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शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

प्रयास की दृष्टि से एक सीधा वर्गीकरण

 प्रयास की दृष्टि से एक सीधा वर्गीकरण
योग साधना की विधियों के अनेक वर्गीकरण किये जाते हैं। ये वर्गीकरण भी कई बार उलझा देते हैं खाशकर जब किसी एक ही धारा में कई विरोधी शैलियों की साधना की जाती हो। आसन ये ले कर ध्यान तक में यह दुविधा देखी जाती है। किसी के लिये आसन-प्राणायाम आदि का अभ्यास बहुत जरूरी है किसी के लिये सामान्य किसी के लिये न के बराबर। यही बात जप, मुद्रा आदि के मामले में भी आ जाती है।
जब कोई नया आदमी मेरे पास समझने-जानने आता है तो मैं प्रयास की दृष्टि से एक सीधा वर्गीकरण बताता हूं। 1- करने की प्रधानता वाला, 2- होने देने की प्रधानता वाला, 3- होने की प्रधानता वाला। इनमें सबसे गहरी अनुभूति होने की है। यह सबसे प्रामाणिक है। इसमें व्यक्ति स्वयं प्रमाण है कि वह वैसा हो गया। वह न केवल जान गया बल्कि वैसा हो गया। यह पद्धति/विधि आसन से ले कर ध्यान समाधि तक भी लागू हो सकती है। इस पद्धति से अभ्यास करने के लिये पहले होने देने की पद्धति से अभ्यास करना होता है। 
इसके लिये किसी विशेष प्रयास की जगह अपने शरीर या वातावरण में स्वतः हो रही घटनाओं को स्वीकार करने की साधना करनी होती है। अपनी सांस का अनुभव करना इस मार्ग की सबसे प्रचलित विधि है। इसे तो अनेक लोग जानते हैं लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि बिना संकल्प एवं प्रयास के अनेक आसन, प्रणायाम, मुद्रा, बंध, जप आदि जटिल क्रियायें सीखीं एवं अनुभूत की जाती हैं। आज भारत की इस सबसे प्रामाणिक, सरल एवं सुगम विधि को सिखाने वाले बहुत कम लोग हैं। इस मार्ग पर लोगों का विश्वास ही नहीं होता कि बिना प्रयास के कैसे कोई क्रिया या अनुभव संभव है? पिछली शताब्दी में ही मेरे गृह जिले भोजपुर में एक अनपढ़ संत हुए ध्यानयोगी श्री मधुसूदनदास जी। वे इसी विधि का प्रयोग करते थे। मौन में ही सारी शिक्षा, वह भी करने की नहीं, बस होने देने की और हो जाने की। यह सब पूर्णतः पारिवारिक रूप से होता था। घर के 5 साल से 95 साल तक के सदस्यों तक के लिये बस एक विधि कि कहीं दरी बिछा कर शरीर के लेटने-लोटने तक का फासला रख कर बस आंखमूंद कर बैठिये। आगे का का सारा अभ्यास स्वतःं।
मैं अपने नास्तिक मित्रों को या जो विशुद्ध अनुभव अभ्यास करना चाहते हैं, उन्हें यही विधि बताता हूं। इसी प्रकार जो मेरे अनन्य हैं और प्रतीज्ञा करते हैं कि जब तक अनुभव न हो जाय उस विषय पर कोई योग-तंत्र या आध्यात्मिक साहित्य नहीं पढूंगा उन्हें इसी विधि से सिखाता हूं। 
इसके भी कुछ नकारात्मक प़क्ष हैं, जैसे- ऐसे अभ्यासी को केवल भावनाप्रधान या कल्पना प्रधान बातों से आप न गुमराह कर सकते हैं न रोक सकते हैं। बहानेबाजी की सुविधा समाप्त हो जाती है। बच्चे-बच्चियों में इतना आत्म विश्वास बढ़ता है कि वे सवाल पर सवाल पूछने लगते हैं और कई बार उत्तर भी देते हैं क्योंकि उम्रदराज लोगों की तुलना में वे जल्दी सीखते हैं। यह तो सामाजिक संकट हुआ। खतरा तब होता है जब कई बार शरीर के स्वतः संचालित कार्य प्रणाली में कल्पनातीत परिवर्तन होने लगता है। इसे रोकना या नियंत्रित करना बहुत कठिन होता है। दूसरे मार्ग के अभ्यासी गुरु इसे रोक ही नहीं पाते। क्रमशः...

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

नवरात्रि उपहार - 8 अधिकारवादी नारियों के लिये


स्त्री द्वारा स्त्री की पूजा वाले मंत्र और स्तुतियां क्यों नहीं हैं?
दुर्गा या शक्ति के अन्य रूपों की उपासना वाले संस्कृत श्लोकों का अर्थ पूछ कर मेरी पत्नी अक्सर मुझे फंसा देती हैं। एक सीघी सी टिप्पणी कि यह तो एक पुरुष द्वारा स्त्री की स्तुति हुईं स्त्री द्वारा स्त्री की स्तुति तो नहीं हुई।  देवी की पूजा तो स्त्री भी करती है, उसे भी पूजा स्तुति का अधिकार है फिर स्त्री द्वारा स्त्री की पूजा वाले मंत्र और स्तुतियां क्यों नहीं हैं? 
मैं ने कई ब्राह्मण/ब्राह्मणेतर स्त्री पुरुष साधक-साधिकाओं से पूछा। किसी का उत्तर संतोषजनक नहीं रहा कि चैतन्य नपुंसक लिंग है, मानीय चेतना स्त्री नहीं है, वह पुरुष अर्थात नर है, स्त्री केवल पति की सहयोगी मात्र होना चाहिये, वगैरह। कई लाल कपडों वाली साधिकाओं से पूछा। गेरुआ वाली संन्यासिनें तो अपने को स्त्री संबोधन भी देना नहीं चाहतीं,  वे तो ‘‘शिवा अहम्’’ भी नहीं कहतीं, वे कहती हैं- ‘शिवोहम्’ मैं शिव हूं। बहुत मुश्किल सा हो गया उत्तर पाना। 
खैर, खोजिये तो मिलता है के सिद्धांत से मुझे मिल गया। पूरी परंपरा मिली, जो संस्कृत पढ़े मर्दों और अंग्रजी पढ़ी औरतों को शायद ही पसंद आये लेकिन इसे झुठला देना आसान नहीं है। दरसल बेईमानी साधना की स्तुतियों के स्तर पर नहीं हो कर भाषा के स्तर पर है। न केवल वैदिक संस्कृत अपितु लौकिक संस्कृत अर्थात आज जो संस्कृत प्रचलित है, उसे भी बोलने का समाज स्वीकृत अधिकार भारतीय नारियों को नहीं रहा। उनकी जिम्मेवारी बस केवल उसे समझने और पढ़ने तक की रही। संस्कृत के सारे नाटक इस बात की पुष्टि करते हैं। नारी पात्रों के संवाद प्राकृत में लिखे गये हैं।
तब फिर स्त्री द्वारा स्त्री की पूजा वाले मंत्र और स्तुतियां? जी हां, ये सारी प्राकृत और लोक भाषा में होती हैं। इसीलिये सामाजिक चलन भी है कि स्त्री द्वारा देवी की पूजा में ब्राह्मण या पुरुष की अनिवार्यता नहीं होती। मंत्र की जगह गीत गाये जाते हैं। इस बात की पुष्टि तंत्र के ग्रथ भी करते हैं। शाक्त प्रमोद में भी देवी की स्तुति करते हुए संस्कृत में प्राकृत और गद्य के बारे में कहा गया है कि देवी को प्राकृत एवं गद्य में की गई रचनाएं प्रिय हैं। ‘‘प्राकृत -गद्यरचनाप्रिया’’। इसलिये संस्कृत के पुरुषवाद से बचना हो तो प्राकृत, गद्य या किसी भी आम भाषा में ही सीधा संवाद करने का आपको हक है। बस केवल साधना में संस्कृत वर्चस्व के प्रदर्शन से आपको अपने आप को बचाना होगा। दोनों मजा नहीं मिल सकता कि मैं पुरुषों की तरह संस्कृत के मंत्र क्यों न पढूं?

नवरात्रि उपहार -7 मेरी छोटी सी स्तुति का अगला भाग

नवरात्रि उपहार -7 मेरी छोटी सी स्तुति का अगला भाग
हे मूल प्रकृति! महामाया! आपका रूप ज्यामितीय है, यह भारतीय परंपरा में मान्य है तो उसका वर्णन केवल ज्यामितीय ही क्यों हो? ज्यामितीय भाषा पर ही इतनी कृपा क्यों? मुझे समझ में नहीं आता कि बीज गणित और अंक गणित की स्तुति से आप प्रसन्न क्यों नहीं होगीं? क्या ये दोनों ज्यामिति को नहीं मानते? आप काल की कला हैं। आपसे कलन शुरू होता है तो आप कलन गणित से क्यों नहीं प्रसन्न होतीं?
क्षमा करें, वस्तुतः तो आपकी प्रसन्नता और कृपा तो इन्हीं भाषाओं में आपके वर्णन करने वालों पर है। इनसे भी कुछ गलतियां हो रही हैं, शायद इन्होंने भी वर्णमाला वालों की तरह झूठे शब्द गढ़ लिये हैं। हे भगवती! मुझे कलन की भाषा सिखा दें ताकि मैं आपकी स्तुति, आपके रूप का वर्णन एक ही साथ वर्णमाला, उससे बने शब्दों और वाक्यों के साथ ज्यामिति, अंक गणित और बीज गणित में भी कर सकूं।

नवरात्रि उपहार -6 मेरी छोटी सी स्तुति

नवरात्रि उपहार -6 मेरी छोटी सी स्तुति
हे भगवती! जैसा कि लोग कहते हैं और कहते आये हैं कि आपके बारे में पूरी तरह और ठीकठाक कहना मेरे लिये संभव नहीं है। अतः आप जैसी भी हैं, मैं अपना शिर झुकाता हूं कि क्योंकि यह अपने से बड़े और वात्सल्यपूर्ण के सामने स्वतः झुक ही जाता है।
आपके विग्रह और प्रतीकों के बारे में जानकारी बहुत कम है। अतः मैं मोटे तौर पर और सीधे ढंग से ही कुछ कह सकता हूं कि आप शक्ति हैं और मुझमें जो भी शक्ति है, वह आप हैं। एक मनुष्य होने के नाते ज्ञान मतलब सांसारिक बोध, इच्छा और उसके लिये कुछ करने की शक्ति। इतना ही नहीं इस दुनिया की चीजों में जो ताकत आती है, वह आप हैं। पता नहीं मैं क्या हूं? शायद केवल एक अस्तित्व बोध क्योंकि मेरी चेतना भी तो आप ही हैं।
आप बहुत कठोर भी हैं। शायद हमें होश में रखने के लिये। आप जड नहीं हैं, पूर्ण चेतन हैं। आपकी सांसें चलती हैं। जीवों के भीतर छोटे स्तर पर और बड़े स्तर पर इस पूरे संसार में। नियमित रूप से हर ढाई घड़ी में आप अपनी सांस बदलती हैं। जो आपके साथ अपनी सांसों का तालमेल नहीं बनाता वह आपके दंड का भागी होता है।
आपके सुंदर, असुंदर सारे रूप हैं। हमने तो आपके इस विराट रूप से ही ये सारे पैमाने लिये हैं। आपकी सबसे बड़ी कृपा की चर्चा पता नहीं लोग क्यों बहुत कम करते हैं। आपने मनुष्य को भाषा दी, अनुभूति और कल्पना को व्यक्त करने के लिये, सच कहूं तो आप भाषा के रूप में हमारे भीतर हैं। हमने ही बहुत सारे झूठे शब्द गढ़ लिये और स्वयं उलझ गये। भारत के लोगों पर तो विशेष कृपा की और मौलिक वर्णमाला दी। 
आपके ये मूल वर्ण निरर्थक नहीं हैं बल्कि अनेक अनुभूतियों, संवेदनाओं की उत्पत्ति के साथ तौर पर जुड़े हुए हैं। लोग धीरे-धीरे आपकी वर्णमाला और आपके इस ‘‘मालिनी’’ रूप को भूलते गये। बस कुछ ही लोगों को केवल यह नाम याद है। 
आपका रूप न केवल ध्वन्यात्मक हैं बल्कि वह विंदुओं, रेखाओं, वलयों, वृत्तों से भरा पूऱा है। हे प्रकृति! आपमें  इन सबमें से क्या नहीं है? फिर भी कितने अचरज की बात है कि विंदुओं, रेखाओं, वलयों, वृत्तों का अध्ययन करने वाले अपने को नास्तिक कहते हैं और आपके विराट रूप को न मानने वाले असली नास्तिक आपके सूक्ष्म रूप एवं माया की स्तुति करने वालों को ही नास्तिक कह रहे हैं। कहने को और भी कुछ है, जो फिर सांस ले कर कहूंगा। कहूंगा।

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

नवरात्रि उपहार -5 : शारदीय नवरात्रि में सौंदर्य बोध

नवरात्रि उपहार -5 : शारदीय नवरात्रि में सौंदर्य बोध को पारिवारिक बनाने की साधना
सुंदरता किसे नहीं पसंद आती? अपनी खूबसूरती और दूसरों की भी, बशर्ते वह व्यक्ति बहुत अधिक ईर्ष्यालू न हो। शाक्त साधना और शारदीय नवरात्रि में बरसात के बाद आई प्राकृतिक सुंदरता का रस तो है ही साथ ही स्वयं, सजने धजने एवं परिवेश को भी सजा-धजा कर मस्ती मनाने की दृष्टि है। यह अवसर रचना हेतु तप का कम प्रकुति की खूबसूरती में सक््िरय रूप से लीन होने का है क्योंकि इस ऋतु परिवर्तन में प्रकृति में तमोगुण बढ़ने वाला है, गर्मी या रजोगुण नहीं। इसलिये अभ्यास भी सक्रियता बढ़ाने वालो किये जाते हैं। बंगाल से गुजरात तक और कन्या कुमारी से वैष्णो देवी तक शक्ति आराधना चल रही है। 
इस आराधना से तब तक आपको लाभ नहीं मिलने वाला बल्कि हानि भी हो सकती है, जब जक आप अपने सौंदर्य बोध को उदार और पारिवारिक नहीं बनाते। हम साधना की यांत्रिकता को इतना महत्त्व दे देते हैं कि कई बार उसकी मूल व्यवस्था से ही ध्यान हट जाता है। इसलिये सुंदरता और विपरीत लगने वाली स्थिति तथा व्यक्ति में भी सुंदरता ढूढने एवं उसका लाभ उठाने की साधना एक बार आजमा कर देखिये।
इसके लिये केवल युवा या बच्चों में ही नहीं उम्रदराज लोगों में भी खूबसूरती ढूंढ़ने का प्रशिक्षण स्वयं अपने को दें। यह क्या कि केवल जवान ही सुंदर रहेंगे? बूढ़े क्यों नहीं? मैं ने कुछ उम्रदराज लोगों को भी बहुत खूबसूरती के साथ चिता में जलते देखा है। दूसरे के मरने पर मिठाई खाने के हम अभ्यस्त हैं ही तो उनकी खूबसूरती को मानने में क्या हिचक? इसके लिये टीवी स्क्रीन और पास पड़ोस के उम्रदराज लोगों की खूबसूरती को न केवल स्वीकार करें बल्कि खुल कर प्रशंसा करें। इनकी प्रशंसा में खतरा भी बहुत कम रहता है। फिर धीरे-धीरे आपका सौंदर्यबोध विराट होता जायेगा। रंगभेद को खूबसूरती में बाधक न बनने दें अन्यथा पूरे विश्व में व्याप्त खूबसूरती के बहुत बड़े हिस्से के रस का सुख स्वतः छूट जायेगा। काली, नीलतारा की उपासना आपका क्या खाक करेंगे? जब समाज अपने सौंदर्यबोध को सीमित करता है तो ईर्ष्या को बढ़ावा देता है। इसके परिणाम स्वरूप घर में प्रौढ़ लोग अपनी ही अगली पीढ़ी से जलने लगते हैं खाश कर उन घरों में जहां प्रौढ़ और बुजुर्गों की संुदरता की कद्र नहीं। तब सास श्रेणीवाली औरतें जेवरों और पुरानी दुल्हन वाली बनारसी साडि़यों से लदने लगती हैं और सुसर श्रेणीवाले बालों में खिजाब लगा कर चडढी-बनियान पहनने के कंपीटीसन में आने लगते हैं और कपडों संभलते नहीं, बरबस सरक जाते हैं। इस बेवसी से जो झलकता है, वह उसमें शायद ही खूबसूरती रहती है। अतः नैसर्गिक स्थिति में ही सुंदरता खोजी जाय। चेहरे पर पड़ी झुर्रियों की अपनी सुंदरता है, उसे मेकअप से क्यों ढका जाय?
थोड़ी देर के लिये अति नैतिकवादी दृष्टि से गंदा लगने वाले एक काम का उदाहरण लें कि अनेक बूढ़े-बूढि़यां किसी एकांत में अपने बीच बहुत सारे गड़बड़ झाले कर रहे हों, चाहे वह गाली-गलौज, डांस-रोमांस हो या, जाम लड़ाने वगैरह का। अगर रोज ऐसे भौतिकतावादी नास्तिक अपने आप में ही लगे रहें, तो सोचिये कि कम उम्रवालों लोगों की सुरक्षा का संकट इससे बढ़ेगा कि घटेगा? कम उम्रवालों को ही केवल खूबसूरत मानियेगा तो आक्रमण किस पर होगा?
अपनी सुंदरता के साथ अपने सौंदर्य बोध को बढ़ाने के अभ्यास से आप उम्र बढ़ने के साथ अपने में परिवर्तन करते हुए ताउम्र मस्त रह सकते हैं। केवल बालों में खिजाब लगा कर या यौनवर्धक दवाइयां खाकर बेकार दुविधा और तनाव में रहने से क्या फायदा? जी हां, कुछ साल पहले मैं भी 50 पार कर गया। मेरी पत्नी का भी वही हाल है। अब अगर फिर से हम अपने लिये पति-पत्नी ढूंढने का काम शुरू करें तो आप समझ लीजिये कि क्या संकट होगा? इसलिये हम आजकल खूबसूरत समधी-समधन के जुगाड़ में हैं। मेरे यहां सीघे तौर पर एक की वैकेंन्सी है। कोई न कोई प्रत्यक्ष-परोक्ष रिश्ता जोड़ कर अनंत खूबसूरत लोगों का आमंत्रण है। गोरा-काला, गेहुंआ मिल्की विल्की सब चलेगा। दांत टूटा हो सकता है लेकिन मरम्मत किया होना जरूरी है। मिठाई खाने में बेपरहेज को ऊच्च प्राथमिकता। मैं तो मिठाई खाते हुए और संगीत सुनते हुए खूबसूरती के साथ मरने के जुगाड़ में हूं। इसकी तैयारी करनी पड़ेगी। विफलता या विघ्न के डर से भागने से काम नहीं चलेगा।

