मैं ने आ. मिश्रजी का पेज देखा। वहां उदारता बहुत अधिक है। अनेक प्रकार की बातें और वे भी प्रचलित भक्तिमार्गी साधुशाही मूडवाली हैं। उसका रस अलग है।
मैं ने आज श्री जमुना मिश्रजी का पोस्ट भी पढ़ा। मुझे लगा कि मेरी बात इन तक पहुंची है। चर्चा स्पष्ट शब्दों में ही नहीं स्पष्ट अर्थों में होगी तभी समझ में आयेगी नहीं तो फिर हर बात को बस केवल मानने मनवाने का झंझट शुरू हो जायेगा। तंत्र जब विशाल है ही तो हम क्या करें? हम कौन होते हैं उसे छोटा करने वाले? इसलिये जरूरी है कि एक एक बात या उदाहरण या वर्गीकरण को ले कर आपसी अनुभवों एवं समझ से लाभान्वित हुआ जाय। भाव यह रहे कि हम परस्पर के लिये कर रहे हैं। जिन्होंने जप, ध्यान, हठयोग आदि में से जिस किसी का अभ्यास किया हो साधक उदारता रखे तो दूसरे की बात भी समझने लगता है।
मैं अनेक प्रयोगवादियों के सान्निध्य में रहा हूं। इस अनुभव से कहता हूं ऐसा साधक जो धारणा या प्रत्याहार के अनुभव से ऊपर गया है, वह आसानी से साधना पद्धतियों की विविधताओं को ही नहीं, उनके बीच के अंतर को भी समझने लगता है।
मुझे लगता है कि लोग केवल किताबें पढ़कर, वे भी परीक्षा में झटपट निश्चित सफलता टाइप, तुरत अपने को ज्ञानी मान लेते हैं। आवृत्ति को जप, धारणा को ध्यान, इसी प्रकार प्रतीक को सर्वस्व मान लेने की चलन ने इतनी समस्याएं पैदा की हैं कि इन उलझनों के विरुद्ध बोलने पर लोग आहत हो जाते हैं। उनका मानना इतना कठोर कि जानना नास्तिकता का सूचक हो जाता है।
भारत में दोनों प्रकार के सत्संग,चर्चा शास्त्रार्थ होते रहे हैं, दूसरे को समझने जानने के लिये और अपनी या अपने गुरु के वर्चस्व को दूसरे पर लादने के लिये। इसी मानसिकता से वैष्णवों का एक संप्रदाय अपने को ‘‘प्रतिवादी भयंकर’’ कहता है। भयंकर से कौन बात करे? और इन भयंकरों से मिलना क्या है?
मैं ने आज श्री जमुना मिश्रजी का पोस्ट भी पढ़ा। मुझे लगा कि मेरी बात इन तक पहुंची है। चर्चा स्पष्ट शब्दों में ही नहीं स्पष्ट अर्थों में होगी तभी समझ में आयेगी नहीं तो फिर हर बात को बस केवल मानने मनवाने का झंझट शुरू हो जायेगा। तंत्र जब विशाल है ही तो हम क्या करें? हम कौन होते हैं उसे छोटा करने वाले? इसलिये जरूरी है कि एक एक बात या उदाहरण या वर्गीकरण को ले कर आपसी अनुभवों एवं समझ से लाभान्वित हुआ जाय। भाव यह रहे कि हम परस्पर के लिये कर रहे हैं। जिन्होंने जप, ध्यान, हठयोग आदि में से जिस किसी का अभ्यास किया हो साधक उदारता रखे तो दूसरे की बात भी समझने लगता है।
मैं अनेक प्रयोगवादियों के सान्निध्य में रहा हूं। इस अनुभव से कहता हूं ऐसा साधक जो धारणा या प्रत्याहार के अनुभव से ऊपर गया है, वह आसानी से साधना पद्धतियों की विविधताओं को ही नहीं, उनके बीच के अंतर को भी समझने लगता है।
मुझे लगता है कि लोग केवल किताबें पढ़कर, वे भी परीक्षा में झटपट निश्चित सफलता टाइप, तुरत अपने को ज्ञानी मान लेते हैं। आवृत्ति को जप, धारणा को ध्यान, इसी प्रकार प्रतीक को सर्वस्व मान लेने की चलन ने इतनी समस्याएं पैदा की हैं कि इन उलझनों के विरुद्ध बोलने पर लोग आहत हो जाते हैं। उनका मानना इतना कठोर कि जानना नास्तिकता का सूचक हो जाता है।
भारत में दोनों प्रकार के सत्संग,चर्चा शास्त्रार्थ होते रहे हैं, दूसरे को समझने जानने के लिये और अपनी या अपने गुरु के वर्चस्व को दूसरे पर लादने के लिये। इसी मानसिकता से वैष्णवों का एक संप्रदाय अपने को ‘‘प्रतिवादी भयंकर’’ कहता है। भयंकर से कौन बात करे? और इन भयंकरों से मिलना क्या है?
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें