शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

नवरात्रि उपहार 2 : जीवन में योग-तंत्र साधना का उपयोग

नवरात्रि उपहार 2     : जीवन में योग-तंत्र साधना का उपयोग
इस विषय पर एकमति नहीं है। ऐसा क्यों? इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है- सायंस पढ़ने का सीधा लाभ अपने जीवन में उस ज्ञान का उपयोग है। इसके अतिरिक्त नौकरी, पद प्रतिष्ठा, कमाई आदि में सायंस की पढ़ाई लाभकारी है, निर्णायक नहीं। बाजार, रिक्ति, प्रतियोगिता, पैरवी, आरक्षण, पक्षपात आदि अनेक कारक इसमें शामिल हो जाते हैं। तब समाज सायंस के अच्छे जानकार शिक्षक और व्यवस्थित शिक्षा की जगह कंपिटीशन पार कराने वाले शिक्षक एवं संस्थाओं की ओर दौड़ता है। सायंस की अच्छी और उच्च शिक्षा में कुछ ही लोगों की रुचि बच पाती है।
योग-तंत्र साधना में भी आत्मज्ञान, प्रकृति ज्ञान, जड़-चेतन संबंध, व्यष्टि-सृष्टि संबंध जैसे मूल विषयों में कम ही लोगें की रुचि होती है। अधिकांश लोग यहां भी अन्य उद्देश्य से आते हैं। नवरात्रि में स्वयं साधना से सीधा तन-मन पर पड़ने वाले अच्छे प्रभाव का लाभ उठाने की इच्छा कम लोगों को होती है। पेशेवर ब्राह्मण पूजापाठ से दान-दक्षिणा की कमाई रूपी लाभ तक अपनी सोच-समझ सीमित रखते हैं और इन्हें दान-दक्षिणा देनेवाले विभिन्न कामों में भगवती की कृपा प्राप्त करने का लाभ तक।
इन दोनों ही सीमित दृष्टियों से किये जानेवाले कामों में मूल शास्त्र का सीधा संबंध वैसे ही नहीं बैठता जैसे- विभिन्न पब्लिक स्कूलों के स्कूल ड्रेस से फिजिक्स-केमेस्ट्री का सीधा संबंध नहीं बैठता। अतः योग और तंत्र शास्त्र, पूजापाठ के अनुष्ठान, कर्मकांड वगैरह को उनके अपने परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिये, केवल लाभ हानि की दृष्टि से नहीं। भक्तिमार्गी भी जब तक भाव के विकास का अभ्यास किसी न किसी परंपरा से नहीं करते और उसके प्रति सावधान नहीं रहते तब तक वह भक्ति की साधना नहीं केवल अपनी सुविधा के कल्पना लोक में आत्मवंचना का प्रयास मात्र है। ऐसी भक्ति और नशाखोरी में कोई अंतर नहीं है या फिर यह केवल दूसरों को ठगने के लिये किया जाने वाला प्रयास हो जाता है।

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