रविवार, 28 सितंबर 2014

नवरात्रि उपहार 4 : वेद में अर्थवाद और तंत्र में फलस्रुति


साधना और पारिवार में रह कर साधना में भी कुछ सावधानी आपको निराशा एवं भ्रम से बचायेगी-
1 साधना परक शब्दों, वाक्यों एवं पद्यों के अर्थ तय करने के लिये उस परंपरा में मान्य प्रक्रिया को ही अपनायें क्योंकि अनेक शब्द पारिभाषिक, कूटार्थ वाले एवं लाक्षणिक हैं। लाक्षणिक मतलब उनका सीधा अर्थ ग्राह्य नहीं है। वेद में अर्थवाद और तंत्र में फलस्रुति ऐसे ही हैं। ये दोनों आपके मन को आकर्षित करने के लिये हैं न कि वैसा करने से वैसा फल मिलता है। बस एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति भर है।
2 इसी प्रकार यदि आप दुर्गाशप्तशती का अनुष्ठान कर रहे हैं तो पाठ के पहले विनियोग को समझने का प्रयास करें। वह आंरंभिक है। उसे समझना उसी तरह जरूरी है, जैसे किसी लेखक के प्राक्कथन को। उसीसे तो लेखक एवं रचना का संदर्भ समझ में आता है। इसी प्रकार पाठ के पहले लिखा हुआ विनियोग उसके संदर्भ को बताता है। कवच के पहले लिखा है-‘‘.......दिग्बंधदेवतास्तत्त्वम्......’’ इसकी उपेक्षा कर ठीक से कवच न पढ़ा जा सकता है न उसे धारण किया जा सकता है।

शनिवार, 27 सितंबर 2014

नवरात्रि उपहार 3 :: त्योहार, पारिवारिकता और साधना

त्योहार, पारिवारिकता और साधना
भारत में उत्सव और नियमित उत्सवों वाला त्योहार संस्कृति के अनिवार्य घटक हैं। उसमें भी एक तो ये परिवार के साथ मनाये जाते हैं और इन अवसरों से कोई न कोई साधना, पूजा-पाठ जरूर जुड़ा रहता है। किसी के लिये अनुष्ठान भी भले ही महत्त्वपूर्ण हो, उत्सव में तो सबकी रुचि रहती है।
लोग इसे समझने की कोशिश भी करते हैं और उत्सव त्योहार के विभिन्न घटकों में आपसी संबंध और संगति बिठाने की कोशिश भी लेकिन बहुत सारे लोग बिठा नहीं पाते। मैं लोगों की सुविधा हेतु कुछ मूलभूत सिद्धांत दे रहा हूं। इससे आप संस्कृति के अनेक विषयों में संगति ढूंढ सकेंगे।
भारत में देश और काल की दृष्टि से साधना, उत्सव और त्यौहार के लिये अवधि और स्थान तय किये गये हैं। कोई भी उदाहरण लें तो आप पायेंगे कि एक ही क्षेत्र या अवधि में अनेक प्रकार की साधना एवं उत्सव का सुख समाज ले रहा है। उदाहरण हेतु- इस समय ऋतु संक्रमण काल है। इस समय तन एवं मन की संवेदनशीलता बढ़ी रहती है। यह प्राकृतिक सुविधा है। इस अवधि के महत्त्व को स्वीकार कर शाक्त एवं वैष्णव दोनों धाराओं ने साधना विधियों को प्रचारित किया। इसके अनुवर्ती या साथ साथ मानसिक अनुकूलता के लिये गरबा, जागरण, पंडाल सजावट आदि भी जोड़ दिये गये ताकि बच्चों एवं अनाडि़यों को भी लाभ मिले।
यदि इन्हें कोई भीतरी तौर पर समझना चाहे तो उसे इनके विभिन्न घटकों को अलग-अलग भी समझना पड़ेगा, तभी पूरी बात खुल सकेगी। जब तक समझते नहीं तब तक आप आनंद उठाइये, आपकी जैसी भावना और श्रद्धा हो। उत्सव में रोक नहीं है और समझ बिना थोड़े प्रयास के होती नहीं। ध्यान देना तो कम से कम जरूरी होता ही है। इस शारदीय उत्सव की आपको बधाई।

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

नवरात्रि उपहार 2 : जीवन में योग-तंत्र साधना का उपयोग

नवरात्रि उपहार 2     : जीवन में योग-तंत्र साधना का उपयोग
इस विषय पर एकमति नहीं है। ऐसा क्यों? इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है- सायंस पढ़ने का सीधा लाभ अपने जीवन में उस ज्ञान का उपयोग है। इसके अतिरिक्त नौकरी, पद प्रतिष्ठा, कमाई आदि में सायंस की पढ़ाई लाभकारी है, निर्णायक नहीं। बाजार, रिक्ति, प्रतियोगिता, पैरवी, आरक्षण, पक्षपात आदि अनेक कारक इसमें शामिल हो जाते हैं। तब समाज सायंस के अच्छे जानकार शिक्षक और व्यवस्थित शिक्षा की जगह कंपिटीशन पार कराने वाले शिक्षक एवं संस्थाओं की ओर दौड़ता है। सायंस की अच्छी और उच्च शिक्षा में कुछ ही लोगों की रुचि बच पाती है।
योग-तंत्र साधना में भी आत्मज्ञान, प्रकृति ज्ञान, जड़-चेतन संबंध, व्यष्टि-सृष्टि संबंध जैसे मूल विषयों में कम ही लोगें की रुचि होती है। अधिकांश लोग यहां भी अन्य उद्देश्य से आते हैं। नवरात्रि में स्वयं साधना से सीधा तन-मन पर पड़ने वाले अच्छे प्रभाव का लाभ उठाने की इच्छा कम लोगों को होती है। पेशेवर ब्राह्मण पूजापाठ से दान-दक्षिणा की कमाई रूपी लाभ तक अपनी सोच-समझ सीमित रखते हैं और इन्हें दान-दक्षिणा देनेवाले विभिन्न कामों में भगवती की कृपा प्राप्त करने का लाभ तक।
इन दोनों ही सीमित दृष्टियों से किये जानेवाले कामों में मूल शास्त्र का सीधा संबंध वैसे ही नहीं बैठता जैसे- विभिन्न पब्लिक स्कूलों के स्कूल ड्रेस से फिजिक्स-केमेस्ट्री का सीधा संबंध नहीं बैठता। अतः योग और तंत्र शास्त्र, पूजापाठ के अनुष्ठान, कर्मकांड वगैरह को उनके अपने परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिये, केवल लाभ हानि की दृष्टि से नहीं। भक्तिमार्गी भी जब तक भाव के विकास का अभ्यास किसी न किसी परंपरा से नहीं करते और उसके प्रति सावधान नहीं रहते तब तक वह भक्ति की साधना नहीं केवल अपनी सुविधा के कल्पना लोक में आत्मवंचना का प्रयास मात्र है। ऐसी भक्ति और नशाखोरी में कोई अंतर नहीं है या फिर यह केवल दूसरों को ठगने के लिये किया जाने वाला प्रयास हो जाता है।

