग्रंथियों से ग्रस्त हो जाता है, पीडि़त या पीडि़ता प्रतिरोधी या अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं ।
स्वंय उलझकर या आधा-अधूरा अनुभव प्राप्तकर जब हम निर्णायक बनते हैं तो समस्या निंरतर उलझती जाती है । कोई सूत्र ही नहीं मिलता । बातें परस्पर विरूद्ध लगती हैं । अनावश्यक कौतूहल, दमन, एवं बढ़ते आकर्षण का संकट गहरा होता जाता है ।
                इन बातों की सच्चाई को स्वीकार करते हुए इस पुस्तक में सहज प्राकृतिक नियमों का निरूपण किया गया है । प्रयास किया गया है कि अब तक के सभी प्रमुख यौन सुख संबंधी प्राकृतिक उपायों का समावेश हो एवं वर्तमान की उलझनों को सुलझाने का ऐसा सुलभ मार्ग हो जो  अधिकतम लोगों को अनुकूल हो । जो ढोंगी, अतिवादी या अत्याचारी हैं, उन्हें यह पुस्तक बिलकुल नापसंद होगी क्योंकि यह उनके मुखैटे को उतारने का प्रयास करती है । लंबी अवधि तक चुंबन, अलिंगनादि प्रारंभिक क्रीड़ाओं से लेकर भागलिंग के घर्षण तक की- प्रक्रिया यहाँ भी स्वीकृत है किंतु गहरा सुख, गहरी तृप्ति तो  स्खलनकालीन सुख की गहराई एवं विस्तार में उतरने में है । उस चरम अनुभूति के काल की वृद्धि जो सामान्य जनों के लिए कुछ क्षणों के लिए होती है जब घंटों, दिनों एवं असीमकाल तक हो सकती है तब वह आनन्द वस्तुतः इतना गहरा होता है कि संसार के सभी सुख उसमें समा सकते हैं । इसकी उपलब्धि विपरीत लिड्ग़ी के सहयोग से रतिक्रिया के द्वारा एवं योगभूमि में ध्यान-प्राणायाम द्वारा अपनेशरीर में बिना किसी बाहरी संयोग के भी संभव है। यही भारतीय सिद्ध परंपरा की मानवता को देन है ।
विभागः- इस छोटी सी पुस्तक में 80 सूत्र है जो चार अध्यायों में विभक्त हैं। पहला- आधार खण्ड है । इसमें रतिसुख विषयक मूलभूत प्राकृतिक सिद्धांतों को सूत्रबद्ध किया गया है । दूसरा विक्षेप खण्ड  है, इसमें यौनसुख संबंधी उलझनों एवं उसकी प्रक्रिया का निरूपण है । तीसरा खण्ड उद्धार खण्ड है । इस खण्ड में यौन सुख की सामान्य एवं उदात्त अवस्थाओं का वर्णन है । चौथा खण्ड- उद्धार साधन खण्ड है । इस खण्ड मेें रतिसुख की उदात्ततम अवस्था तक पहुँचने के अनेकविध उपायों के साथ  इस संसार के सुखों की प्राप्ति की मूलभूत प्रक्रियाएँ संग्रहीत हैं ।
 सावधानियाँ एवं स्पष्टीकरण
      कामसूत्र जैसी,विस्तृत एवं विख्यात पुस्तकों के बाद भी ‘रति-सूत्र’जैसी संक्षिप्त पुस्तक की प्रबल आवश्यकता है एवं सार्थकता है, जिसे सावधानियाँ एवं स्पष्टीकरण शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है।

सावधानियाँ एवं स्पष्टीकरणः-
कामसूत्रः-यह काम को विलास के रूप में ग्रहण करता है। उसकी विधियाँ मूलतः राजे-महाराजों के वैभव विलास के लिए है। सामान्य मनुष्य के लिए यह बहुत कम उपयोगी है। यह कामानंदतक सीमित है,उसके उदात्ततम रूप ब्रह्मानंद तक इसकी गति एवं दृष्टि नहीं है। परदारागमन, वाजीकरण के विविध योग एवं उपाय इसे स्थूल स्तर तक सीमित एवं नीति निरपेक्ष बनाते हैं। यह पुरुष प्रधान है।

रतिसूत्रः-यह पुस्तक काम को पुरुषार्थ एवं उपादेय मानती है इसलिए परोत्पीड़न, खंडित सुख के स्थान पर कामानंद से ब्रह्मानंद तक का मार्ग भी बताती है।
-रतिसुख को लक्ष्य मानने पर अन्य बातों की चिंता बेकार है।
-मनुष्य का अस्तित्व निरपेक्ष नहीं है। अतः सहयोगी के साथ पूरा वातावरण ही उसे प्रभावित करता है।
यह पुस्तक काम को उपादेय पुरुषार्थ के ंरूप मंे भौतिक रूप में एवं उसके सर्वसुंदर, सर्वव्यापी रूप में स्वीकार करती है । इस प्रकार कामशास्त्र, योग एवं तंत्र तीनों परंपराओं के प्रति यह पुस्तक आभारी है ।
इसमें वर्णित सिद्धांत एवं सूत्र उन साधकांे के अनुभवों पर    आधारित हैं, जिन्होने शास्त्रीय वचनों का गुरुपरंपरा से आचार एवं प्रयोग में लाकर परीक्षण किया है । उन साधकों के अनुभवों को भाषा एवं आकार देने का कार्य हमने किया है । इसलिए जो सत्य है वह हरगौरी का है, राधाकृष्ण का है, सिद्धों का है, साधकों का है, जो भ्रांति है वह हमारी है ।
सुधी-जनों का सुझाव एवं सहयोग सादर प्रार्थित है।
                                 रवीन्द्र कुमार पाठक
                               



       आधार खंड की परिचायिका          
       इस संसार में भौतिक रूप से रति-सुख सर्वाधिक आकर्षक है। संसार की प्रजनन क्रिया और रति-सुख का रिश्ता भी करीबी है। भारतीय परंपरा में गृहस्थों (सामान्य जनों) के लिए जीवन के चार लक्ष्य है- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। ‘‘काम’’ के अर्थ के संदर्भ में मतांतर  हो सकता है किंतु यहाँ ‘‘काम’’ का अर्थ सामान्य रूप से सभी प्रकार के इंद्रियग्राह्य सुख एवं मैथुन-सहवास का सुख विशेष रूप से अभिप्रेत है। आगे इसी अर्थ में ‘‘काम’’ शब्द का व्यवहार होगा।        
       सुख पाने में सभी इंद्रियाँ प्रवृत्त हैं फिर भी मैथुन सुख के सामने सामान्य जन (भूख आदि की शांति के बाद) अन्य सुखों को गौण ही मान पाते हैं। मैथुन सुख भी सभी को समान रूप से प्राप्त नहीं हो पाता है। इसी कारण मैथुन सुख प्राप्ति में  सबकी प्रवृत्तियों एवं वेग में अंतर पाया जाता है। सुखानुभूति के इसी अंतर के कारण सामान्य लोगों से लेकर विचारकों, चिंतकों तक की धारणाओं में अंतर पाया जाता है। जो विचारक प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाण की तुलना में आप्त आदि प्रमाणों में अधिक श्रद्धा रखते हैं, वे प्रायः बिना समझे-बूझे बकते रहते हैं या परंपरा और लोक लज्जा आदि के व्यावसायिक भय से सत्य बात को प्रकाश में नहीं लाते । आज के वैज्ञानिक युग में अनुशासित सत्यान्वेषी जिज्ञासुओं (सायंस की विवेकशीलता में विश्वास करनेवाले) के बीच सत्य को प्रकाशित करना जरूरी है। योग एवं विज्ञान की विविध धाराओं की यही वर्तमान परंपरा है। अतः रति-सुख संबंधी चर्चा अब गोपनीय नहीं रह सकती ।

आवरण हटाएंः-
       आहार, निद्रा, भय एवं मैथुन भारतीय परंपरा के अनुसार अन्य प्राणियों की तरह मानव में  भी  नैसर्गिक  है । मैथुन को अनैतिक, समाज-कल्याण-विरोधी,  आत्म-कल्याण-विरोधी, ज्ञान-विरोधी,
धर्म-विरोधी या नैतिकता-विरोधी लाख कहते रहंे, समाज एवं परिवार की धुरी आज तक काम ही है। इस विषय पर आवरण द्वंद्वात्मक भावनाओं एवं प्रश्नों का जनक है, जैसे- ऋषियों की  संततियाँ थीं और ब्रह्मज्ञान के बिना ब्रह्मचर्य तो मिलता ही नहीं, विश्वामित्र, नारद, व्यास को भी स्त्री की अभिलाषा हुई और कुछ ने प्रजोत्पत्ति भी की। कृष्ण को नैष्ठिक ब्रह्मचारी क्यों कहा गया ? विवाहित पुरुष का पर स्त्री से शारीरिक संबंध उचित है या नहीं ? स्त्री को तो सती-पतिव्रता होना चाहिए किंतु संतानोत्पत्ति के लिए पर पुरुष से सहवास क्या परंपरा में विहित नहीं है ? मुक्त यौन-संबंध या समलैंगिक सुख को मान्यता क्यों नहीं ? गृहस्थ बड़ा या संन्यासी ? वामाचारी ठीक या दक्षिणाचारी ? वैष्णव ठीक या शाक्त? इस प्रकार के अनेक प्रश्न लोक मानस में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं। इनका उत्तर पाने के लिए खुला चिंतन जरूरी है और इसके लिए जरूरी है अपनी बद्धमूल मान्यताओं के आवरण को हटाना।
        इसके लिए आप स्वयं पहले अपने अनुभवों को स्मरण करें और उनके अंतर के संदर्भो को स्मरण करें। कुछ बातें यहीं से समझ में आने लगेंगी। विद्वज्जन योग एवं तंत्र के रहस्यों को प्रकाश में लाएं। आधुनिक विज्ञान गं्रथियों के श्राव, तंतुओं के तनाव एवं रक्त बहाव की भाषा में समझ लेगा? जो बचेगा उन्हे अल्फा, बीटा, थीटा, गामा तरंगों को नापकर समझ लेगा। ऐसा करने पर आप तंत्र को समझ सकेंगे। खजुराहो, कोणार्क, एवं पुरी का मूर्तिशिल्प भी समझ में आयेगा। कृष्ण, शिव को समझने में सुविधा होगी। सामाजिक समस्याओं पर यथार्थ पकड़ हो सकेगी और आपका तनाव बहुत हद तक दूर हो सकेगा। घृणा, मिथ्या दंभ, लालच, कंुठा, हीन भावना से मुक्त होने में बहुत सहायता मिलेगी।

रति-सुख, रति-शास्त्र, यौन-शिक्षा
रति सुख हमारा अभीष्ट है तो रति-शास्त्र भी होना चाहिए और उसकी व्यावहारिक शिक्षा भी होनी चाहिए। अभी तक वात्स्यायन एवं परवर्ती आचार्यों के जो प्रचलित शास्त्र हैं- वे सुख के न्यूनतम भाग की प्राप्ति का उपाय बताते हैं। यथार्थ में ये शास्त्र रतिसुख की प्राप्ति की पराकाष्ठा (स्खलन-विसर्जन, विस्मृति-सुख) की पूर्वावस्था (उत्तेजना-प्रधान-सुख) को बढ़ाने के उपाय खोजने में ही थक जाते हैं। इन शास्त्रों से काम नहीं चल सकता। ये एकांगी हैं। हमें यथार्थ को अधिक व्यवस्थित एवं सटीक रूप से जानना है। अतः रतिशास्त्र में उपर्युक्त सभी विषयों की गवेषणा का समावेश अपरिहार्य है अन्यथा रतिशास्त्र व्यभिचार एवं उत्तेजना का शास्त्र मात्र बनकर रह जायेगा और क्षणिक आनंद, आकर्षण, व्यग्रता, असंयम, निराशा, हिंसा को बढ़ावा देता जाएगा।
       भारत में यौन-शिक्षा के प्रचार-प्रसार की जरूरत शहरी लोगों द्वारा बताई जा रही है, जिन्हें गांवों के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है। गांव के बच्चे-बच्चियों को पशुओं की उपमा द्वारा 20 मिनट में ही उपयोग की बातें बता दी जा सकती हैं। परिवार के पंरपरागत विविध अंतरंग मजाकिया रिश्तेवाले सदस्य विवाह या विवाह के निकट-पूर्व बता भी देते हैं और जो समझ (सैद्धातिक) आधुनिक यौन शिक्षा दे सकती है, वह उन्हे प्राप्त हो जाती है क्योंकि पशु-पालन के क्रम में स्तनपायी जानवरों की विविध अवस्थाओं जैसे- शैशव, यौवन, रत्युद्रेक, (सहवास की प्रबल इच्छा) असंयमित रत्युद्रेक, कृत्रिम कारणों, शल्यप्रक्रिया या बीमारी के कारण सहवास, गर्भ-वृद्धि, प्रसव, प्रसव-पीड़ा, प्रजनन-सुख, वात्सल्य-सुख और पुनः वयवृद्धि के साथ प्रजनन के पूर्वाभ्यास से लेकर प्रजनन तक की प्रक्रिया का वे केवल न चश्मदीद गवाह बनते है, अपितु कभी कभी उनका आंशिक सहयोगी भी। जानवरों के गर्भाधान के  लिए मादा को लेकर  सांड़, भैंसे, बकरे के पास ले जाना गांव के बच्चे या युवक के लिए आम बात है और जानवर पर्दे में बच्चा पैदा नहीं करते। यह बात धनी से गरीब सब के लिए आम बात है और गोपनीयता की तो कोई कल्पना ही नहीं करता। चर्चा के लिए शिष्ट, अशिष्ट सभी तरह के शब्द प्रचलित हैं। गरीबी जहां जितनी अधिक है, आवरण उतना ही कम। गांव के लोग केवल गर्भ-निरोध एवं कृत्रिम-प्रजनन की विधियों की विविधता एवं लिखित तथा उत्तेजनाशास्त्र को नहीं जानते हैं ।
रति-सुख क्या है?
       स्त्री-पुरुष का एक दूसरे के प्रति वैसा आकर्षण, जो रति-क्रिया में जाकर विलीन होता हो यह एक भाग है। रति-क्रिया, जिसमंे दोनो के शरीर मूल उपादान हैं दूसरा भाग है और उत्तेजना-विसर्जन, विस्मृति, आनंद आदि तीसरा भाग है। तीसरे भाग का चरम आनंद एवं विस्मृति, जो प्रायः क्षणिक एवं अनुभवगम्य है, व्यापक एवं स्थायी प्रभाव उत्पन्न करता है क्यांेकि रति-सुख अन्य सुखों से अनुपूरित एवं विशिष्ट है। यही कारण है कि इसके प्रति लोगों का आकर्षण अत्यधिक है। सुखानुभूति की प्रक्रिया अभी भी शोध का विषय है, फिर भी बहुमान्य तथ्य (जो यथार्थ) है कि ज्ञानेन्दियों द्वारा अपनी इच्छानुकूल अनुभूति की सूचनाएँ मस्तिष्क के संग्राही केंद्र को प्राप्त होती हैं, तब मन को और उस माध्यम से व्यक्ति को सुखानुभूति होती है। रति-सुख में सुखानुभूति का अंतर इसी प्रक्रिया के विविध अंतरों के कारण आता है। स्वस्थ व्यक्ति में रति-क्रिया के विविध चरणों का संबंध विविध अंतःस्रावी ग्रंथियों से एक निश्चित क्रम में रहता है और शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य/संतुलन के अभाव में यह क्रम टूट जाता है, परिणामतः रति-सुख की अनुभूति व्यक्ति-विशेष को भी समय समय पर भिन्न या विविध व्यक्तियों को विविध प्रकार की ं होती हैं।
       यह आनंद मिथुन (जोड़ां)े को व्यावहारिक रूप से होता है। यह श्रृंगार रस का विषय है। इस  आनंद प्रक्रिया को ‘अभिनवगुप्त’ के सूत्र की भाषा में ‘विभावानुभावव्यभिचारि-संयोगाद्रसनिष्पतिः’ कह सकते हैं। रति-सुख का सांसारिक रूपवाला चरम आनंद उसे ही प्राप्त हो सकता है, जिसकी पांचों ज्ञानेंद्रियाँ अपने विषयों को एकत्र अपने साथी में पा जाती हैं और मन किसी प्रकार के निषेध या भय से मुक्त रहता है, जैसे रूप, रस, (होठ आदि चूसकर स्वाद पाना) गंध (विविध प्राकृतिक त्रावों के या अस्वस्थता में दुर्गंध होने पर इत्र आदि द्वारा) शब्द, (मधुर प्रेमालाप या सीत्कार आदि प्राकृतिक शब्द) स्पर्श (संपूर्ण शरीर सामान्य रूप से ) स्वेच्छापूर्वक एवं गुप्तांग उत्तेजना-ग्राहक संवेदनशीन अंग का विषय । स्खलनकालीन अनुभूति की गहराई एवं अवधि का विस्तार जितना अधिक होगा सुख, स्वास्थ्य आदि उतने ही बढे़ंगे।
       सांसारिक शब्द जोड़ने का सीधा मतलब आम आदमी से है। इस संसार में बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो मजबूरी में (अधिकांश) या स्वेच्छा से (बिरले) रति-सुख पाने की अन्य प्रक्रिया को चुनते हैं। जैसे हस्तमैथुन आदि अप्राकृतिक मैथुन या चरमानुभूति को बढ़ाने की जगह रति’क्रिया काल को बढ़ाना। रतिक्रिया काल में भी एकाग्रता तो आ ही जाती है औार पांचों ज्ञानेंद्रियों का एकाग्र समन्वित सुख भी कम प्रभावकारी नहीं होता। ऐसा वे लोग करते हैं जो विस्मृति से डरते हैं या विस्मृति एवं आनंदानुभूति के काल की क्षणिकता तथा बाद के शैथिल्य की स्मृति जिन्हें दुखी कर देती है विशेषकर जिन युगलों के बीच के जीवन में गहरे प्रेम एवं समर्पण का अभाव हो एवं या बिस्तर पर कम से कम दो-तीन घंटे स्खलनोंपरांत सोने का अवसर न प्राप्त होता हो या जो इसी प्रक्रिया को गर्भ-निरोध का अंग बनाए हुए हों। कृत्रिम रति सुख के प्रकारों मे से कुछेक की चर्चा आगे की जा रही है। इस प्रकार के रति-सुख को कृत्रिम इस लिए कहा जा रहा है क्योंकि व्यक्ति को इसमें कल्पना का सहारा लेना पड़ता है। कामुक वर्णन, चित्रादि से युक्त साहित्य या प्रत्यक्ष युगल प्रेम-क्रिड़ा का दर्शन कुछ लोग अपनी दभित इच्छा की पूर्ति करते हैं। आजकल ब्लू फिल्में देखने का उदाहरण आ सकता है।

