शारदीय नवरात्रि का आरंभ हो गया। प्रायः सभी घरों में इस अवसर पर कुछ न कुछ पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, साधना वगैरह होती है। केवल अनुकरण या श्रद्धा के रूप में किये जाने वाले कार्यों के प्रति अगली पीढ़ी या स्वयं की जिज्ञासा भी रहती है कि आखिर यह सब हम करते क्यों है? आधुनिक पढ़ी इसे तर्क एवं युक्ति की सीमा में समझना चाहती है। पूरा न सही कुछ तो आधार उन्हें भी मिलना चाहिये। अतः इस अवसर पर योग, तंत्र, भारतीय अध्यात्म विद्या के जिज्ञासुओं तथा साधकों के लिये मेरी ओर से भी उपहारस्वरूप 9 पोस्ट प्रस्तुत होंगे। जैसा कि आप में से कुछ लोग जानते हैं मैं विषय के सरलीकरण का पक्षधर हूं, जटिलीकरण का नहीं। अतः इन पोस्ट में किसी देवी-देवता विशेष की स्तुति की जगह विधियों, उनके संदर्भ तथा योग-तंत्र साधना संबंधी समझ एवं सावधानी पर मेरी बातें केन्द्रित रहेंगीं।
नवरात्रि उपहार 1
तंत्र साधना का प्रथम चरण है- देश-काल बोध। इसके पहले साधना की तैयारी के अंतर्गत आसन, प्राणायाम, मुद्रा, आसन, माला, तिलक, सामान्य बाह्य पूजा, स्तुति, मंत्र को कंठस्थ करने, बैखरी जप आदि की बातें सिखाई जाती हैं।
मैं यहां जो चरणभेद रख रहा हूं, वह किसी महाविद्या साधना या अन्य संप्रदाय के आधार पर नहीं है। यहां चरण भेद का आधार है- स्थूल से सूक्ष्मतर अनुभवों को प्राप्त करने की प्रक्रिया तथा अनुभवों की सूक्ष्मता की दृष्टि से उनके स्तर। अतः ये पोस्ट केवल उनके लिये उपयोगी हैं, जो विषय को स्पष्ट रूप से समझना चाहते हैं, न कि केवल श्रद्धा भावना से मानना चाहते हैं। इसे अर्थात स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने की प्रक्रिया को संहार क्रम कहा जाता है। संहार मतलब समेटना, हत्या नहीं।
परंपरागत रूप से संस्कृत पढ़ने के लिये पहले शब्द कोश रटाया जाता था- अमरकोश। उसका पहला मंगलाचरण वाला श्लोक है-
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानंतचिन्मात्रमूर्तये, स्वानुभूत्येकमानाय नमः शांताय तेजसे। अर्थ- जो देश और काल की सीमा से ढंका नहीं है और जो चेतना मात्र स्वरूप वाला है, जो केवल अपनी अनुभूति से जाना जा सकता है, उस शांत और तेजस्वी को नमस्कार है।
इस प्रकार तंत्र एवं योग की मूल विधि हुई देशकाल की सीमा में बंधी हुई और उससे मुक्त दोनों पेकार की अवस्थाओं का बोध कराना। इसके लिये जरूरी है कि उस प्रक्रिया का अनुभव कराया जाय और जो अनुभव हमें है, उसमें इस सिद्धांत को समझा दिया जाय।
मैं ने इसे प्रथम चरण इसलिये कहा कि इसे समझे, जाने, सावधान रहे बिना अनुष्ठान का सर्वप्रथम कार्य संकल्प ही नहीं हो सकता है, न्यास, कवच आदि भला कैसे होंगे? संकल्प, न्यास, कवच आदि अनुभवात्मक हैं, न कि केवल पाठ मात्र। पाठ और याद रखना तो अनुष्ठान की तैयारी है।
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