साधना और पारिवार में रह कर साधना में भी कुछ सावधानी आपको निराशा एवं भ्रम से बचायेगी-
1 साधना परक शब्दों, वाक्यों एवं पद्यों के अर्थ तय करने के लिये उस परंपरा में मान्य प्रक्रिया को ही अपनायें क्योंकि अनेक शब्द पारिभाषिक, कूटार्थ वाले एवं लाक्षणिक हैं। लाक्षणिक मतलब उनका सीधा अर्थ ग्राह्य नहीं है। वेद में अर्थवाद और तंत्र में फलस्रुति ऐसे ही हैं। ये दोनों आपके मन को आकर्षित करने के लिये हैं न कि वैसा करने से वैसा फल मिलता है। बस एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति भर है।
2 इसी प्रकार यदि आप दुर्गाशप्तशती का अनुष्ठान कर रहे हैं तो पाठ के पहले विनियोग को समझने का प्रयास करें। वह आंरंभिक है। उसे समझना उसी तरह जरूरी है, जैसे किसी लेखक के प्राक्कथन को। उसीसे तो लेखक एवं रचना का संदर्भ समझ में आता है। इसी प्रकार पाठ के पहले लिखा हुआ विनियोग उसके संदर्भ को बताता है। कवच के पहले लिखा है-‘‘.......दिग्बंधदेवतास्तत्त्वम्......’’ इसकी उपेक्षा कर ठीक से कवच न पढ़ा जा सकता है न उसे धारण किया जा सकता है।
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