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

नवरात्रि उपहार


शारदीय नवरात्रि का आरंभ हो गया। प्रायः सभी घरों में इस अवसर पर कुछ न कुछ पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, साधना वगैरह होती है। केवल अनुकरण या श्रद्धा के रूप में किये जाने वाले कार्यों के प्रति अगली पीढ़ी या स्वयं की जिज्ञासा भी रहती है कि आखिर यह सब हम करते क्यों है? आधुनिक पढ़ी इसे तर्क एवं युक्ति की सीमा में समझना चाहती है। पूरा न सही कुछ तो आधार उन्हें भी मिलना चाहिये। अतः इस अवसर पर योग, तंत्र, भारतीय अध्यात्म विद्या के जिज्ञासुओं तथा साधकों के लिये मेरी ओर से भी उपहारस्वरूप 9 पोस्ट प्रस्तुत होंगे। जैसा कि आप में से कुछ लोग जानते हैं मैं विषय के सरलीकरण का पक्षधर हूं, जटिलीकरण का नहीं। अतः इन पोस्ट में किसी देवी-देवता विशेष की स्तुति की जगह विधियों, उनके संदर्भ तथा योग-तंत्र साधना संबंधी समझ एवं सावधानी पर मेरी बातें केन्द्रित रहेंगीं।
नवरात्रि उपहार 1
तंत्र साधना का प्रथम चरण है- देश-काल बोध। इसके पहले साधना की तैयारी के अंतर्गत आसन, प्राणायाम, मुद्रा, आसन, माला, तिलक, सामान्य बाह्य पूजा, स्तुति, मंत्र को कंठस्थ करने, बैखरी जप आदि की बातें सिखाई जाती हैं।
मैं यहां जो चरणभेद रख रहा हूं, वह किसी महाविद्या साधना या अन्य संप्रदाय के आधार पर नहीं है। यहां चरण भेद का आधार है- स्थूल से सूक्ष्मतर अनुभवों को प्राप्त करने की प्रक्रिया तथा अनुभवों की सूक्ष्मता की दृष्टि से उनके स्तर। अतः ये पोस्ट केवल उनके लिये उपयोगी हैं, जो विषय को स्पष्ट रूप से समझना चाहते हैं, न कि केवल श्रद्धा भावना से मानना चाहते हैं। इसे अर्थात स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने की प्रक्रिया को संहार क्रम कहा जाता है। संहार मतलब समेटना, हत्या नहीं।
परंपरागत रूप से संस्कृत पढ़ने के लिये पहले शब्द कोश रटाया जाता था- अमरकोश। उसका पहला मंगलाचरण वाला श्लोक है-
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानंतचिन्मात्रमूर्तये, स्वानुभूत्येकमानाय नमः शांताय तेजसे। अर्थ- जो देश और काल की सीमा से ढंका नहीं है और जो चेतना मात्र स्वरूप वाला है, जो केवल अपनी अनुभूति से जाना जा सकता है, उस शांत और तेजस्वी को नमस्कार है।
इस प्रकार तंत्र एवं योग की मूल विधि हुई देशकाल की सीमा में बंधी हुई और उससे मुक्त दोनों पेकार की अवस्थाओं का बोध कराना। इसके लिये जरूरी है कि उस प्रक्रिया का अनुभव कराया जाय और जो अनुभव हमें है, उसमें इस सिद्धांत को समझा दिया जाय। 
मैं ने इसे प्रथम चरण इसलिये कहा कि इसे समझे, जाने, सावधान रहे बिना अनुष्ठान का सर्वप्रथम कार्य संकल्प ही नहीं हो सकता है, न्यास, कवच आदि भला कैसे होंगे? संकल्प, न्यास, कवच आदि अनुभवात्मक हैं, न कि केवल पाठ मात्र। पाठ और याद रखना तो अनुष्ठान की तैयारी है।

रविवार, 14 सितंबर 2014

किस भाषा तथा उदाहरणों में कहूं

साधना पर स्पष्टीकरण 3
मेरे सामने चुनौती थी कि जो अनुभव अतीन्द्रिय, अलौकिक, अनिर्वचनीय या वैसे कहे जाते हैं, उन्हें किस भाषा तथा उदाहरणों में कहूं कि एक सीमित ही सही लोगों तक वास्तविक समझ पहुंच सके, जितना मैं जानता हूं और अनुभव किया है। जो अन्य साधक-साधिकाओं के अनुभव से भी मिलता है। शास्त्र का समर्थन तो है ही, कोई नई बात भी नहीं है। बस सरलीकरण है। मैं एक प्रयास कर रहा हूं, आप बतायें कि क्या इससे विषय कुछ स्पष्ट हुआ?
योग एवं तंत्र की अनेक धाराओं में स्वीकृत अभ्यास (फंतासी, लीला एवं फलश्रुति को छोड़ कर) अपने तन, मन, समाज और प्रकृति के बीच के संबधों तथा उनकी कार्यप्रणाली का अनुभवात्मक ज्ञान कराते हैं। ये अनुभव तीन प्रकार के होते हैं-
1 प्रयास से सामान्य जीवन में किसी के भी द्वारा किये जाने लायक, जैसे- आसन, प्रणायाम, मुद्रा, बंध आदि।
2 ध्यान के द्वारा मनोमय जगत की संरचना तथा भौतिक जगत से उसको संबंध।
3 अपने शरीर को सीमा एवं निरंतर मर्यादित तथा सक्रिय रखने वाले स्वतः संचालित प्राकृतिक व्यवस्थाओं का अनुभवात्मक ज्ञान तथा उसे भी एक हद तक नियंत्रित करने की क्षमता का विकास। 
यह जो तीसरा स्तर है, जैसे सहज सोना-जागना, रक्तचाप, हृदय गति, फेफड़ों की गतिविधि, सुनने, समझने की क्षमता को कमाधिक करना, डायफ्राम एवं आंत के आकुचन-प्रसारण, अतंःस्रावी ग्रथियों को कमाधिक सक्रिय करना आदि वे ही अन्य अनेक बातों को नियंत्रित करती हैं।
चूंकि इनमें थोड़ी गड़बड़ी भी अनेक संकट पैदा कर सकती है अतः जो लोग इनमें छेड़छाड़ से डरते हैं, गलत नहीं करते। लाचारी में इनकी कार्यप्रणाली को अनुभवात्मक रूप से सिखाने वाले लोगों की मजबूरी होती है कि वे इस विद्या को उन्हें ही सिखायें, जो उन पर भरोसा कर सकें या उन्हें जिनका पहले से ही बिगड़ा हुआ हो तो उनकी कार्यप्रणाली को सुधारने के क्रम में। 