तात्त्विक रति सुखः-
        रति-सुख का यही प्रकार गोपनीयता एवं विवादों से भरा है और आम आदमी की पहुँच यहाँ तक नहीं है। यही योग, तंत्र, परामनोविज्ञान आदि की गवेषणा का विषय है। फिर भी इसे समझना या इस सुख को भोगना कोई असंभव कार्य नहीं है। मेरी दृष्टि से तो इस सुख के क्षेत्र में प्रवेश अति दुष्कर भी नहीं है। इस सुख का मानसिक स्वरूप और प्रक्रिया भी मिथुन जन्य सुख की तरह ही है। स्नायविक संरचनाओं का क्रिया-व्यापार, तांत्रिका-तंत्र द्वारा संवेदनाओं का अनुभव एवं मस्तिष्क को सूचना, संप्रेषण की प्रक्रिया भी बहुत हद तक वही है। इसमें भी कामोत्तेजना की अनुभूति होती है। गुप्तांग एवं उसके आस पास के भागों में रक्त संचार एवं उत्तेजनात्मक अनुभूति उसी प्रकार की होती है, मांसपेशियों, रक्तवाहिकाओं की शारीरिक प्रतिक्रिया भले ही भिन्न हो, मानसिक अनुभूति पूरे शरीर में वैसी ही होती है और अधिक गहरी तथा प्रभावकारी होती है। जैसे सामान्य सहवास में उत्तेजना को संभालना कठिन होता है और शीघ्रस्खलन की समस्या रहती है या अतृप्ति की दशा में स्नायविक तनाव जन्य समस्याएं पैदा होती हैं उसी प्रकार उत्तेजना न संभाल पाने की दशा में कई प्रकार की समस्याएं होती हैं। स्खलन की आशंका तो नहीं रहती है किंतु कामाग्नि बुरी तरह भड़कती है और केवल रति-सुख का वेग रहता है। रूप, रस, गंध, शब्द, कुछ भी मायने नहीं रखते। सहवास के समय की उत्तेजना की तरह की उत्तेजना ही प्रमुख रह जाती है। आप यदि इस उत्तेजना को संभाल लेते हैं तो उत्तेजना की चरमावस्था पर सहवास के समय का पराकाष्ठावाला क्षण आता हैं, आपको भय हो सकता है, अब स्खलन हो जाएगा और पुनः वही पुरानी समस्याएं शिथिलता, थकान आदि आ खड़ी होंगी किंतु होता ऐसा नहीं है। एक क्षण आत्मविस्मरण का आता है और तदनंतर आनंदानुभूति की अवधि आती है, जो व्यक्ति के अंतर से मिनट दो मिनट से लेकर घंटों तक का हो सकता है, जो सुख सांसारिक आम आदमी के जीवन में क्षण मात्र के लिए आंशिक रूप से आकर ललचाकर चला जाता है।
       इस तात्विक (केवल रति-सुख) अनुभूति को भी अन्य उपायों से पाया जाता है और फिर एक गहरी अनुभूति क्रम इसी प्रकार  चलता रहता है। जिसने वह रस पिया उसे क्षणिक रस में कोई आनंद नहीं आएगा लेकिन ऐसे अनेक उदाहरण प्राप्त हो सकते हैं। जहाँ साधक ने आत्मरति की पूर्वोक्त प्रक्रिया के अधीन दीर्घकालीन अनुभूति प्राप्त की हो और विपरीत लिंगी के साथ सहवास हेतु आतुर भी हो। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि आत्मरति में उत्तेजना की प्रगाढ़ता का स्तर चाहे जो हो रूप, रस, गंध, शब्द आदि बाह्य विषयों का आलंबन एवं सहयोग नहीं प्राप्त हो पाता है। इसलिए अनेक    साधक बाद में रूप, रस, शब्द, गंध आदि के प्रबल आकर्षण के माध्यम से  स्त्री या पुरूष के शरीर में, तदनंतर रतिक्रिया में आसक्त हो जाते हैं।






           प्रथम अध्याय
     



              आधार खंड


1.  अथ रतिचर्चा
     अब यहाँ से रति-विषयक चर्चा का शुभारंभ किया जा रहा है ।
ष्     अथ षब्द षुभारंभ का वाचक हैै। यह स्वयं मंगलवाची है। हमारा जीवन आनन्दमय हो यह हमारी सनातन इच्छा है और यह रति तो संपूर्ण घनीभूत सुखों की पराकाष्ठा है। आगे रति की प्रक्रिया के क्रम में जीवन के सबसे धनीभूत आनन्द तक पहुँचने के मार्ग एवं उपाय की चर्चा की जाएगी।

2. रतिशब्दः नानार्थकः
         रति शब्द का प्रयोग अनेक अर्थांे में होता है,जैसे-मदन प्रेम/की पत्नी आकर्षण, रुचि, सुख आदि ।

3. कामार्थे सामान्येन प्रयुक्तः
     काम के अर्थ में साधारणतया इस शब्द का प्रयोग किया जाता है।
        भारतीय संस्कृति में स्त्री-पुरुष के सहज आकर्षण को शुभ एवं दैवी माना गया है। स्त्री में यौन इच्छा सदैव रहती है। उसे बहुत प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती। ऋतुकाल में स्वतः यह प्रगट होती है। ऋतुकाल दो प्रकार का होता है, वसंत आदि सामान्य एवं मासिक धर्म का समय। ऋतुकालीन इच्छा का आदर करना अनिवार्य है क्योंकि यह धार्मिक कृत्य है। ऐसा न करने पर उस स्त्री का पति पाप का भागी होता है। इसी कारण विवाह के योग्य कन्या का विवाह न करनेवाला पिता भी पाप का भागी होता है। ऐसा निरूपण धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में अनेकत्र किया गया है। इसी रूप में काम व्यक्ति के जीवन के चार लक्ष्यों में एक है। पुरुषार्थ चार हैं -धमर्, अथर्, काम एवं मोक्ष। काम पुरूषार्थ के संदर्भ में रति शब्द का सामान्य रूप से प्रयोग होता है।

4. इह विपरीतंिलंगिसम्मिलनसुखे रूढ़ः
     यहाँ यह शब्द विपरीत लिगियों के सम्मिलन में होनेवाले सुख के संदर्भ में पारिमाषिक रूप से प्रयुक्त है ।
        जब कोई शब्द भिन्न अर्थांेवाला हो तो उसके माध्यम से चर्चा को आगे बढाना कठिन होता है, मतिभ्रम की आशंका होती है इसलिए अर्थ को स्पष्ट एवं  निर्धारित करना आवश्यक होता है। इसी दृष्टि से यहाँ रति शब्द का प्रयोग 7 हीं। रति शब्द का प्रयोग केवल मनुष्य ही नहीं सभी प्रकार के विपरीत लिगिंयांे के संदर्भ में समझना चाहिए। इसी प्रकार समान लिंगियांे में भी आकषर्ण होता है। कुछ लोग समलैंगिक अप्राकृतिक मैथुन में भी सुख अनुभव करते हैं। किंतु यहाँ वैसा सुख रति शब्द के अर्थ के रूप में ग्राह्य नहीं है।
5. तदपि पूर्णांश भेदेन भिन्नः
     वह भी पूर्ण एवं अंश के भेद  से भिन्न होता है ।
        यह रति सुख भी पूर्ण एवं अंश के भेद से भिन्न होता है। मिलन की प्रक्रिया में विविध स्तरेां पर आंशिक सुख होते हैं। जब मिलन की प्रकिया पूरी हो जाती है तो सुख पूरा होता है। इसी प्रकार सृष्टि में व्याप्त संपूर्ण रति इच्छा का जो चरमोत्कर्ष है, जो हरगौरी का सामरस्य या सिद्धों का युगनद्ध रूप है, वह अर्द्धनारीश्वर का रूप ही संपूर्ण सुख है। इसी प्रकार यह रति सुख पूर्ण एवं अंश के भेद से भिन्न है। फिर भी मूलतः यह पूर्ण सुख का ही भाग है।
6. पर्यायेऽपि समानता
     रति शब्द के विविध पर्यायों (विविध पर्यायवाची शब्दों एवं अर्थों) में भी (कुछ न कुुछ) समानता होती है ।
       जैसा कि पहले कहा गया है रति शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों मंे होता है। फिर भी उन विभिन्न अर्थों में भी समानता होती है। वह समानता कभी पूर्ण या कभी अंश के संदर्भ में होती है। कभी कभी सुख की थोड़ी या अधिक अनुभूति रूपी अर्थ की समानता अवश्य होती है। नर-मादा का आकर्षण या महासुख सभी अर्थों में रति शब्द का प्रयोग होता है। इसी प्रकार आकर्षण एकाग्रता आदि की प्रक्रिया में भी सुख की अनुभूति समान धर्म है।

7.रतिसुखस्य सर्वसुख-प्राधान्यं गुरूत्वम् च सर्वेन्द्रियसन्निवेशभोगसुखावसरसामर्थ्यात् ।
      रति सुख सभी सुखों में प्रधान एवं गौरवपूर्ण है क्योंकि इस सुख में सभी इन्द्रियों के द्वारा भोगे जानेवाले सुखों के एकत्र सन्निविष्ट होने का सामर्थ्य है ।
       रति सुख का महत्त्व सभी मानते हैं किंतु यह प्रश्न आम आदमी के सामने अनुत्तरित रहता है कि आखिर सभी सुखों के बाद भी रतिसुख के प्रति आदमी का इतना अधिक आकर्षण क्यों है ? सुख का भोग तो पाँचो इन्द्रियों के माध्यम से होता है और सुख के अनेक साधन भी संसार में हैं फिर भी विपरीत लिंगियांे के सम्मिलन सुख की प्रगाढता का कारण क्या है?
       इसी प्रश्न का उत्तर इस सूत्र में दिया गया है कि अन्य सुखेां मेें एक या दो इन्द्रियों के माध्यम से सुख प्राप्त होता है किंतु रतिसुख इसलिए सर्वाधिक गौरवशाली एवं प्रधान है क्योंकि रतिसुख की प्रक्रिया में युगलों (विपरित लिगियांे) की सभी इन्द्रियाँ अपना अवलंबन प्राप्त कर सकती हैं, उसमें संलग्न हो कर सुख का पूर्ण अवसर प्रदान कर सकती हैं।                                                                                                      
       दुर्भाग्यवश लेाग इस सहज प्रक्रिया पर ध्यान नहीं देते हैं और रतिसुख का आंशिक भोग ही कर पाते हैं। यदि निम्न प्रकार से इन्द्रियों का संयोजन हो तो कोई कारण नहीं है कि रतिसुख में इस संसार का सर्वाधिक सुख प्राप्त न हो-
       भोक्ता -विपरीत लिंगी स्त्री एवं पुरूष      
       आलंबन -अपने अपने सहभागी , परस्पर , उभयपक्ष एवं
       परिवेश ।
       प्रक्रिया - आकर्षण, मिलन एवं सुख भोगकी ।
       आलंबन - आँख से रूप का आलंबन , नासिका से सुगंध,
    जीभ से रसानुभूति, आनन्देन्द्रिय-नाडियों में होनेवाला प्रवाह, लिंग एवं योनि, मन (  इसे भी कुछ लोग इन्द्रिय मानते हैं )- स्वीकृति एवं अहंकार का विसर्जन । सभी दुखों से उस समय तक विस्मृति, मुक्ति । परिणामतः अपूर्व आनन्द की अनुभूति ।
      यदि किसी युगल को दुर्याेग से सभी इद्रियों से एक ही आलंबन में सुख का अवसर प्राप्त नहीं होता हो, वह किसी भ्रम, कुंठा या विपरीत स्थिति से ग्रस्त हो तो इसका कारण यह कहा जा सकता है कि उसे रतिसुख का वैसा विशेष सामर्थ्य नहीं है। इसी प्रचंड सामर्थ्य के कारण तो अन्य सुखों के भोग के बाद भी रंितसुख का आकर्षण भोगी के मन में प्रबल रहता है। इसके खंडित होने एवं उससे उत्पन्न अन्य समस्याओें तथा उनके समाधन की ही विस्तृत चर्चा इस पुस्तक में आगे की गयी है।

8. रति-ब्रह्मचर्ययोः सापेक्षत्वम् ।
   रति एवं ब्रह्मचर्य दोनों (परस्पर) सापेक्ष हैैं ।
      रति के बिना न तो ब्रह्मचर्य  अैार न ब्रह्मचर्य के बिना रति । दोनो सापेक्ष हैं । एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही संभव नहीं है। जो लोग ब्रह्मचर्य का अर्थ सभी विपरीत लिंगियों के प्रति आकर्षण मात्र से निवृत्ति या निषेध मानते हैं उनके लिए भी ब्रह्मचर्य हेतु रति आवश्यक है। मृत, नपुंसक या अशक्त को ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी नहीं कहा जा सकता ।

9. भावाभावमुखेन द्विविधम्
     भावात्मक एवं अभावात्मक दृष्टि से ब्रहमचर्य दो प्रकार का होता  है फिर भी (ब्रह्मचर्य साधना की) विविध शैलियों के भेदों के आधार पर (यह) अनेक प्रकार का है।
       ब्रह्मचारी शब्द का प्रयोग शास्त्र एवं समाज में दो प्रकार होता है। भावात्मक एवं अभावात्मक । इस मुख्य विभाग के बाद भी ब्रह्मचर्य की साधना-प्रणाली के भेद से ब्रह्मचर्य को नाना प्रकार से निरूपित किया जाता है। इसका वर्णन आगे किया जा रहा है।

10. दारागारापरिग्रहत्वात् निरोधपथे अभावदृष्टिः।    
     पत्नी एवं घर के परित्याग के आधार पर निरोधमार्ग की दृष्टि अभावात्मक किंतु आगम की दृष्टि भावात्मक है।
        ब्रह्म की चर्चा ब्रह्मचर्य है। जो लोग स्त्री एवं गृहस्थी को ब्रह्मचर्य में विध्न मानते हैं उन्होने इनके परित्याग को ब्रह्मचर्य नाम  दे दिया है। जिनकेे लिए साधना प्र्रधान है वे स्त्री केा विक्षेप न मानकर सहयोगी मानते हैं। जो लोग ब्रह्मचर्य को अभावात्मक समझते हैं वे निरेाध का अभ्यास करतेे हैं। धर में निरेाध का अभ्यास प्रारंभ करने से जो साधना शुरू होती है वह घर एवं पत्नी के परित्याग में परिपूर्ण होती है। साधना के अनिवार्य घटक के रूप में गृह एवं पत्नी का त्याग एवं निषेध अनिवार्य होता है।
       इससे भिन्न आगम में भावात्मक दृष्टि होती है। आगम अर्थात् तंत्र की साधना में पत्नी एवं घर को छोड़ने की अनिवार्यता नहीं होती है। बल्कि तंत्र में कहीं कहीं स्त्री का सहयोग अनिवार्य भी माना जाता है। वाममार्गी साधकों मेें स्त्री-पुरूष का सबंध  तो होता है किंतु स्खलन नहीं होने दिया जाता है। कामसुख कोे विविध चक्रों मेें      ऊर्ध्वगामी  बनाया जाता है। सामान्य गृहस्थ अपनी पत्नी के प्रति कामानुराग एवं अन्य के प्रति विरागपूर्वक ब्रह्म की उपासना का अभ्यास करते रहतंे है। इस आधार पर प्रवृत्ति मार्ग एवं निवृत्ति मार्ग का भी नामकरण होता है।  

11. सेन्द्रियेन्द्रियोत्तरभेदेन रतिर्द्विविधा ।
    इन्द्रियसहगत एवं इन्द्रियोत्तर भेद से रति दो प्रकार की होती है ।
       सामान्यतः रतिक्रिया एवं सुखानुभूति इन्द्रयों के द्वारा होती है। संासारिक रति केवल सेन्द्रिय है। चाहे वह दक्षिणमार्गी गृहस्थेंा की रति हो या वाममार्गी साधकांे की। वस्तुतः जब कोई साधक अपनी मानसिक शक्ति द्वारा अपने भीतर की इडा-पिंगला को साम्यावस्था में लाकर मूलाधार से रतिसुख को ऊपरी चक्रों में भेजता है तो वह इन्द्रियोत्तर अर्थात् सेन्द्रिय रति से मुक्त होता है। प्रकृति में व्यापक रूप में स्थित विपरीत लिंगियेां की रति इसी प्रकार की सेन्द्रिय होती है। अन्य की मैथुन या रति दो प्रकार की समझी जा सकती है या देखी जा सकती है।
 
12. प्रत्यक्ष एवात्र प्रमाणं रतेर्नैसर्गिकत्वात् ।
     रति के नैसर्गिक होने के कारण इसके प्रस› में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है ।
     चूँकि रति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो विभिन्न रूपों में विभिन्न स्तरों पर व्याप्त होती है। इसकी स्थिति एवं स्वरूप का प्रमाण प्रत्यक्ष ही है। इसे तर्क से सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि किसी को किसी भी अवस्था या स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता हंो तो वह उस व्यक्ति के अवयवों या प्रक्रिया का दोष है क्योंकि दूसरे को रति के उसी स्वरूप का अनुभव हो जाता है। कोई भी व्यक्ति अपने दोषंेा को दूर कर प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।

13. तत्प्रत्यक्षमपि लौकिकयोगजभेदेन द्विविधम् ।
     वह प्रत्यक्ष भी लौकिक और योगज भेद से दोप्रकार का होता है उसी प्रकार लौकिक एवं योगज भेद से रति साक्षात्कार भी दो प्रकार का होता है।
        प्रत्यक्ष दो प्रकार का शास्त्रो में माना गया है। 1-लौकिक जो पाँच ज्ञानिन्द्रियांे द्वारा होता है। 2-योगज जो साधक योगसाधना द्वारा बिना इन्द्रियों के सहयोग से अनुभव करता है । इसी प्रकार रति-साक्षात्कार भी दो प्रकार का होता है। लौकिक एवं योगज। लौकिक रति-साक्षात्कार निम्न रूप में होते हैं। (क) एक या एक से अधिक इन्द्रियों का विपरीत लिंगी रूपी आलंबन के साथ भौतिक संयोग। (ख) स्वप्न या दिवास्वप्न में आलंबन का स्मृति रूपी संयोग। स्मृति से भी उत्तेजना आदि प्रक्रियाए हो जाती हैं। स्वप्न में तो पूरी सृष्टि ही मनेानुरूप हो जाती है। (ग) कभी कभी उपर्युक्त क्रिया मानसिक आलंबन के न रहने पर भी रज वीर्य का अत्यधिक संचय हो जाने ,पेट में गरमी होने या जननेन्द्रियांे का किसी पदार्थ से घर्षण होने पर भी रति का अनुभव होता है। इसी को स्वप्नदोष कहा जाता है।योगज रति साक्षात्कार योग-तंत्र साधना की विविध क्रियाओं द्वारा होता है। यह साधना भी मार्गभेद से अनेक प्रकार की दीखती है किंतु तत्त्वतः एक ही प्रकार की होती है। इसमें स्खलन को रोककर अनुभवको व्यापक गहरा एवं दीर्घकालीन बनाकर मस्तिष्क के केन्द्र (सहत्रद) मंे स्थिर करने का अभ्यास एवं विविध स्त्तरों पर गहन से गहनतर सुख का साक्षात्कार किया जाता है।

14. लौकिकं स्त्रीपुरुषेन्द्रियसंयोगात् स्वप्ने वा दिवास्वप्ने वा स्मृत्युपस्थानात् ।
     लौकिक (रति सुख का साक्षात्कार) स्त्री एवं पुरूष के इन्द्रियों के संयोेग से या स्वप्न अथवा दिवास्वप्न में स्मृति  के उपस्थित होने से होता है। इसके अतिरिक्त रज या वीर्य के अति संचित हो जाने या जननेन्द्रिय का किसी भी पदार्थ से संघर्ष से भी हो जाता है ।
    चूँकि इस पुस्तक का मूल प्रतिपाद्य रति-सुख का उदात्तीकरण एवं चरमानुभूति का मार्ग एवं प्रक्रिया है न कि उत्तेजना। अतः यहाँ रतिक्रिया की विविधता का विवेचन नहीं किया जा रहा है।

15. योगजम् ध्यान-प्राणायाम-मुद्रा-बंधाभ्यासमुखेन समग्रजेनैकेन वा चक्रसंचलनात् ।
     योगज रति साक्षात्कार ध्यान, प्राणायाम, मुद्रा एवं बंध के अभ्यास के द्वारा संपूर्ण या किसी एक चक्र के चलायमान  होने के कारण होता है ।     योगज रतिसाक्षात्कार के लिए यौगिक प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। इसके लिए मुख्यतः ध्यान, प्राणायाम, मुद्रा एवं बंध का अभ्यास करना पडता  है। इस अभ्यास द्वारा जब केवल एक अर्थात् मूलाधार चक्र गतिशील हो जाता है या अन्य चक्र भी गतिशील हो जाते हैं तो क्रमशः सघन से सघनतम रति-साक्षात्कार होता है। इसमें चॅंूकि विपरीत लिंगी की शारिरिक या मानसिक अपेक्षा अनिवार्य नहीं होती, न ही हस्तमैथुन की तरह किसी बाह्य इन्द्रिय का घर्षण आवश्यक होता है अपितु मानसिक अभ्यास ही प्रघान होता है अतः यह योगज रतिसाक्षात्कार है।
       मूलाधार चक्र मे स्फुरण एवं गति तो प्राथमिक अवस्था है। इसे कामानन्द कहा गया है। सहजानन्द तक उसी सुख के विकास के लिए अन्य चक्रंो की शुद्धि एवं सहयेाग  अवश्य होता है।  मूलाधार आदि चूँकि मानव के विविध चेतनास्तरेंा से जुडे रहते हैं अतः रतिसाक्षात्कार के स्तर भेद में इन चक्रांे का विविध रूप में महत्त्वपूर्ण योगदान होता हैं। इन चक्रांे की भूमिका तथा योगदान प्रत्यक्ष में तो अनिवार्य होता ही है वे लौकिक रति-साक्षात्कार में भी चक्रांे की सहभागिता रहती है।  मानव शरीर में ही चक्र रहते हैं अतः अपनी दशा के अनुसार वे अनुकूल एवं प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। उदाहरणार्थ अस्वस्थ मणिपुर चक्रवाला व्यक्ति प्रेम की स्वीकृति में भी घबराने लगेगा । अस्वस्थ स्वाधिष्ठानवाला व्यक्ति अपने साथी पर सदैव आशंका ग्रस्त रहेगा । इसी प्रकार अन्य बातों का निरूपण प्रश्नानुसार आगे किया जाएगा ।

16. रतिभं्रशो दोषः, तृप्तिः मुक्तिः ।
    रति साक्षात्कार की प्रक्रिया का बीच में टूटना स्वतः दोष है । तृप्ति ही मुक्ति है ।
         रति प्रक्रिया का अचानक टूटना ही दोष है। गहरी आनन्दानुभूति तक न पहुँचने से मन के संकल्प से लेकर शारीरिक अवयवों तक को प्राकृतिक नियमों के प्रतिकूल आचरण करना पड़ता है। मानव स्वभाववश पुनः अधिक वेग से उसी आनन्दानुभूति का प्रयास करता है । साथ ही इस भ्रंश के कारण पीडा भी होती है इसलिए रति भ्रंश को रति प्रक्रिया का दोष माना गया है। इसके विपरीत यदि प्रक्रिया पूरी हो जाती है और व्यक्ति तृप्ति का अनुभव करता  है तो उसे आनंदानुभूति तो होती ही है यह आनन्दानुभूति गहरी तृप्ति भी देती है। यह तृप्ति जितनी गहरी ओैर व्यापक होती जाती है बंधनों से मुक्ति  होती जाती है और जब साधक या साधिका सृष्टि के युगलभाव का अपने भीतर साक्षात्कार करते है, उनकी तृप्ति पराकाष्ठा की ओर जाती है। यहाँ मुक्ति  शब्द का सामान्य अर्थ बंधनों, उद्वेगो एवं पीड़ाआंें से मुक्ति है। इसके बाद साधक, साधिका की स्वेच्छा पर है कि वह रतिक्रिया में प्रजनन आदि कार्यों के  लिए प्रवृत्त हो या न हो। नित्य तृप्त शिव  को भी संतान-प्राप्ति के लिए कामक्रीडा तो करनी ही पड़ी थी । मानव की संतान-वासना प्रवल है इसके लिए वह दूसरेंा के बच्चों को भी अपनाने का प्रयास करता है।

17. तज्जन्यं विक्षेपावृत्तिदुश्चक्रं दुःखम् । तदेव बंधनम् ।
     इसके कारण विपेक्ष एवं रतिक्रिया की आवृत्ति का दुश्चक्र चलने लगता है। यही दुःख एवं बंधन है ।
       उससे अर्थात् रतिभ्रंश से विक्षेप होता है, ऊर्जा की दिशाएँ जो विविध इन्द्रियों से अपने आलंबनों की अेार गतिशील रहती हैं दिगभ्रमित हो जाती हैं और पुनः वेगपूर्वक आलंबनांे की ओर अग्रसर होती हैं यह  अतिवेग भी प्रायः रति-प्रक्रिया को पूरा होने नहीं देता है परिणामतः पुनः वेग से प्रवृत्ति होती है और कई आलंबनों मंे भ्रंश हो जाता है। उदाहरणार्थ शीघ्रस्खलन के वेग में सौन्दर्य, स्पशर्, स्वीकृति, शांति, दीर्घकालिकता का सुखवाला भाग छूट जाता है। मन की बेचैनी बढती है । इस प्रकार से व्यक्ति एक दुःश्चक्र एवं मानसिक ग्रंथि का शिकार हो जाता है। यही बंधन है अैार दुःख-रूपी है। इससे निकलने का वेगपूर्ण हर प्रयास विफलता मंे परिणत होता है। इस विषय को भलीभाँति समझना चाहिए। इसका तात्त्पर्य यह नहीं है कि व्यक्ति स्खलन तक पहुँचा या नहीं बल्कि वह उत्तेजना से प्रारंभ कर विविध आलंबनों मंे विविध इन्द्रियांे को संलग्र करता हुआ उभय पक्ष की मानसिक स्वीकृति मंे संपूर्ण कल्पना-जाल रूपी विकल्प वृत्ति से सहज मुक्त होता हुआ स्खलन के समय प्राणापान संचालन की गतिविधियंांे से भी मुक्त होकर स्खलन कालीन चरम सुख की अनुभूति कर निढाल हुआ या नहीं। सामान्य स्तर के रति-साक्षात्कार में भी युगल इतने गहरे भर जाते हैं कि उस सुख की मादकता से देर तक मस्त रहते हैं, जो उन्हे गहरे प्रेम की ओर अग्रसर करता है।

 18.पूर्णरतौ लौकिकयोगजादिपूर्णायां  पूर्णानंद-पथोद्दीपनम्।
      लौकिक एवं योगज आदि से प्रकिया  की पूर्णता के बाद जो पूर्ण रति साक्षात्कार होता है ंउससे आनन्द का पथ उद्दीप्त हो जाता है ।
       पहले रति-भ्रंश की चर्चा की गयी । इसी प्रकार पूर्ण रति को भी समझ लेना चाहिए। जैसे रति साक्षात्कार दो प्रकार का होता है उसी प्रकार रति की पूर्णता को लौकिक एवं योगज दो दृष्टियों से समझना चाहिए ।
सांसारिक स्तर पर रति की पूर्णता से तृप्ति एवं प्रेम का विकास होता है । इसके साथ-साथ यदि यह प्रक्रिया लौकिक के साथ योगज स्तर पर भी पूरी हो जाय तो आनंद का पथ उद्दीप्त हो जाता है ।
युगल परस्परावलंबन में एकाग्र, संतृप्त एवं समाहित होते हैं, जैसे ही उनकी बेचैनी दूर होती है सुषुम्ना-पथ स्वयं उद्दीप्त हो जाता है यही भोग एवं मुक्ति दोनों के एकत्र उपलब्धि का रहस्य है ।  ‘घेरंड संहिता‘ में इसी बात को निम्नरूप में कहा गया है कि
      ‘चित्ते समत्वमापन्ने वायुः ब्रजति मध्यमे।
       तदामरोली बज्रोली सहजोली प्रजायते।।‘
चित्त जब समत्त्वभाव में आता है तब वायु मध्यम (सुषुम्ना) में प्रवेश करती है। उस समय हठयोग में वर्णित स्खलनकालीन उत्तेजना एवं रजवीर्य को ऊपर के चक्रों में भेजनेवाली अमरोली, एवं सहजोली की क्रियाएँ / अवस्थाएँ (स्वतः) उत्पन्न हो जाती हैं। इसका विस्तृत विवेचन आगे (पृ0.......पर) किया गया है।
हठयोग या तंत्र की विविध प्रक्रियाओं के द्वारा पहले साम्यावस्था को प्राप्त किया जाता है। हठयोग में प्रयासपूर्वक ऊर्ध्वारोहण होता है जबकि तृप्तिमार्ग में रति की पूर्णता होने पर स्वतः आनंदपथ उद्दीप्त हो जाता है। इस अवस्था में स्खलन करना न करना साधक/साधिका की स्वेच्छा पर निर्भर करता है ।
ध्यानयोग के अभ्यास में स्खलन होता ही नहीं है क्योंकि आज्ञाचक्र के  द्वारा प्रक्रिया प्रारंभ होने के कारण या तो साधक का उस पर भीतरी नियंत्रण बना रहता है अथवा नियंत्रण छूटते ही उत्तेजना शांत हो जाती है।
यह घटना मूलाधार चक्र मेें होती है, जिसके प्रभाव से न केवल जननागों एवं उनके आस-पास के क्षेत्र बल्कि पूरा शरीर ही अप्रतिम आनंद से भर जाता है । यह अवस्था भी केवल अनुभूति-गम्य है, शब्दों में इसका सही वर्णन नहीं किया जा सकता है । सामान्यतः लोग पूर्णरति के अनुभव का सामर्थ्य नहीं रखते अतः अचानक इस अवस्था तक पहुँचना सबके वश में नहीं है । उसके पहले प्रक्रिया के भ्रंश आदि दोषों को दूर करना एवं रति के अनुभव को उदात्त करने की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसकी चर्चा आगे हो रही है ।
19. रतिशुद्धि-रत्युदात्तीकरणाभ्याम् ऊर्ध्वारोहणम्, प्रेमविकासः, ऊर्जासंचयः, विक्षेपनिरशनम् ।
     रति की शुद्धि एवं उदात्तीकरण इन दोनों के द्वारा ऊर्ध्वारोहण, प्रेम का विकास एवं ऊर्जा का संचय होता है तथा विक्षेप निरस्त होते हैं ।
     रति शुद्धि एवं रति उदात्तीकरण के द्वारा व्यक्ति चेतना, भावना एवं अनुभूति के उच्च स्तर की ओर अग्रसर होता है। उसमें प्रेम का विकास होता है। उसकी ऊर्जा की क्षति रुद्ध होकर संकुचित होने लगती है और रतिसाक्षात्कार केे सभी विघ्न समाप्त हो जाते हैं। रतिशुद्धि एवं रतिउदात्तीकरण ये दो प्रक्रियाएँ हैं । रतिशुद्धि का अर्थ हुआ कि  इन्द्रियों एवं आलंबनों का ठीक से विनियोग - जैसे पाँचों इन्दियों एवं आलंबन के बीच के अवरोध को हटाना, जैसे किसी युगल के मुख से दुर्गंध आता हो तो यह अशुद्धि है । मन नहीं मिलता हो, शरीरिक रचना अनुकूल नहीं हो, उभय पक्ष की सहमति न हो, मिलन का स्थान निर्विघ्न न हो, प्रक्रिया का सही ज्ञान न हो इत्यादि की कल्पना की जा सकती है । इसकी शुद्धि ही रतिशुद्धि है ।
रति के उदात्तीकरण का तात्पर्य यह है कि जैसे युगल अपने मिलन में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं वैसे ही अन्य के मिलन से  भी सुखी हांे, आकर्षण की दीर्घकालिकता गहरे प्रेम या कला में परिणत हो जाय, मूलाधार से चेतना आन्नदाकाराकारित होकर ब्रह्मानन्द तक पहुँच जाए आदि । कोई भी विक्षिप्त या कुण्ठित व्यक्ति प्रेमपूर्ण नहीं हो सकता और प्रेमी को कुंठा नहीं होती अन्यथा आडंबर मानना चाहिए । इसकी प्रकिया की चर्चा आगे की जायेगी ।

 20.  वस्तुतःऊर्जाक्षयस्यैव निरोधापेक्षा नेन्द्रियविषयसम्मेलनादिनाम्।
        वस्तुतः ऊर्जाक्षय को रोकने की आवश्यकता है न कि इन्द्रिय एवं विषय के सम्मिलन को रोकने की ।
       बाहरी तौर पर भावात्मक या अभावात्मक दृष्टि का अंतर दृष्टिगत होता है किंतु दोनों में एक बात सामान्य है कि कोई भी  
 मार्ग व्यर्थ ऊर्जा का क्षय करना नहीं चाहता।  स्खलन के समय ऊर्जा का क्षय हो जाता है। इससे खिन्नता होती है। इसी खिन्नता के कारण व्यक्ति पुनः आनंदावस्था तक पहुँचना चाहता है। लोगों ने पूर्व में इस समस्या का समाधान यह सोचा कि उत्तेजना से चरम आनंद तक की अवस्था तो प्राप्त हो ंिकंतु खिन्नता न हो, उर्जा का क्षय न हो।
       जो पूर्णतः निरोध मार्गी है वे आरंभ से अंत तक रतिप्रक्रिया का ही निषेध करते हैं। स्त्री पुरूष का एक दूसरे को सपने में भी देखना पाप है। पति-पत्नी को भी संतानोत्पत्ति के निमित्त यंत्रवत् मिलना चाहिए, शेष समय भाई-बहन की तरह बिताना चाहिए वगैरह वगैरह। इन्होनें संपूर्ण मिथुन भाव का ही विरोध किया है। पूर्ण निवृत्त वह है, जिसकी दृष्टि में स्त्री एवं पुरूष में कोई अंतर ही नहीं है फिर परस्पर आकर्षण का प्रश्न ही नहीं उठेगा।
    स्त्री-पुरूष का संसर्ग बंद करने पर भी यदि मानसिक संस्कारवश स्वप्नदोष आदि की घटनाएँं घटती हैं तो स्खलन होता है, ऊर्जा का क्षय होता है। अतः इस प्रकार के क्षययुक्त निरोध की कोई सार्थकता वास्तविक साधक नहीं मानते। ऐसा निरोध आडंबर मात्र है।
       इससे  भिन्न  मिश्रमार्ग  या वाममार्ग  में  स्त्री-पुरूष के आकर्षण  से संभोग  (सम्-ठीक प्रकार से $ भोग-परस्पर को आलंबन मानकर भोग) तक की प्रक्रिया स्वीकृत है, गृहस्थ मिश्र-मार्गी होते हैं। विरक्त वीराचार का पालन करते हैं या अन्य साधनाएँ करते हैैं।
      साधना चाहे जो भी हो अंततः इसी बातपर ध्यान दिया जाता है कि स्खलन न हो, जिससे ऊर्जा का क्षय न हो । संभोग होने पर भी यदि स्खलन न हो तो व्यक्ति  में अद्भुत सामर्थ्य विकसित होने लगता है। सामान्य स्तर का नियंत्रण भी बहुआयामी लाभ देता है। फिर भी नियंत्रण दमन नहीं है अतः नियंत्रण की वास्तविक शिक्षा एवं अभ्यास की आवश्यकता है ।
       इन्द्रिय एवं विषय का सम्मेलन तो वैसे भी अनेक रिश्तांे में होता है। अतः वास्तविक अपेक्षा ऊर्जा के क्षय के निरोध की ही है।                      

