शनिवार, 27 सितंबर 2014

नवरात्रि उपहार 3 :: त्योहार, पारिवारिकता और साधना

त्योहार, पारिवारिकता और साधना
भारत में उत्सव और नियमित उत्सवों वाला त्योहार संस्कृति के अनिवार्य घटक हैं। उसमें भी एक तो ये परिवार के साथ मनाये जाते हैं और इन अवसरों से कोई न कोई साधना, पूजा-पाठ जरूर जुड़ा रहता है। किसी के लिये अनुष्ठान भी भले ही महत्त्वपूर्ण हो, उत्सव में तो सबकी रुचि रहती है।
लोग इसे समझने की कोशिश भी करते हैं और उत्सव त्योहार के विभिन्न घटकों में आपसी संबंध और संगति बिठाने की कोशिश भी लेकिन बहुत सारे लोग बिठा नहीं पाते। मैं लोगों की सुविधा हेतु कुछ मूलभूत सिद्धांत दे रहा हूं। इससे आप संस्कृति के अनेक विषयों में संगति ढूंढ सकेंगे।
भारत में देश और काल की दृष्टि से साधना, उत्सव और त्यौहार के लिये अवधि और स्थान तय किये गये हैं। कोई भी उदाहरण लें तो आप पायेंगे कि एक ही क्षेत्र या अवधि में अनेक प्रकार की साधना एवं उत्सव का सुख समाज ले रहा है। उदाहरण हेतु- इस समय ऋतु संक्रमण काल है। इस समय तन एवं मन की संवेदनशीलता बढ़ी रहती है। यह प्राकृतिक सुविधा है। इस अवधि के महत्त्व को स्वीकार कर शाक्त एवं वैष्णव दोनों धाराओं ने साधना विधियों को प्रचारित किया। इसके अनुवर्ती या साथ साथ मानसिक अनुकूलता के लिये गरबा, जागरण, पंडाल सजावट आदि भी जोड़ दिये गये ताकि बच्चों एवं अनाडि़यों को भी लाभ मिले।
यदि इन्हें कोई भीतरी तौर पर समझना चाहे तो उसे इनके विभिन्न घटकों को अलग-अलग भी समझना पड़ेगा, तभी पूरी बात खुल सकेगी। जब तक समझते नहीं तब तक आप आनंद उठाइये, आपकी जैसी भावना और श्रद्धा हो। उत्सव में रोक नहीं है और समझ बिना थोड़े प्रयास के होती नहीं। ध्यान देना तो कम से कम जरूरी होता ही है। इस शारदीय उत्सव की आपको बधाई।

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