शनिवार, 23 नवंबर 2013

योग और तंत्र के संबंध


तंत्र को अनुभव और उसकी पद्धति और उदाहरण की कसौटी पर अगर कसें तो सही स्थिति का पता चलेगा।
योग ‘‘बच्चा’’, ऐसा प्रचलित वक्तव्य है मेरा नही। तंत्र सर्वांग व्यवस्था को प्रधानता देता है लेकिन भक्त जुटाने के लिए और अपनी महिमा बढ़ाने के लिए एक ही बात को योग एवं तंत्र दोनेां नाम से कहा जाता है। हठयोग में भी आसन, सामान्य प्रणायाम से उपर आकर गहन कुंभक, बज्रोली - सहजोली, उनके साथ गहन कुंभक की प्रक्रिया आयेगी तो तंत्र मंें भी शक्ति चालन, कुंडलिनी को मूलाधार में सक्रिय कर स्वाधिष्ठान की ओर भेजने के लिए उस विधिका भी सहारा लिया जाता है। गोरख वाणी में ‘अर्धे जाता अर्धे धरे, काम दग्ध जोगी जो करे’ - आदि वर्णन आते हैं। यह तो हठयोग एवं कुंडिलिनी योग ही नहीं, वाम मार्गी तंत्र की भी प्रक्रिया हो गई। 
मूलाधार से पहले कमल नाल, आजकल रबर की नली से पानी, तेल और बाद में वीर्य को ऊपर खींचने की पक्रिया हठयोग में आयेगी, स्त्री योनि एवं शरीर को पूर्ण उत्तेजित रखने एवं स्खलन से बचने की प्रक्रिया तंत्र में जाएगी।
हठयोग प्राणायाम का सहारा लेगा, बंध का अभ्यास बताएगा। तंत्र में सुविधा मिलेगी मंत्रों की आवृत्ति में मन को रोकने भटकाने की। उससे उत्कृष्ट होगा अपने ही मनेामय कोश का साक्षात्कार, अपने ही भीतर के चेतनामय शरीर में क्रमशः प्रवेश करते जाना। ध्याान योग में सुषुम्ना स्वतः चलने लगेगी। नाद बिंदु का मिलन होगा, त्रिकुटि लय होगा। स्वतः प्रत्याहार एवं धारणा सध जाएगी।
अब क्या? उसके बाद तो प्रकृति सारा रहस्य खोलकर दिखाने लगेगी। अमृत वर्षा होगी। स्खलन कालीन क्षणिक सुख घंटो वाला हो जाएगा। ऐसी मस्ती कि उसमें से निकलने का मन ही नहीं करेगा। उसके साथ-साथ जीना चाहें तो कुछ घटो बाद सामान्य मनुष्य का शरीर साथ नहीं दे सकता।
सांस उत्तेजना, धड़कन आपके हाथ में आ तो गये, लेकिन सीमा बनी हुई है कि शरीर को स्थिर शांत कर या तो ध्यान की ओर बढ़ें या फिर उतर कर जान बूझकर भी इसी दुनियाँ में अन्य मनुष्यों की तरह जिएं।
उसी तरह योग में जो उस स्थूल शरीर के भीतर एक पहला स्वतः संचालित क्रियात्मक प्राणमय शरीर और अनुभव करने वाले शरीर मनोमय का बोध होता है, उसमें काफी समय लग जाता है। तन, मन की चंचलता को शांत करने या स्वतः शांत होने दोनो में बहुत विघ्न आते हैं।
तंत्र में और खाशकर लोकप्रचलित प्रणाली कहें या सिद्ध पंथ वाली उसमें मात्र एक सप्ताह से इक्कीस रोज के अंदर अन्नमय, प्राणमय, एवं मनोमय शरीर की संरचना एवं गतिविधि का साक्षात्कार वाला अनुभव हो जाता है। न भय, न घबराहट, शर्त यह है कि 10-20 लोगों की मंडली हो। वे एक दूसरे का भला करने वाले हों, उनमें विभिन्न आयु वर्ग के और स्त्री पुरुष दोनों हों तो समय कम लगेगा। बिल्कुल घरेलू सामाजिक व्यवस्था। न सबको तन से नंगा होने की जरूरत, न दारू, न संभोग फिर भी मन से नंगा होना जरूरी है। मन से परिचय करना है तो मन तो नगा करना ही पड़ेगा। उसके मनका कपड़ा उतारना पड़ेगा। इस तरह का किया कम, कराया अधिक, जानेवाला अभ्यास तंत्र हो गया। यही सब तो शादी-विवाह के अवसर पर मात्र 20-25 वर्ष पहले तक हो रहा था। कुछ कुछ अभी भी हो रहा है।
योग में कहें तितीक्षा, पार करने की इच्छा, बर्दास्त करने की बात।नदी तैर कर अकेले पार किया तो डूबने का खतरा। भीतर की अनुभूति के समय तो मनुष्य एकेला ही है। भम्र एवं भय दो बड़े खतरे हैं। तंत्र में अनुभवी लोग बाहर से देख रहे हैं। कहा गया कि हम जो भी करें तुम चुप रहना (साधक, साधिका, जो हो) बर्दाश्त करना, गाली दें, चिकोटी काटें, मार-पीट करें, आरती करें, सुंदर भोजन दें, ललचाएँ, रूप-कुरूप, भला-बुरा जो करें तुम मजे लो, मौन में हँसा। सोने तो दंगे नहीं, देखतेे रहेंगे कि इसकी मनोदशा कैसी कहां पर चल रही है। बच्चे से बूढे तक सभी लोग लगे हुए हैं सिखाने में। खेल-तमाशे हो रहें हैं। यह तो गया तंत्र, ऐसी प्रक्रिया में व्यक्ति बिना अधिक मिहनत के सकुशल हँसते-खेलते पार हो गया। फिर वह दूसरों के लिए खेल भी गढ़ सकता है और मार्गदर्शन भी कर सकता है।
मस्तिक में चतना की आकृतियाँ हैं। मुझे भीषण ज्वर में कुछ यंत्रों का साक्षात्कार हुआ, कुछ ध्यान मे,ं यह योग हुआ। बाहर में यंत्र लिखकर भीतर के यंत्रों की छाप/स्मृति को सक्रिय करना तंत्र हो गया।
इस प्रकार से उदाहरणों के द्वारा योग और तंत्र के अंतर को वर्गीकृत किया जा सकता है लेकिन अनुभव में हुआ तो साथ ही साथ उसी शरीर में न। इसलिए सिखाने वाले उदार गुरु तंत्र के वर्गीकरण या उसे सिखाने न सिखाएँ उस चक्कर में नहीं पड़ते। हर स्थिति का लाभ उठाने को कहते हैं। आप जप करें यह भी विधि है। किसी मंदिर में जा कर जहाँ देर तक सामूहिक कीर्तन हो रहा हो। उसे सुने यह भी विधि है। 
कितना उदाहरण दें। आशा है, आप तक कुछ न कुछ मेरी बात पहुँच गई होगी। भाई उदय जी आप ने स्वयं अपना साधनात्मक परिचय नहीं दिया है। अपने या अपने गुरुजी के बारे में नहीं बताया और प्रश्न इतना गहरा? पता नहीं आपकी परीक्षा में मुझे कितने अंक मिलेंगे? परिचय रहने पर साधक को उसके अनुरूप उत्तर देने में सुविधा होती है।
मेरे मन में तो आता है कि आरंभिक परिचय वाला ऐसा परिवारिक कार्यक्रम बनाना चाहिए। उससे लोक लज्जा का भय भी नहीं रहेगा और आसानी से बच्चे से बूढे़ तक हँसते-खेलते कम से कम अपने भीतर जाने के रास्ते से तो परिचित हो ही जाऐंगे। केवल एक उदारता चाहिए। उदारता अर्थ व्यवस्था की, जिससे सप्ताह तक रहने खाने की व्यवस्था निकले। उदारता छुआछूत से ऊपर उठने की। उदारता स्त्री-पुरुष, सधवा-विधवा, बच्चे-बूढ़े के तन के साथ मन को भी प्रेम पूर्वक स्वीकारने की, अपने हीं इष्टदेव अपनी हीं पद्धति की जगह इस बिना देवता, बिना बीज, मंत्र के अभ्यास की।
उस आरंभिक परिचय से तंत्रोक्त, दिग्बंधन, कवच, न्यास, अभिषेक इन सभी को पाठ नहीं, अनुभवात्मक रूप से समझने की सुंदर पृष्ठभूमि तैयार हो जाएगी। आप की मर्जी जिस किसी भी महाविद्या या देवी-देवता की साधना करें।
इससे अधिक यूँ ही क्या बकता रहूँ। अवसर पर कर लिखूँगा। उपर्युक्त जितना लिखा है।  वह अनुभूत है। ध्यानयोग, कंुडलिनी और लोकाचार वाला मेरा और पूरे समाज का जहां ऐसी साधना होती रही। हठयोग वाला आंशिक मेरा शेष मेरे मित्र साधकों का और वामाचार वाला वरिष्ठ साधकों का। चूँकि उस संसार में मैं कोई पहला तो हूँ नहीं अतः ये विधियाँ थोड़े-थोडे़ अंतर से पुस्तकों में वर्णित भी हैं।
उन्हीं बातों को दैनिक अभ्यास और कर्मकांड में डाल दिया तो सामान्य धर्माचरण की बात हो गई, परंपरा बन गई। जहाँ अनुभूति नहीं है, बिना सोचे समझे ज्ञानार्जन के, बस यूँ ही चल रहा है, वहाँ नियम आधारित खेल नहीं है। शुद्ध मनोरंजन वाला भी नहीं, बस देखा देखी खानापूर्ति वाला परंपरा का पालन है। उससे श्रद्धा तो है लेकिन वह ज्ञान से हीन है।
योग शास्त्र सीधा प्रशिक्षण है। यहाँ योग से मतलब हठयोग और अष्टांगयोग से है। सीधा रास्ता बताने में मनोरंजन नहीं होता न ही सामूहिकता की अनिवार्यता होती है। साधक एक अकेला, वैराग्य भावना वाला तटस्थ भूमिका का अभ्यास करता है। उसमें भी अपने मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म गहरी अवस्थाओं का तटस्थ साक्षात्कार करता है। इसलिये योगी को बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती।
तंत्र की विधियों में खेल भावना, सामूहिकता, परोक्षता, उत्सव, रंग, ध्वनि, गीत, खाद्य सामग्री हीं नहीं, इस सृष्टि की किसी भी उपयोगी सामग्री को सम्मिलित कर लेनी की संभावना है। संरचना को केवल जानना नहीं, उसकी स्थूल, भौतिक, संासारिक संरचना का अनुभव करने पर भी उसे अपने वश में रखना है। इसलिए तंत्र मंें काम, क्रोध, लोभ, द्वेष और मोह सभी अपने छोटे से लेकर बृहत्तम रूप में स्वीकृत हैं। ये अस्पृश्य विषय नहीं हैं।
वह तांत्रिक कैसा जो काम भावना से भरा नही हो, क्रोध जिसकी आँखों से बरसता नहीं हो और हृदय अगाध करुणा से भरा नहीं हो। जो सबको अपना न मानता हो और जिसे यह स्पष्ट हो कि कैसे प्रकृति नहीं, महामाया इस सृष्टि में क्षण-क्षण रूप एवं भाव का परिवर्तन कर रही है। वह जीव मात्र में शिव-शक्ति, राधा-कृष्ण, प्रज्ञा-उपाय के मिलन, मिलन की आतुरता एवं मिलनोपरांत सृष्टि को देख देख उत्सव मनाता है, मृत्यु एवं विनाश पर खूब हँसता है।
आज जो तंत्र चर्चा होती है वह प्रायः बैखरी पाठ, उपांशु जप, बाह्य स्तुति, चमत्कार, जजमान को फुसलाने, धारणा का अभ्यास तक सीमित रहती है। इष्ट के साथ तादात्मय की पहली अवस्था में ही लोग डरते जाते हैं क्योंकि यह द्वैत को तोड़ता है और बाद में भ्रम को भी।
धारणा या मन को एकाग्र करने की विधि में कल्पना की सुविधा रहती है। यहाँ जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी, वाली सुविधा रहती है। यह होश संभालने वाली, सच्चाई को स्वीकार करनेवाली दशा नहीं है। यहाँ अपनी रुचि की मूल वृत्ति के अनुसार देवता की संपूण्र कल्पना में डुबने उतराने की सुविधा है। यह एक नशे के समान है। अतः कुछ लोग इस अवस्था तक नशे के माध्यम से भी पहुँचना चाहते हैं। तंत्र में मन को एकाग्र करने के लिये गीत, संगीत, लीला, कथा, अभिनय, नृत्य, उत्सव सब स्वीकृत है। चक्रपूजा, व्यूह भावना, मंडल गीत, योगी योगिनी के नृत्य, कथा, पूजा, प्रसाद, तीर्थयात्रा, ईष्ट एवं गुरु की जयंती, गुरुपूजा संप्रदाय या परंपरा में अपने को खोलने विकसित करने एवं एकाग्र रहने की सुविधा प्रदान करते हैं। इसमें भक्ति और संगठन की प्रधानता है। भीड़ को यही पसंद है लेकिन तंत्र सम्मत गहरी बातें तो इसके ऊपर हैं।
वहाँ मनमाना नहीं चलेगा, समर्पण करना होगा, वह भी अपने ही समक्ष। कल्पना वाले शिव के साथ धारणा जैस ही ध्यान में परिणत होगी। अर्थात एकाग्रता से बढ़कर तादात्म्य होगा वैसे ही पता चल जायेग कि धत्तेरे की यह तो मेरा भ्रम था, असली बात तो और गहरी है। यह एक साथ का संयोग और वियोग अनेक साधकों को सहन हीं होता, मनोविकृति आ जाती है। इसलिये इस विधि को गुप्त रखा जाता है। उसी तरह की प्रक्रिया क्रमशः गहरी होती जाती है। कल्पना की जगह प्रकृति पुरुष के असली रूपों का साक्षात्कार होने लगता है। यह भ्रम टूटना बहुत दारुण होता है इसलिए असली परंपरागत साधना विधि में स्थूल रूप के साथ सूक्ष्म रूप का वर्णन आरंभ से रहता है कि स्थूल आलंबन की जगह सूक्ष्मतर आलंबन का सहारा बना रहे।
इससे अधिक खोलने की कोई सार्थकता नहीं होगी। जो साधक साधिका चाहें अलग से चर्चा कर सकते हैं।