 21.जननेन्द्रियबज्रनाड़ीमूलाधारमूलबंधरजवीर्योत्सर्गावयवानामंाकंुचनप्रसारणोद्दीपन- घर्षणसंघट्ट-स्मृतिलयक्लान्ति-पुनराकर्षणादिनांप्राधान्येन पंचज्ञानेन्द्रियद्वारेण सहभागित्वम् ।
 रतिसाक्षात्कार में मुख्य रूप से निम्न भाग- जननेन्द्रिय, वज्रनाड़ी (स्त्रियों में......) मूलबंध, मूलाधार-रजवीर्य को बाहर निकलनेवाले अवयवों के आकंुचन, प्रसारण, उद्दीपन, घर्षण, संघट्ट, स्मृतिलय, क्लान्ति एवं पुनराकर्षण के माध्यम से मुख्य रूप से सहयोगी होते हैं ।
        यह रतिक्रिया है क्या ? इस विषय को ठीक से न समझने के कारण समस्याएँ खड़ी होती हैं । पँाच ज्ञानेन्द्रियों एवं मन के एकत्र आलंबन की चर्चा पहले की गयी है ।
 इस प्रक्रिया के कुछ कम चर्चित घटकों का इस सूत्र में उल्लेख किया गया है । उभयपक्ष के जननेन्द्रियों में संवेदना (उत्तेजनारूपी)  घनीभूत होने पर बज्रनाड़ी मंे प्रवेश कर जाती है । बज्रनाड़ी से सुषुम्ना तक के छोटे मार्गों में स्खलनकालीन आनंद का अनुभव होता है। यही मूलाधार चक्र की भावात्मक या अनुभावात्मक स्थिति है, इसे जननांगप्रदेश के आस-पास माना गया है।
       प्रायः इसे गुदा मार्ग एवं मूत्रमार्ग के बीच माना जाता है । इस मार्ग को आकुंचित करने की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से भी होती रहती है । साथ ही अपनी मर्जी से भी  इसे आकुंचित करने का प्रयास किया जाता है । इस प्रक्रिया को ‘मूलबंध’ कहते हैं। इसी प्रकार से रज एवं वीर्य को छोड़नेवाले अवयवों में भी आकुंचन प्रसारण की क्रिया होती रहती है।
सामान्यतः उद्दीपन के साथ-साथ आकुंचन-प्रसारण, फैलना सिकुड़ना प्रारंभ हो जाता है। इसके बाद जननांगों में घर्षण होने पर संघटृ अर्थात् सघन एकाग्रता बनती है । युगल तन्मय हो जाते हैं। तदुपरांत पूर्व स्मृतियाँ संधट्ट में भी लीन हो जाती हंेै। आनंदानुभूति चरम पर पहँुचती है उसके बाद स्खलन के कारण थकान हो जाती है। कुछ देर बाद फिर आकर्षण बढ़ने लगता है, यह आकर्षण पाँच इन्द्रियों के माध्यम से बढ़ता हुआ पुनः उसी अवस्था तक पहुँचता  है। यह लौकिक पूर्ण रति का स्वरूप हुआ। इसमें यदि कोई कमी हो तो समझना चाहिए कि दोष है।

22. एतत्प्रक्रियाज्ञानात् प्राथमिकी शांतिः ।
        इस प्रक्रिया के ज्ञान से प्राथमिक स्तर की शांति हो जाती है ।
       इस प्रक्रिया के ज्ञान से प्राथमिक शांति मिल जाती है । दुर्योग से बहुत सारे लोग इस प्रक्रिया को जानते ही नहीं हैं वे अपने साथी में पाँचों इन्द्रियों एवं मन का लय नहीं कर पाते । कोई मूर्ख तो हार जीत की भावना से ही ग्रस्त होकर रतिभ्रंश का शिकार हो जाता है । कुछ लोग सफाई का ध्यान नहीं रखते । दुर्गंध सबसे बड़ा बाधक होता है । बलात्कारी तो सदैव पीडि़त रहता ही है ं। धोखाधड़ी सम्मोहन आदि से भी प्रकिया बीच में टूट जाती है। स्वीकृति ही मानसिक समरसता पैदा कर सकती है। बेमेल विवाहांे में यह प्रकिया प्रायः खंडित हो जाती है । हड़बड़ी, शीघ्र-स्खलन का भय पति, या पत्नी की तृप्ति की कमी आदि से भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती। अतः इस प्रक्रिया को ठीक से समझ लेने से प्राथमिक स्तर की शांति हो जाती है । सबसे हास्य की बात यह है कि उमयपक्षीय कृत्य को कुछ लोग पुरूष या स्त्री  की प्रधानता की दृष्टि से सोचकर धन, बल के बीच आकर्षण, मजबूरी या किसी कारण से  युगल-विवाह में बंधन में बंधकर चिरकालीन दुखः को आमंत्रित कर लेते हैं । पाँचों इन्द्रियों के साथ मन के एकालंबन में लीन होने के सूत्र को सदैव ध्यान में रखना चाहिए। यहाँ केवल आधरभूत सिद्धातों की चर्चा की गयी है। उपायों की चर्चा उद्धार-साधन-खंड होगी ।

 23. तदुत्तरा प्रक्रियासाक्षात्कारात् ।
      उससे उच्चस्तरीय शांति प्रकिया के साक्षात्कार से होती है।
     उससे उत्तर अर्थात् बाद वाली कुछ और गहरी शांति इस प्रकिया के साक्षात् अनुभव से होगी । सैद्धांतिक ज्ञानसे अनावश्यक तर्क-वितर्क तो शांत हो जाते हैं किंतु व्यक्ति अनुभव के बिना विश्वस्त एवं निश्चिंत नहीं हो पाता है ।
24. सुपरिचयाधिपत्याच्च सिद्धिः ।
        सुपरिचय एवं इस प्रकिया पर पूर्ण स्वामित्व/नियंत्रण, से सिद्धि होती है ।
        इस प्रक्रिया से बार-बार गुजरने पर पूरी प्रक्रिया से व्यक्ति सुपरिचित हो जाता है। सुपरिचय के बाद उसका आत्मविश्वास दृढ़ होता है और अपनी मर्जीे से भी वह रतिसाक्षात्कार को हर स्तर पर नियंत्रित करने में समर्थ होता है ।
जब व्यक्ति अपनी उत्तेजना एवं संवेग को अपने नियंत्रण में कर लेता है तो इस प्रक्रिया का ही स्वामी बन जाता है । इस सुपरिचय से संवेग को स्थानांतरित करने की संभावनाओं का ज्ञान होता है और स्वामित्व के बल से वह ऊर्जा को अपेक्षित दिशा मंे भेजने में सक्षम होता है, जिससे अनेक प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं कम से कम रति-प्रक्रिया की सिद्धि तो उसे हो ही जाती है ।

25. तत्सिद्धये यत्नो विधेयः ।
        उसकी सिद्धि के लिये यत्न करना चाहिए ।
        इस सिद्धि के लिए प्रयत्न करना चाहिए । चूँकि सिद्धि की संभावना है इसीलिए यत्न करना चाहिए। इससे लाभ ही लाभ हैं।

26. शास्त्रगुरूसेवनाच्च सौकर्यमन्यथेश्वरकृपयाच ।
       शास्त्र एवं सदगुरू की सेवा से आसानी होती है अन्यथा ईश्वर की कृपा से ही संभव है ।
        यत्न में मानव का अधिकार है। प्रयास से मार्ग एवं सफलता मिलती है, इसका आशय यह नहीें है कि यत्न न करनेपर सफलता स्वतः प्राप्त हो जाती है। इसे ईश्वर की कृपा समझना चाहिए । सफलता भले ही स्वतः प्राप्त हो जाय फिर भी मूल प्रक्रिया एक ही रहती है। योगज साक्षात्कार में पंचेन्द्रियों का लय तो होता है किंतु यह लय उन-उन इन्द्र्रियों के मूल स्थान अर्थात् शरीर में ही हो जाता है । दूसरे के शरीर की अपेक्षा नहीं होती । योगसिद्धि सदाचारी को स्वतः हो जाती है। उस समय मूलाधार संबंधी अनुभव से योगी का परिचय हो जाता है भले ही उसने किसी स्त्री या पुरूष को छुआ तक न हो । स्त्री के विषय में मतभेद है, जिसकी चर्चा अन्यत्र होगीे ।
 शास्त्र एवं सद्गुरू की सेवा करने से प्रक्रिया का ज्ञान सरलता से हो जाता है । इसी अर्थ में शास्त्र एवं गुरू का महत्त्व है । जो गुरू इस विषय की चर्चा या निर्देशन से भागते हों उन्हे वस्तुतः योग या तंत्र किसी भी परंपरा का ज्ञान नहीं है । वे केवल शब्द रटने वाले लोग हैं । कोई भी माता-पिता अपने संतान के प्रजनन कृत्य को बुरा नहीं मानते । संतानसुख, विवाहसुख सभी भारतीय समाज में स्वीकृत हैं । ये धर्म एवं काम दोनों पुरुषार्थांे की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं ।

 27. मार्गाणा नानात्वम्, ध्यान-प्राणायामचक्र-मंडलादिनां विधानम् ।
        इसके लिये मार्ग अनेक हैं । इसके लिये ध्यान, प्राणायाम, चक्र, मंडल आदि का विधान किया गया है ।
        यह संसार विविधताओं से भरा हुआ है । इसीलिए अनेक मार्ग भी विकसित हुए हैं । किसी भी मार्ग को सहसा सबके लिए सही या गलत नहीं कहा जा सकता । इसके लिए ध्यान, प्राणायाम, चक्र,  मंडल आदि का विधान किया गया है । इसके स्वरूप एवं उपयोग की चर्चा विस्तार से उद्धार-साधन-खंड में की गयी है ।

28. योगेश्वरकृष्णयोगीश्वरशिवयोश्चागमे कृपा ।
          आगम पर योगेश्वर कृष्ण एवं योगीश्वर शिव दोनांे की अत्यंत कृपा है ।
       कृष्ण एवं शिव दोनों योग मार्ग के परमज्ञाता हैं ं। कृष्ण को योगेश्वर तथा शिव को योगीश्वर कहा गया है । इन दोनों ने  विविध उपायों को अपने विचार एवं आचार द्वारा प्रगट किया है। आगम अर्थात् तंत्र शास्त्र पर इन दोनों की महान कृपा है ।

29. बज्रपद्मादिसेवनम् बौद्धागमे ।
         बज्र्र, पद्म आदि के सेवन का निर्देश बौद्ध आगमों (तंत्र) में  है ।
        तंत्र की विधियाँ अनेक परंपराओं में विविध रूप में स्वीकृत हैं। बौद्ध तंत्र परंपरा में रतिसिद्धि हेतु बज्र, एवं पद्म आदि के सेवन का विधान है। ब्रज एवं पद्म पारिभाषिक पद हैं, जिनके कई अर्थ होते हैं। एक अर्थ के अनुसार बज्र अर्थात् लिंग, पद्म अर्थात् भग भी होता है। बज्र एक नाड़ी भी है, जो संवेगों के संग्रह का मुख्य आधार है। इस विषय पर विस्तृत वर्णन बौद्ध तंत्र परंपरा में प्राप्त होता है। मूल प्रकिया एक होने के कारण अलग से इसका विवेचन  नहीं किया गया है।      
       इसी प्रकार पांचरात्र आदि आगमों में भी प्रेम, विकास और रति के उदात्तीकरण की विधियाँ वर्णित हैं।

30.निरोध इति वेदंातयोगस्थविर-जैन-परंपरायाम्  ।
         वेदांत, योग, स्थविरवाद एवं जैन परंपरा में निरोध की बात कही गयी है ।
       निवृतिमार्गी अद्वैत वेदांती पातंजल योग मार्ग के समर्थक एवं बौद्ध परंपरा में थेरवादी तथा जैनी निरोध मार्ग के पक्षधर है। पातंजल योग, स्थविरवाद एवं जैन परंपरा का निरोध मार्ग तो स्पष्ट है किंतु तंत्र में योग के समावेश से योग को केवल निरोंध दृष्टिवाला नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार शंकराचार्य से लेकर बाद तक के शैव, शाक्त आदि संप्रदायों में तंत्र उपासना स्वीकृत होने से भक्तिमार्ग में युगल भाव की स्वीकृति एवं अन्य कारणों से वेदांत एवं योग परेपरा भी पूर्णतः निरोध दृष्टिवाली नहीं है ।

 31. प्रवृत्ति-निवृत्ति-तदुभयमिश्रभावकाश्चाधुनिकाः ।
         उसी प्रकार प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों या दोनो के मिश्र मार्ग को मानने वाले आधुनिक विचारक या आचार्य हैं ।
       आधुनिक शास्त्रकार प्रवृत्ति एवं निवृत्ति दोनांे के मिश्रण के पक्षधर हैं। वस्तुतः लोक जीवन में केवल प्रवृत्ति या केवल निवृत्ति हो नहीे पाती। यह केवल कल्पना लोक की बात है। हमारा मन यदि किसी आलंबन की ओर प्रवृत्त होता है तो उसी क्षण वह अन्य आलंबनों की ओर से निवृत्त हो जाता है। किसी एक आलंबन में एकाग्रता जितनी सघन होगी उतनी ही उस समय अधिक मात्रा में अन्य आलंबनांे से निवृत्ति हो जायेगी । इस प्रकार प्रवृत्ति के साथ-साथ निवृत्ति अनिर्वायतः होती है ।
 दूसरी तरफ जो निवृत्ति मार्ग का अभ्यास करते है उन्हें भी स्थूल सामग्री न सही सूक्ष्म का आलंबन करना ही पड़ता है ।
       अपनी प्रेमिका से जो प्रेमी गहन रूप में जुड़ता है ंउसे अन्य स्त्रियों के प्रति अनुराग का अवसर स्वतः कम हो जाता है । ठीक इसी प्रकार कोई दूसरी प्रेमी प्रेमिका यदि दूसरों के प्रति आसक्ति के    निषेध का अभ्यास करंे तब भी उनकी साधना तब तक सफल नहीं होगी जब तक वे अपने प्रेमी प्रेमिका के प्रति परस्पर गहन आसक्ति में डूबते न चले जायें ।
 इस रहस्य को समझने के बाद प्रवृत्ति की तात्त्विक बहस बेमानी है। प्रवृत्ति से गहनता आती है निवृत्ति से चंचलता दूर होती है। राजाओं के अंतःपुर में हजारों रानियाँ/पटरानियाँ केवल नाम मात्र के प्रतीकात्मक सबन्ध में ही बँध सकती हैं। 100 वर्ष की आयु भी रति-सुख की दृष्टि से इनके लिए कम है । यह एकपक्षीय है, हजारों के साथ हजारों के जुड़ने की बात आधुनिक यूरोप में मुक्ताचार के रूप में है लेकिन पश्चिम के लोग भी शांत नहींे हो पाये हैं, उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है क्योंकि सफलता का सूत्र परिवर्तन की अनिवायर्ता में नहीं है । प्रवृत्ति का दमन जिस प्रकार हानिकारक है उसी प्रकार उद्वेग भी हानिकारक हैं। इसलिए उचित एवं अनुकूल स्थान में प्रवृत्ति एवं उससे भिन्न स्थान से निवृत्ति के सिद्धांत को मिश्रमार्गी लोगों ने अपनाया है । वर्तमान समय में  अधिसंख्यक लोग मिश्र मार्ग पर ही विश्वास रखते हैं ।
         आधुनिक हों या प्राचीन उभयपक्ष सहमति का सिद्धांत अनिवार्य समझा गया है। सहमति से भिन्न स्थान पर कोई भी व्यापार निषेधयोग्य है । सहमति के  स्वरूप पर भी समाज में काफी विवाद है। चूँकि विवाह संस्था के अंतर्गत केवल रतिसुख ही नहीं आता है अपितु उत्तराधिकार, संस्कृति आदि अनेक विषय जुड़े हुए हैं, अतः उन दृष्टियों से ही अधिक विचार हुए हैं, जिसके कारण अनेक प्रकार के प्रतीक विवाह विकसित हुए हैं, जिनका रति साक्षात्कार से कुछ लेना देना नहीं है। मीरा का कृष्ण के साथ विवाह दांपत्य लौकिक रति साक्षात्कार की दृष्टि से व्यर्थ है। मिथिला, बंगाल एवं राजस्थान की पुरानी कुलीन प्रथा, जिसमें एक पुरूष की पचासों पत्नियाँ हो सकती थीं, रतिसाक्षात्कार की दृष्टि से पागलपन मात्र है । इसी प्रकार मातृसत्तात्मक समाज के बेमेल विवाहों की भी कोई संगति नहीं बन पाती ।

32. शेषस्त्वाचार्यमुखेन ज्ञातब्यः पात्रभेदौचित्यात् ।
        पात्र-भेद के औचित्य की दृष्टि से बाकी  बातें आचार्य के मुख से जानी जानी चाहिये ।
       अत्यल्प भेद से मार्गों में भेद दिखाई देता है। पात्र एक दूसरे से भिन्न होते हैं। अतः हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति के अनुसार विधि अलग हो सकती है। मूलभ्ूात सिद्धांतों की चर्चा इस पुस्तक में की गयी हैं । किंतु व्यक्तिगत अभ्यास की विधि तो आचार्य के मुख से ही जानना श्रेयस्कर है ।
       जो व्यक्ति जीवन-साधना में होशपूर्वक लगे हैं उन्हें कुछ न कुछ समाधान मेरे प्रयास से मिलेगा, यह आशा है।