रविवार, 14 सितंबर 2014

किस भाषा तथा उदाहरणों में कहूं

साधना पर स्पष्टीकरण 3
मेरे सामने चुनौती थी कि जो अनुभव अतीन्द्रिय, अलौकिक, अनिर्वचनीय या वैसे कहे जाते हैं, उन्हें किस भाषा तथा उदाहरणों में कहूं कि एक सीमित ही सही लोगों तक वास्तविक समझ पहुंच सके, जितना मैं जानता हूं और अनुभव किया है। जो अन्य साधक-साधिकाओं के अनुभव से भी मिलता है। शास्त्र का समर्थन तो है ही, कोई नई बात भी नहीं है। बस सरलीकरण है। मैं एक प्रयास कर रहा हूं, आप बतायें कि क्या इससे विषय कुछ स्पष्ट हुआ?
योग एवं तंत्र की अनेक धाराओं में स्वीकृत अभ्यास (फंतासी, लीला एवं फलश्रुति को छोड़ कर) अपने तन, मन, समाज और प्रकृति के बीच के संबधों तथा उनकी कार्यप्रणाली का अनुभवात्मक ज्ञान कराते हैं। ये अनुभव तीन प्रकार के होते हैं-
1 प्रयास से सामान्य जीवन में किसी के भी द्वारा किये जाने लायक, जैसे- आसन, प्रणायाम, मुद्रा, बंध आदि।
2 ध्यान के द्वारा मनोमय जगत की संरचना तथा भौतिक जगत से उसको संबंध।
3 अपने शरीर को सीमा एवं निरंतर मर्यादित तथा सक्रिय रखने वाले स्वतः संचालित प्राकृतिक व्यवस्थाओं का अनुभवात्मक ज्ञान तथा उसे भी एक हद तक नियंत्रित करने की क्षमता का विकास। 
यह जो तीसरा स्तर है, जैसे सहज सोना-जागना, रक्तचाप, हृदय गति, फेफड़ों की गतिविधि, सुनने, समझने की क्षमता को कमाधिक करना, डायफ्राम एवं आंत के आकुचन-प्रसारण, अतंःस्रावी ग्रथियों को कमाधिक सक्रिय करना आदि वे ही अन्य अनेक बातों को नियंत्रित करती हैं।
चूंकि इनमें थोड़ी गड़बड़ी भी अनेक संकट पैदा कर सकती है अतः जो लोग इनमें छेड़छाड़ से डरते हैं, गलत नहीं करते। लाचारी में इनकी कार्यप्रणाली को अनुभवात्मक रूप से सिखाने वाले लोगों की मजबूरी होती है कि वे इस विद्या को उन्हें ही सिखायें, जो उन पर भरोसा कर सकें या उन्हें जिनका पहले से ही बिगड़ा हुआ हो तो उनकी कार्यप्रणाली को सुधारने के क्रम में। 

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