योग एवं तंत्र के साधक तथा दूसरे से चर्चा करने वाले असली सत्संगी भी प्रायः इन तीन बातों को अलग अलग नहीं समझने के कारण उलझते रहते हैं। कोई सुविधा के लिये, कोई असावधानी वश और अन्य गलत नीयत से सबको मिलाजुला कर एक कर देते हैं।
कल्पना
कल्पना में पहले से ही कोई दृश्य, रूप, घ्वनि बता दी जाती है कि आपको ऐसी कल्पना करनी है। कल्पना जब ठीक ठीक होने लगती है तो आंख मूंदने पर लगता है कि अरे यह तो सच में वैसा ही दिखाई सुनाई पड़ रहा है। इतना ही नहीं कल्पना करने वाला यह भूल जाता है कि मैं ने तो प्रयास पूर्वक ऐसी कल्पना की थी। कल्पना का यह लगाव इतना गहरा होता है कि अगर आप किसी को याद दिलाएं कि यह अनुभव तो आपकी कल्पना का ही घनीभूत परिणाम है, वह व्यक्ति बेशक आपसे झगड़ जायेगा। पूजा-पाठ उपासना में लगे अधिकांश लोग इसी तरह के भ्रम में जीना पसंद करते हैं। उलटे जो होश में रहें उन्हें नास्तिक कहते हैं। कल्पना को धारणा में बदला जा सकता है लेकिन प्रायः लोग कल्पना के चिस्तार में लग जाते हैं।
धारणा
मन को किसी भी विंदु जिसे आलंबन कहा जाता है, उस पर एकाग्र करने एवं वहां हो रहे अनुभव से गुजरने अर्थात उसे स्वीकार करने को कहा जाता है। किसी भी आलंबन पर मन के एकाग्र होने के क्रम में ही अनेक अनुभूतियां हो ने लगती हैं। समर्थ गुरु उनके कारणों एवं संदर्भों को पहचानता है। कुछेक अनिष्टकारी अनुभूतियों को छोड़ अभ्यास करने वाले को अभ्यास में ही टिके रहने की सलाह दी जाती है। इस अभ्यास से भी लगता है कि मैं तो वही हो गया। मन, मन को एकाग्र करने की क्रिया और एकाग्र करने वाले का अंतर भी एक समय मिटने लगता है। लोग अक्सर घबराकर इस अनुभूति के पहले ही भाग खड़ा होते हैं।
ध्यान
धारणा जब पूरी होने लगती है, शरीर के भीतर प्रकृति प्रदत्त ध्वनियों, कार्यप्रणालियों, मस्तिष्क के खांचों, अंतःस्रावी ग्रंथियों आदि से अपने भीतर ही अनुभवात्मक साक्षात्कार होने लगता है। कुछ कुछ नियंत्रण जैसा भी महसूस हो सकता है। इस तरह की अनेक बातें होती हैं। ध्यान धीरे-धीरे सूक्ष्म होता जाता है और सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभूतियां भी होती हैं। इससे अधिक कहना संभव नहीं है।
मेरी कुल परंपरा भटके साधकों की चिकित्सा एवं सेवा की है। अतः साधक-साधिका के प्रयास के प्रति सहानुभूति एवं आदर के बावजूद उसकी उलझन सुलझाने के लिये तथ्यपरक तो होना ही पड़ता है। सामान्यतः लोग कल्पना की जिद में उलझते हैं। उसे ही उपलब्धि मान बैठते हैं। यह नशे की तरह सुखद और दुखद है। भयानक पीड़ा से बचाव में दवा और बाद में दारू की तरह काम करता है। मैं वाम मार्ग या कौल परंपरा के बारे में साधकों से सुनी हुई और ग्रंथों में वर्णित बातें ही जानता हूं और वे बातें जो दुर्घटनावश बाहर आ गईं।
धारणा में आगे बढ़ने से घबराये हुए लोग अपने धारणा स्तर के अनुभव को ही पकड़ कर उसे समाज में मनवाने ओर किसी न किसी प्रकार गुरु बनने को बेचैन हो जाते हैं।
इस प्रकार जिद तथा भ्रम में पड़े लोगों से तब तक चर्चा नहीं हो पायेगी, जब तक वे यह मिलाने को तैयार न हों कि वे तो कल्पना या धारणा में ही अभी हैं। उनमें यह उदारता आने पर ही वार्ता हो सकती है कि जैसे आपने अनुभव किया उसी तरह दूसरे का अनुभव भी तो सुनिये समझिये।
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