मंगलवार, 19 नवंबर 2013

कल्पना, धारणा और ध्यान


योग एवं तंत्र के साधक तथा दूसरे से चर्चा करने वाले असली सत्संगी भी प्रायः इन तीन बातों को अलग अलग नहीं समझने के कारण उलझते रहते हैं। कोई सुविधा के लिये, कोई असावधानी वश और अन्य गलत नीयत से सबको मिलाजुला कर एक कर देते हैं।
कल्पना
कल्पना में पहले से ही कोई दृश्य, रूप, घ्वनि बता दी जाती है कि आपको ऐसी कल्पना करनी है। कल्पना जब ठीक ठीक होने लगती है तो आंख मूंदने पर लगता है कि अरे यह तो सच में वैसा ही दिखाई सुनाई पड़ रहा है। इतना ही नहीं कल्पना करने वाला यह भूल जाता है कि मैं ने तो प्रयास पूर्वक ऐसी कल्पना की थी। कल्पना का यह लगाव इतना गहरा होता है कि अगर आप किसी को याद दिलाएं कि यह अनुभव तो आपकी कल्पना का ही घनीभूत परिणाम है, वह व्यक्ति बेशक आपसे झगड़ जायेगा। पूजा-पाठ उपासना में लगे अधिकांश लोग इसी तरह के भ्रम में जीना पसंद करते हैं। उलटे जो होश में रहें उन्हें नास्तिक कहते हैं। कल्पना को धारणा में बदला जा सकता है लेकिन प्रायः लोग कल्पना के चिस्तार में लग जाते हैं।
धारणा
मन को किसी भी विंदु जिसे आलंबन कहा जाता है, उस पर एकाग्र करने एवं वहां हो रहे अनुभव से गुजरने अर्थात उसे स्वीकार करने को कहा जाता है। किसी भी आलंबन पर मन के एकाग्र होने के क्रम में ही अनेक अनुभूतियां हो ने लगती हैं। समर्थ गुरु उनके कारणों एवं संदर्भों को पहचानता है। कुछेक अनिष्टकारी अनुभूतियों को छोड़ अभ्यास करने वाले को अभ्यास में ही टिके रहने की सलाह दी जाती है। इस अभ्यास से भी लगता है कि मैं तो वही हो गया। मन, मन को एकाग्र करने की क्रिया और एकाग्र करने वाले का अंतर भी एक समय मिटने लगता है। लोग अक्सर घबराकर इस अनुभूति के पहले ही भाग खड़ा होते हैं।
ध्यान
धारणा जब पूरी होने लगती है, शरीर के भीतर प्रकृति प्रदत्त ध्वनियों, कार्यप्रणालियों, मस्तिष्क के खांचों, अंतःस्रावी ग्रंथियों आदि से अपने भीतर ही अनुभवात्मक साक्षात्कार होने लगता है। कुछ कुछ नियंत्रण जैसा भी महसूस हो सकता है। इस तरह की अनेक बातें होती हैं।    ध्यान धीरे-धीरे सूक्ष्म होता जाता है और सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभूतियां भी होती हैं। इससे अधिक कहना संभव नहीं है।
मेरी कुल परंपरा भटके साधकों की चिकित्सा एवं सेवा की है। अतः साधक-साधिका के प्रयास के प्रति सहानुभूति एवं आदर के बावजूद उसकी उलझन सुलझाने के लिये तथ्यपरक तो होना ही पड़ता है। सामान्यतः लोग कल्पना की जिद में उलझते हैं। उसे ही उपलब्धि मान बैठते हैं। यह नशे की तरह सुखद और दुखद है। भयानक पीड़ा से बचाव में दवा और बाद में दारू की तरह काम करता है। मैं वाम मार्ग या कौल परंपरा के बारे में साधकों से सुनी हुई और ग्रंथों में वर्णित बातें ही जानता हूं और वे बातें जो दुर्घटनावश बाहर आ गईं।

