गुरुवार, 14 नवंबर 2013

सुरति-सूत्र 2

सुरति-सूत्र
भूमिका

       भारतीय समाज इस दृष्टिगोचर संसार के साथ इसके अतिरिक्त एक रहस्यावृत लोक में भी विश्वास करता है। उसे सामान्य लोगों को उपलब्ध सुुख की इच्छा तो है ही रहस्यावृत सुख की भी आकांक्षा है, जिसे मोक्ष, महासुख, चरमसुख, निर्वाण आदि के नाम से भारतीय समाज जानता एवं मानता है। इस रहस्यावृत सुख की प्राप्ति का उपाय कुछ लोगों ने इस संसार एवं इस संसार के प्रचलित सुखों का परित्याग बताया है तो कुछ लोगों ने इस संसार के सुखों के भोग के साथ मोक्ष, निर्वाण या इसके समतुल्य अवस्था की उपलब्धि का मार्ग बताया है। भोग के साथ मोक्ष पर विश्वासवाली धारा ने इस विषय पर गंभीर और व्यापक कार्य किया है। कुछ लोग केवल सांसारिक सुख के भोग पर ही विश्वास कर उभयविध भोग की संभावना को ही नकारते हैं। यह उनके अज्ञान के कारण है। योग एवं तंत्र की प्रक्रिया के अज्ञान के कारण ही निराशा या निषेध की प्रवृत्ति विकसित हुई है।
        जो लोग योग या तंत्र का विधिवत अभ्यास करते हैं उन्हें वस्तुस्थिति का ज्ञान रहता है कि सुख के दोनो ही प्रकार सही एवं एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं हैं।
       यही बात यौन-सुख, काम-सुख, रति-सुख, आदि के रूप में ज्ञात सुख पर भी लागू है। इतना ही नहीं रति-सुख का स्थान सभी सुखों में महत्त्वपूर्ण एवं आकर्षक माना गया है। यह प्रत्यक्ष अनुभवगम्य है, इसमें किसी तर्क को आधार मानने की आवश्यकता नहीं है।
        एक ओर समाज में यौन सुख के प्रति गहरा आकर्षण है, यौन सुख के चरमोत्कर्ष को मुक्ति, निर्वाण की बराबरीवाला उच्च स्थान प्राप्त है वहीं दूसरी ओर यौन सुख के विरोध में भी अनेक प्रकार से  स्वर उठानेवाले लोग हैं । इस प्रकार  कई  ढोंग अनावश्यक विकसित होते चले गये हैं । अत्याचार, प्रतिरोध, कपट आदि ने इस ढ़ोंग को अपना ढाल बना लिया और बलात्कार, वेश्यावृत्ति, स्त्री या पुरुष की खरीद-फरोख्त, दास-दासी प्रथा, वेमेल विवाह जैसी अनेक कुप्रथाएँ अर्द्धनैतिक रूप से स्वीकृत हो गयीं । युद्ध की नैतिकता विजेता को सामूहिक बलात्कार का अधिकार दे देती है । यह प्रकृति के विरुद्ध है । इससे बलात्कारी कभी भी तृप्त नहीं होता, वह तो आगे चलकर उन्मादी एवं मनोग्रंथियों से ग्रस्त हो जाता है, पीडि़त या पीडि़ता प्रतिरोधी या अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं ।
स्वंय उलझकर या आधा-अधूरा अनुभव प्राप्तकर जब हम निर्णायक बनते हैं तो समस्या निंरतर उलझती जाती है । कोई सूत्र ही नहीं मिलता । बातें परस्पर विरूद्ध लगती हैं । अनावश्यक कौतूहल, दमन, एवं बढ़ते आकर्षण का संकट गहरा होता जाता है ।
                इन बातों की सच्चाई को स्वीकार करते हुए इस पुस्तक में सहज प्राकृतिक नियमों का निरूपण किया गया है । प्रयास किया गया है कि अब तक के सभी प्रमुख यौन सुख संबंधी प्राकृतिक उपायों का समावेश हो एवं वर्तमान की उलझनों को सुलझाने का ऐसा सुलभ मार्ग हो जो  अधिकतम लोगों को अनुकूल हो । जो ढोंगी, अतिवादी या अत्याचारी हैं, उन्हें यह पुस्तक बिलकुल नापसंद होगी क्योंकि यह उनके मुखैटे को उतारने का प्रयास करती है । लंबी अवधि तक चुंबन, अलिंगनादि प्रारंभिक क्रीड़ाओं से लेकर भागलिंग के घर्षण तक की- प्रक्रिया यहाँ भी स्वीकृत है किंतु गहरा सुख, गहरी तृप्ति तो  स्खलनकालीन सुख की गहराई एवं विस्तार में उतरने में है । उस चरम अनुभूति के काल की वृद्धि जो सामान्य जनों के लिए कुछ क्षणों के लिए होती है जब घंटों, दिनों एवं असीमकाल तक हो सकती है तब वह आनन्द वस्तुतः इतना गहरा होता है कि संसार के सभी सुख उसमें समा सकते हैं । इसकी उपलब्धि विपरीत लिड्ग़ी के सहयोग से रतिक्रिया के द्वारा एवं योगभूमि में ध्यान-प्राणायाम द्वारा अपनेशरीर में बिना किसी बाहरी संयोग के भी संभव है। यही भारतीय सिद्ध परंपरा की मानवता को देन है ।
विभागः- इस छोटी सी पुस्तक में 80 सूत्र है जो चार अध्यायों में विभक्त हैं। पहला- आधार खण्ड है । इसमें रतिसुख विषयक मूलभूत प्राकृतिक सिद्धांतों को सूत्रबद्ध किया गया है । दूसरा विक्षेप खण्ड  है, इसमें यौनसुख संबंधी उलझनों एवं उसकी प्रक्रिया का निरूपण है । तीसरा खण्ड उद्धार खण्ड है । इस खण्ड में यौन सुख की सामान्य एवं उदात्त अवस्थाओं का वर्णन है । चौथा खण्ड- उद्धार साधन खण्ड है । इस खण्ड मेें रतिसुख की उदात्ततम अवस्था तक पहुँचने के अनेकविध उपायों के साथ  इस संसार के सुखों की प्राप्ति की मूलभूत प्रक्रियाएँ  हैं ।
 सावधानियाँ एवं स्पष्टीकरण
      कामसूत्र जैसी,विस्तृत एवं विख्यात पुस्तकों के बाद भी ‘रति-सूत्र’जैसी संक्षिप्त पुस्तक की प्रबल आवश्यकता है एवं सार्थकता है, जिसे सावधानियाँ एवं स्पष्टीकरण शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है।