धारणा में आगे बढ़ने से घबराये हुए लोग अपने धारणा स्तर के अनुभव को ही पकड़ कर उसे समाज में मनवाने ओर किसी न किसी प्रकार गुरु बनने को बेचैन हो जाते हैं।
इस प्रकार जिद तथा भ्रम में पड़े लोगों से तब तक चर्चा नहीं हो पायेगी, जब तक वे यह मिलाने को तैयार न हों कि वे तो कल्पना या धारणा में ही अभी हैं। उनमें यह उदारता आने पर ही वार्ता हो सकती है कि जैसे आपने अनुभव किया उसी तरह दूसरे का अनुभव भी तो सुनिये समझिये।

सोमवार, 9 मई 2011

चित्तसाम्य , वज्रोली-सहजोली साधना एवं ‘लाग बैठना

चित्तसाम्य , वज्रोली-सहजोली साधना एवं ‘लाग बैठना’

मगध रहस्यविद्या की विधियों के आविष्कार की भूमि रहा है। इसने गोपनीय मानी जाने वाली विधियों को जनसुलभ बनाया है, भले ही वे काल के प्रवाह में पुनः लुप्त या गुप्त हो गई हैं। काम ऊर्जा के रूपांतरण की विधियों के साथ भी ऐसा ही हुआ है। काम ऊर्जा के रूपांतरण की विधियों को समझे बिना यहाँ के मूर्ति शिल्प, अनुष्ठान एवं कई अन्य विधियों को समझ पाना संभव नहीं है।
हरगौरी की पालकालीन प्रतिमाएँ हर गाँव मुहल्ले में मिलती हैं जिसमें गौरी शिव के आलिंगन मंे उनकी एक जाँघ पर बैठी हुई होती हैं। शिव का बायाँ हाथ गौरी के बाएँ स्तन पर रहता है। इतना हीं नहीं नग्न शिव का लिंग ऊपर की ओर खड़े रूप में चित्रित रहता है।
दिगंबर जैन नंगे घूमते रहते हैं। मगध जैनियों एवं विशेषकर दिगंबर जैनों का क्षेत्र है। उनके यहाँ उच्च साधना में नग्नता ही दिव्यत्व है। बौद्ध परंपरा की दृष्टि से भी युगनद्ध संभोगकालीन रूप ही दिव्यतम रूप है जिसका चित्रण तिब्बती थंका में रहता है। मगध के भी कई मंदिरों में खजुराहों की भाँति आकृतियाँ बनी हुई हैं। बौद्ध तांत्रिकों ने इस साधना को विविध नामों से पुकारा है जिसके ‘वसंततिलक योग’ एवं ‘बोधिचित्त का उत्पाद’ ये दो अधिक प्रचलित नाम हैं।
काम ऊर्जा को संचित-संप्रेषित करने के कुछ अनुष्ठान आज भी स्त्रियों के द्वारा अनुष्ठित होते हैं। किसी युवती को चुचुक के मर्दन से जो उत्तेजना होती है वैसा ही अनुभव और उत्तेजना उसके होठ या अंगूठे को धीमी गति से सहलाने से होती है यदि वह पूर्वस्मृति के आधार पर उत्तेजना के पूर्वानुभव का स्मरण कर ले। सिंदूर लगाकर अंगूठे को मलने पर उत्तेजना और बढ़ती है। इससे भी यदि पर्याप्त उत्तेजना न हो तो स्त्रियाँ कामोत्तेजक हरकतें करती हैं। यह अनुष्ठान आज भी प्रचलित है। लड़के की शादी के समय लड़के की माँ को ऐसा अनुष्ठान औरतें संपन्न्ा कराती हैं। इसे ‘लाग बैठना’ कहते हैं।
इन सभी मामलों की समझ काम ऊर्जा के रूपांतरण की विधियों के रहस्य को जान लेने पर आसानी से हो जाएगी। वज्रोली एवं सहजोली साधना इस विधि का एक स्थूल उदाहरण है। चित्त का साम्य एवं काम ऊर्जा का रूपांतरण, प्रक्षेप आदि जटिल विधियाँ हैं।
भारतीय साधना परंपरा मेें योग की दृष्टि से चित्त का समत्त्व भाव में होना साधकांे का अभीष्ट होता है। ’ समत्त्व योग उच्यते’।
तंत्र धारा कुंडलिनी-जागरण को अति महत्त्वपूर्ण मानती है। कंुडलिनी जागरण के उपायों में एक उपाय वज्रोली/सहजोली मुद्रा का अभ्यास है जिससे मूलाधार चक्र स्पंदित/जागृत होकर अपने भीतर से सुप्त कंुडलिनी शक्ति के ऊर्ध्वगमन में सहायक होता है। इस अवस्था में जब मूलाधार चक्र जागृत होता है तब उस समय की अनुभूति संभोगकालीन अनुभूतियों की भाँति होती है। जननांगों के आसपास आकंुचन-प्रसारण (वास्तविक या केवल उनकी अनुभूतिमात्र) लिंगोद्रेक, योनि का सिकुड़ना-फैलना, फड़कना, उत्तेजना की अनुभूति एवं उससे आगे संभोगकालीन वे सारी अनुभूतियाँ, जो स्नायु-संस्थान में होती हैं, सब इस अवस्था में होती हैं। साधक वीर्यस्खलन रोककर ऊर्जा/अनुभूति को ऊर्ध्वमुख करके कुंडलिनी जागरण की दि शा में अग्रसर होता है।
इस अभ्यास को हठयोग परंपरा में मूलबंध, अष्श्विनीमुद्रा आदि के साथ किया जाता है। काम ऊर्जा से सुपरिचित होने एवं उसपर नियंत्रण स्थापित करने के लिए यह प्रयास मानसिक स्तर पर किया जाता है। मंत्रयोग में मंत्र एवं ध्यानयोग में ध्यान से यही साधना की जाती है।
इस अवस्था में जो अ˜ुत अनुभूति होती है वह योगियों एवं भोगियों, दोनों के आकर्षण का विषय शताब्दियों से रही है। विविध धाराओं के लोगोें ने इस अवस्था तक पहुँचने के अनेक उपाय ढ़ूढ़े हैैं जो सामान्य लोगों की दृष्टि में अत्यंत विरोधी लगते हैं किंतु वस्तुतः संगत होते हैं।
हठयोग प्रदीपिका का पद्य उस अवस्था वि शेष का वर्णन करता है।
चित्ते समत्वमापन्ने वायौ व्रजति मध्यमे।
तदामरोली वज्रोली सहजोली प्रजायते।।
चित्त के समत्व भाव में आने पर इड़ा एवं पिंगला, दोनांे में बहने वाली वायु सुषुम्ना पथ में (बीच वाले में) एक होकर जाती है तब वज्रोली, सहजोली उत्पन्न हो जाते हैं।
यहाँ वज्रोली-सहजोली की सहज उत्पत्ति को स्वीकार किया गया है। यह पद्य चतुर्थ उपदेश में आता है। इसके पूर्व विस्तार से वज्रोली, सहजोली की प्रक्रिया बताई गई है।
साम्यावस्था में पहुँचने के अनेक मार्ग अनेक परंपराओं में बताए गए है किंतु अपनी-अपनी परंपरा (संप्रदाय) के प्रति अत्यधिक श्रद्धा एवं दूसरी परंपरा का ज्ञान न होने से लोगों के मन में भ्रांतियाँ एवं दुराग्रह उत्पन्न होते हैं।
यदि पूरी प्रकिया को ध्यान में रखा जाय तभी संगति बनेगी। आगे कुछ परंपराओं की चर्चा कर उनके संबधों को प्रगट करने का प्रयास किया जाएगा।
परम लक्ष्य - सहस्रार में शिव सामरस्य, निर्वाण, मुक्ति, पूर्णानंदावस्था।
उपाय - कुंडलिनी-उत्थान षट्चक्रभेदन, व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास।
प्रारंभिक उपाय
(क) मूलाधार चक्र मेें उपस्थित कुंडलिनी के जागरण हेतु हठयोग की
प्रक्रियाएँ। वज्रोली, सहयोगी आदि का अभ्यास।
(ख) प्राणायाम द्वारा सुषुम्ना-मार्ग में प्रवेश का उपाय।
(ग) ध्यानविधि द्वारा चित्त की समत्वावस्था के विस्तार का उपाय।
इस विषय को यदि हम अवस्था-विकास की दृष्टि से देखें तो मतभेद कम नजर आएगा किंतु यदि इसे किसी परंपराविषेष की दृष्टि से देखें तो तीव्र विरोध नजर आएगा।
यहाँ केवल प्राथमिक चरण की साधना-पद्धतियों के आपसी संबध मुख्य रूप से विवेच्य हैं क्योंकि मध्य स्तर एवं अंतिम स्तर का भेद प्रायः नामकरण का होता है स्वरूपगत नहीं।
प्राथमिक उपायों के अवलंबन के बाद ब्रह्मानंद की छाया की भाँति आनंद देनेवाला कामानंद प्राप्त होता है। यह कामानंद भोगी एवं योगी दोनों के आकर्षण का विषय है। सामान्य व्यक्ति का कामानंद क्षणिक एवं आवृत्ति के चक्कर में डालने वाला है। साधक/योगी का कामानंद तुलनात्मक रूप से दीर्घकालीन, आवृत्ति को कम करते हुए स्थिरता प्रदान करने वाला एवं ब्रह्मानंद की ओर अग्रसर कराने वाला है। एक के पास स्खलन एवं प्रजनन का अनुभव है तो दूसरे के पास वीर्य-निरोध एवं मूलाधार से ऊपर कुंडलिनी को अग्रसर करने का अनुभव है।
संक्षेप में, अब विविध विधियों की चर्चा की जा रही है जिससे तुलनात्मक समीक्षा करने में सुविधा होगी।
हठयोग - इस परंपरा में आसनों में सिद्धासन या सिद्धयोनि आसन की साधना कराई जाती है। मूलबंध एवं अ श्विनी मुद्रा का अभ्यास कराया जाता है, वज्रोली एवं सहजोली सिखाई जाती है।
ध्यानयोग - किसी भी धारणा के दृढ़ होने एवं रेचन के बाद मूलाधार पर मन को एकाग्र करने या मूलाधार से संबद्ध गतिविधियों का साक्षी भाव से दर्शन करने की प्रक्रिया सिखाई जाती है। मंत्र घ्वनियों की आवृत्ति एवं ध्यान से भी यही अनुभूति होती है।
वामाचार
किसी भी उपाय से जननांगो को उत्तेजित करना, घर्षण करना और उस अनुभूति को धारण करने का सामर्थ्य विकसित करना। इसमें भी वीर्य/रज का संधारण अपेक्षित है किंतु स्खलन की बहुत चिंता नहीं है। सामर्थ्य को इतना विकसित किया जाता है कि काम का वेग साधक को विचलित न कर सके एवं साधक अपनी उत्तेजना को इच्छित दि शा में प्रवाहित कर सके।
सहजयोग
इसमें भी भ्रूमध्य या साँस की गति या अन्य किसी आलंबन में चित्त को लीन करना सिखाया जाता है। चित्त के लय होने के साथ मूलाधार की गतिविधियाँ स्वंय प्रारंभ होती हैं जिनके प्रवाह में अपने को छोड़ देने को कहा जाता है। इड़ा और पिंगला शान्त हो जाती हैं, सुषुम्ना सक्रिय।
विविध जटिल पद्धतियों के विकास के बाद पुनः सरलीकरण का कार्य प्रारंभ हुआ जो सहजयोग के नाम से जाना गया। इसमें लय की प्रधानता रहती है। गुरुकृपा से चित्त की किसी अंतर्मुखी अवस्था का स्मरण करके या श्वास आदि किसी आंलबन में मन को एकाग्र कर प्राकृतिक, सहज प्रवाह/संस्कारों के प्रवाह में अपने को छोड़ दिया जाता है। क्रियाएँ ध्यानयोग की भाँति ही होती हैं। केवल एकाग्रता का महत्त्व कम रहता है।
महायान के बाद में सहजयान, वज्रयान, कालचक्रयान सभी आपस में इतने अधिक घुलमिल गए कि उपर्युक्त अर्थ किसी को विवादास्पद भी लग सकता है। इसीलिए यहाँ सहजयोग शब्द का मैंने सुविधा के लिए प्रयोग किया है।
भक्तियोग
भक्तियोग की पद्धति अन्य से भिन्न है। भक्तियोग एक प्रकार से लयात्मक पद्धतियों का समन्वय है किंतु इस मार्ग में शारीरिक व्यक्तिगत प्रक्रियाओं को कम, आराध्य या इष्ट पर ध्यान अधिक दिया जाता है।
भक्तियोग मेें चित्त के विकारों के रेचन की जगह रूपांतरण को अधिक महत्त्व दिया जाता है। कुछ लोग भक्ति के साथ अन्य यौगिक या तांत्रिक पद्धतियों का समावेष करते हैं। उनके अनुभव उनकी परंपराआंे के अनुरूप होते हैं। जो लोग भक्ति को एकमात्र साधन के रूप में लेते हैं वे मूलाधार के जागरण आदि को महत्त्व ही नहीं देते। आराध्य के प्रति समर्पण ही इनका परम लक्ष्य होता है।
उपर्युक्त प्रक्रियाओं को वसंततिलक योग, डाकिनीजाल सिद्धि आदि नामों से भी जाना जाता है।
काम के प्रति विविध दृष्टियाँ
काम, जिसे रति भी कहा जा सकता है, के प्रति समाज में विविध दृष्टियाँ हैं। ये दृष्टियाँ विविध लोगों के अनुभवों की विविधता पर आधारित हैं। जैसे -
- यह अति आनंददायी है। यह आनंद सदैव प्राप्त होता रहे।
- रतिक्रिया का कोई खंडवि शेष ही अधिक आनंददायी है। उसी का विकास एवं स्थिरता हो।
- यह अनुभूति स्खलन के समय जब अत्यंत प्रगाढ़ होती है किंतु अपनी क्षणिकता के कारण सुख की झलक मात्र देती है जिससे बाद में बेचैनी होती है। ऐसी प्रक्रिया से मुक्ति ही भली।
- कामेच्छा मन की गर्हित, पापमय इच्छा है। यह आध्यात्मिक एवं सांसारिक उत्थान में बाधक है। इसका पूर्ण दमन करना अनिवार्य है।
- कामेच्छा का उपयोग संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया तक सीमित रहना चाहिए।
- समाज द्वारा स्वीकृत मानदंडों को छोड़कर अन्यत्र कामेच्छा की पूर्ति करना अनुचित है। उसका दमन होना चाहिए।
- काम भावना ही जीवन एवं प्रेम का आधार है। यह प्रकृति की मानव पर कृपा है। इसका पूरा सत्कार होना चाहिए।
जैसे अनेक स्थानों पर सामाजिक संस्थाओं का भेद अलग-अलग देखा जाता है वैसे ही विभिन्न कालखंडों में केवल काम संबंधी ही नहीं, सभी प्रकार की नैतिकताओं का स्वरूप भी भिन्न -भिन्न रहा है। भारत में भी विवाह एवं परिवार के अनेक स्वरूप पाए जाते हैं। जैसे पितृसत्तात्मक, मातृसत्तात्मक, बहुपत्नी प्रथा, बहुपति प्रथा, समूह विवाह आदि।
संतानोत्पत्ति की प्रबल इच्छा मनुष्य की प्राकृतिक एवं सामाजिक आवष्यकता है। इस सीमा तक मनुष्य अन्य प्राणियों की कोटि में है। कामवासना का उदात्तीकरण, दीर्घीकरण, निरोध, रूपांतरण आदि की दृष्टि से मनुष्य अन्य प्रणियों से अधिक समर्थ नजर आता है। परंपरागत एवं आधुनिक चिकित्सा शास्त्र ने संतति-प्रजनन पर रोक के उपायों को ढूँढकर प्रकृति की व्यवस्था में उसने प्रबल हस्तक्षेप किया है।
पूर्वोक्त रूप में किसी व्यक्ति या समूह की जो भी मान्यता हो दीर्घकालीन रतिसुख का आकर्षण योगी एवं भोगी सबका अभीष्ट है।
केवल उत्तेजना के क्षणों के विस्तार तक का क्षेत्र सामान्य स्तर का क्षेत्र है। कामोत्तेजना का घनीभूतीकरण एवं उर्ध्वारोहण ही योगियों/साधकों का अभीष्ट है और उस द शा की प्राप्ति के लिए चित्त को शांत करना, थकाना या निष्क्रिय करना अनिवार्य है, चाहे उसके लिए मार्ग जो भी अपनाया जाय। अतः मेरी दृष्टि में मार्गो की विविधता है विरोध नहीं।
इस विद्या का विस्तृत विवेचन मैंने 'रतिसुरति’ नामक अपनी पुस्तक में किया है। विशेष जिज्ञासा का समाधान शायद वहाँ संभव हो सकेगा।


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