सावधानियाँ एवं स्पष्टीकरणः-
कामसूत्रः-यह काम को विलास के रूप में ग्रहण करता है। उसकी विधियाँ मूलतः राजे-महाराजों के वैभव विलास के लिए है। सामान्य मनुष्य के लिए यह बहुत कम उपयोगी है। यह कामानंदतक सीमित है,उसके उदात्ततम रूप ब्रह्मानंद तक इसकी गति एवं दृष्टि नहीं है। परदारागमन, वाजीकरण के विविध योग एवं उपाय इसे स्थूल स्तर तक सीमित एवं नीति निरपेक्ष बनाते हैं। यह पुरुष प्रधान है।

रतिसूत्रः-यह पुस्तक काम को पुरुषार्थ एवं उपादेय मानती है इसलिए परोत्पीड़न, खंडित सुख के स्थान पर कामानंद से ब्रह्मानंद तक का मार्ग भी बताती है।
-रतिसुख को लक्ष्य मानने पर अन्य बातों की चिंता बेकार है।
-मनुष्य का अस्तित्व निरपेक्ष नहीं है। अतः सहयोगी के साथ पूरा वातावरण ही उसे प्रभावित करता है।
यह पुस्तक काम को उपादेय पुरुषार्थ के ंरूप मंे भौतिक रूप में एवं उसके सर्वसुंदर, सर्वव्यापी रूप में स्वीकार करती है । इस प्रकार कामशास्त्र, योग एवं तंत्र तीनों परंपराओं के प्रति यह पुस्तक आभारी है ।
इसमें वर्णित सिद्धांत एवं सूत्र उन साधकांे के अनुभवों पर    आधारित हैं, जिन्होने शास्त्रीय वचनों का गुरुपरंपरा से आचार एवं प्रयोग में लाकर परीक्षण किया है । उन साधकों के अनुभवों को भाषा एवं आकार देने का कार्य हमने किया है । इसलिए जो सत्य है वह हरगौरी का है, राधाकृष्ण का है, सिद्धों का है, साधकों का है, जो भ्रांति है वह हमारी है ।
सुधी-जनों का सुझाव एवं सहयोग सादर प्रार्थित है।
                                 रवीन्द्र कुमार पाठक
             

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